बुआ मायावती के सामने नतमस्तक हैं बबुआ अखिलेश
   दिनांक 14-मार्च-2019
 
 
भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर से प्रियंका गांधी की मुलाकात के बाद मायावती के माथे पर बल पड़ गया. तत्काल उन्होंने ‘बबुआ’ अखिलेश यादव को अपने बंगले पर बुलवाया . सन्देश मिलते ही अखिलेश अपनी ‘बुआ’ मायावती के बंगले पर हाजिर हुए. मुलाक़ात के बाद अखिलेश यादव ने इसे महापरिवर्तन की मुलाक़ात बताया. सपा - बसपा गठबंधन के समझौते के बाद जब मायावती और अखिलेश यादव की पहली संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस हुई थी. उसमें हमेशा की तरह मायावती ने लिखा हुआ पढ़ा था मागर उस कांफ्रेंस में पहली बार अखिलेश यादव ने अपना वक्तव्य लिखा हुआ पढ़ा था. पहली ही प्रेस कांफ्रेंस में साफ़ दिख गया था कि अखिलेश यादव ने यह समझौता काफी झुककर किया है. प्रियंका गांधी और चंद्रशेखर की मुलाक़ात से परेशान मायावती ने अखिलेश यादव को अपने आवास पर बुलाकर यह साबित कर दिया कि इस समझौते के लिए अखिलेश यादव ही आतुर थे.
बाबरी मस्जिद की सुरक्षा के लिए गोली चलवाने के कुछ समय बाद ही मुलायम सिंह यादव की मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गई थी. उसके बाद जब विधानसभा चुनाव नजदीक आये तब मुलायम सिंह यादव को लग गया था कि "जाति" के फैक्टर को उभार कर ही सत्ता में लौटा जा सकता है क्योंकि बाबरी मस्जिद की सुरक्षा के चक्कर में आम हिन्दू जन मानस मुलायम सिंह यादव से पूरी तरह चिढ़ा हुआ था. मुलायम सिंह यादव ने बसपा से समझौता कर लिया. मुलायम सिंह यादव "जाति" का फैक्टर उभारने में कामयाब रहे और जोड़ -तोड़ करके उन्होंने सरकार बना ली।
4 दिसंबर 1993 को मुलायम सिंह यादव दोबारा मुख्यमंत्री बने. बसपा के समर्थन से जब सरकार चलने लगी. उसके कुछ दिन बाद से ही मायावती ने मुलायम सिंह की नाक में दम कर दिया था. उस दौर में हर महीने की 1 तारीख को बहुजन समाज पार्टी के लखनऊ कार्यालय पर बैठक होती थी. हर महीने की एक तारीख को समाजवादी पार्टी के तौर तरीके पर मायावती जहर उगलती थीं. कई बार ऐसा हुआ कि बसपा की बैठक के बाद मुलायम सिंह यादव , आनन -फानन में कांशीराम से मिलने पहुंचे. मुलायम सिंह यादव को कम से कम महीने में एक बार कांशीराम की मान मनौव्वल करने पहुंचना पड़ता था.
 
यह सब कुछ बेवजह नहीं था. मायवाती की राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ती जा रही थी. मगर मुलायम सिंह यादव , सिर्फ कांशीराम को ही भाव देते थे. मायावती को यह उपेक्षा बर्दाश्त नहीं हो रही थी. दूसरा सबसे बड़ा कारण बेहद जमीनी था. सपा के जिला स्तर के नेता और कार्यकर्ता अपनी मनमानी और उत्पात से बाज नहीं आ रहे थे. ग्रामीण इलाकों में एक ख़ास बिरादरी के सपा समर्थक , बसपा के मूल मतदाताओं को प्रताड़ित कर रहे थे. जहां कहीं भी भूमि आदि का विवाद था. वहां दलितों पर सपा के बाहुबली भारी पड़ रहे थे. पुलिस भी कुछ नहीं कर रही थी क्योंकि बसपा भी सरकार में शामिल थी. बसपा की हर माह होने वाली बैठक में यह सब मुद्दे तेजी से उठ रहे थे.
 
यही वजह थी कि हर बैठकों में समर्थन वापसी की धमकी दी जाती थी. जैसे ही बैठक में समर्थन वापसी का मुद्दा उठता था मुलायम कांशीराम के आवास पर हाजिर हो जाया करते थे. मुलायम सिंह यादव भीतर ही भीतर मायावती से चिढ़े रहते थे पर बोल कुछ नहीं पाते थे। उसी समय जिला पंचायत के चुनाव में सपाइयों ने खूब जमकर उधम मचाया और चुनाव जीत लिया. सपाइयों के उधम का शिकार बसपा के प्रत्याशी भी हुए. सपा और बसपा में तनातनी काफी बढ़ गयी. कांशीराम तब मुलायक के बारे में कहा " ये जिला पंचायत स्तर का नेता था, इसको मैंने चीफ मिनिस्टर बना कर गलती कर दिया" उसके बाद मुलायम सिंह यादव ने कहा कि " उनको जानकारी नहीं है मैं 1989 में मुख्यमंत्री रह चुका हूँ . वर्ष 77 में भी मंत्री रह चुका हूं "
इसके बाद भी गठबंधन बचा हुआ था मगर कांशीराम बीमार हो गए और अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. 1 जून 1995 को हुई बैठक में मायावती ही सर्वेसर्वा थीं. मायावती ने समर्थन वापस ले लिया. समर्थन वापसी की धमकी से मुलायम सिंह यादव पूरी तरह तंग हो चुके थे. उसके बाद बाद 2 जून गेस्ट हाउस काण्ड हुआ और मायावती मुख्यमंत्री बनीं. उसके बाद मुलायम और मायावती बीच जो दरार पड़ी वह कभी भरी नहीं। करीब 23 साल बाद अखिलेश यादव ने अपने पिता की दुश्मनी भुला कर समझौता तो किया है लेकिन उनकी दशा ठीक वैसी ही है जैसी मुलायम सिंह यादव की कांशीराम के सामने रहा करती थी. मुलायम सिंह यादव , मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहने के लिए कांशीराम के सामने हाथ बांधे खड़े रहा करते थे. अर्थात बुआ के सामने बबुआ पूरी नतमस्तक हैं.