जिस कांग्रेस को भ्रष्ट कहते थे अब उसी का हाथ थामने को बेताब क्यों हैं केजरीवाल
   दिनांक 17-मार्च-2019
 
जिस कांग्रेस का विरोध कर केजरीवाल ने अपना राजनीतिक करियर शुरू किय जिसे भ्रष्ट बताते हुए वह नहीं थकते थे आज उसी कांग्रेस का दामन थामने में वह बेताब हैं। हरियाणा में तो कांग्रेस से गठबंधन हो इसके लिए तो ट्वीट भी कर चुके हैं. 
लोकतांत्रिक समाज को नेतृत्व देने का दायित्व जिस राजनीति पर है, उसके बारे में कहा जाता है कि वह सैद्धांतिक और वैचारिक आधार के बिना नहीं चल सकती। हालांकि हाल के दिनों में भारतीय राजनीति ने विचार और सिद्धांतों को लेकर जितना विचलन दिखाया है, उससे यह स्थापना गलत ही साबित होती है। विचार और सिद्धांत की लकीर पर आगे बढ़ने की अवधारणा को राजनीति अक्सर यह कह कर तोड़ती रही है कि राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन और दोस्त नहीं होता। समय और परिस्थिति के मुताबिक राजनीति अपने दोस्त और दुश्मन तलाश लेती है। जिसे कल तक वह दुश्मन बताते नहीं थकती थी, उसे वह वक्त बदलते ही अपने लाभ को ध्यान में रखते ही दोस्त बनाकर उसका हाथ थामने देर नहीं लगाती। लेकिन ऐसा करते वक्त भी राजनीति कम से कम इस बात का ध्यान रखती रही है कि वह कम से कम अपने मूल वैचारिक आधार के ठीक उलट की धारा को स्वीकार न करे, उसके साथ गलबहियां ना डाले। लेकिन समय के जिस चक्र में हम रह रहे हैं, लगता है कि आज की राजनीति इस स्थापित मान्यता को भी तोड़ने जा रही है। इसका ताजा उदाहरण आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच दिल्ली के लोकसभाई दंगल में होने जा रहा गठबंधन है।
राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए दिल्ली के संसदीय दंगल में जिस तरह कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक-दूसरे का साथ देने को लेकर आगे बढ़ रहीं हैं, उससे यही साफ होता है कि राजनीतिक नैतिकताओं को परे रखने की परिपाटी किस हद तक पहुंच गई है। दिलचस्प यह है कि जिन शीला दीक्षित के कंधे पर दिल्ली कांग्रेस की कमान है, वे खुद आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का विरोध कर चुकी है। जबकि उनके ही पाले-पोसे और बाद में उनके विरोधी बने दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अजय माकन आम आदमी पार्टी के अपने खिलाफ तमाम दुष्प्रचारों और अभियानों को भुलाकर उसके साथ सिर्फ इसलिए दिल्ली के दंगल में उतरना चाहते हैं, ताकि देश की राजनीति में एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी की ताकतवर वापसी नहीं हो सके। पता नहीं, अजय माकन ने दिल्ली के लिए कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको को क्या समझाया है कि आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन को लेकर अपनी राय बदल दी है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि कांग्रेस गठबंधन को लेकर अपने कार्यकर्ताओं की राय जानने की कोशिश में जुटी हुई है। दूसरी तरफ केजरीवाल घूम-घूमकर अपने कार्यकर्ताओं की राय तो मांग ही रहे हैं। अंदर खाने में दोनों पार्टियों के बीच बेमेल गठबंधन को लेकर चल रही कवायद का ही नतीजा है कि आम आदमी पार्टी पश्चिमी दिल्ली की सीट के लिए अपने उम्मीदवार का नाम नहीं दे रही है, जबकि छह उम्मीदवारों का नाम घोषित कर चुकी है। चर्चाएं यहां तक चल रही हैं कि दोनों पार्टियों के बीच तीन-तीन-एक के फॉर्मूले पर बात चल रही है। यानी तीन-तीन उम्मीदवार दोनों पार्टियां देंगी, जबकि एक उम्मीदवार दोनों की पसंद का होगा।
 
26 नवंबर 2012 को गठित आम आदमी पार्टी का घोषित उद्देश्य तत्कालीन केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार का विरोध करना था। संयोगवश दिल्ली में भी उन दिनों उसी कांग्रेस की सरकार थी, जिसकी अगुआई में केंद्र सरकार भी चल रही थी। आम आदमी के संस्थापक अरविंद केजरीवाल उन दिनों केंद्र सरकार भ्रष्टाचारी मंत्रियों की फेहरिस्त उनके भ्रष्टाचारी कारनामे के आधार पर जगह-जगह रिलीज करते रहते थे। उनकी नजर में तत्कालीन दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी भ्रष्टाचारी थीं। अप्रैल 2011 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर चले अन्ना हजारे के अनशन के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी जो जनभावना का उफान उठा, उसकी पृष्ठभूमि में अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम को लगा कि वे केंद्र और दिल्ली की उनकी नजर में भ्रष्टाचारी रही सरकारों को उखाड़ फेंकेंगे। इसके लिए उन्हें मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक राजनीतिक दल की जरूरत थी और उन्होंने आम आदमी पार्टी का गठन किया। आम आदमी पार्टी का घोषित उद्देशय कांग्रेस की अगुआई वाली केंद्र और दिल्ली की शीला सरकार को न सिर्फ उखाड़ फेंकना था, बल्कि शीला दीक्षित समेत भ्रष्टाचार के तमाम दोषियों को सजा भी दिलानी थी। तब कहा गया था कि केजरीवाल और उनकी टीम राजनीति को बदलने आ रही है। नवंबर 2013 में बनी अल्पमत की दिल्ली सरकार के मुखिया रहते केजरीवाल ने अपना भ्रष्टाचार विरोधी तेवर बरकरार रखा। लेकिन बाद के दिनों में उनके तेवर बदलते चले गए। बाद के दिनों में जिस तरह उन्होंने कांग्रेस की तरफ कदम बढ़ाने शुरू किए, भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने की बातें भूलने लगे, उससे साफ हो गया कि राजनीति को बदलने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी भी राजनीति की लकीर पर दूसरे सियासी दलों की ही तरह है। वह कुछ अलग नहीं है, वह राजनीति बदलने नहीं, बल्कि सिर्फ सत्ता पाने आई है। अब तो हालात यह है कि कांग्रेस के खिलाफ गठित आम आदमी पार्टी उसी कांग्रेस से गठबंधन करने के लिए लालायित हुई जा रही है। अरविंद केजरीवाल के इस बदले रूप को देखकर हैरत होती है कि यह वही केजरीवाल हैं, जिन्होंने मुख्यमंत्री रहते अपने तत्कालीन कानून मंत्री के गलत-सही व्यवहार के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर कांग्रेसी गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और संसद के बगल में धरने पर बैठ गए थे।
राजनीति के नए दर्शन गढ़ने के इस दौर में केजरीवाल अकेले नहीं है। 1982में तेलुगू स्वाभिमान के नाम पर कांग्रेस के विरोध में ही तेलुगू फिल्मों के सुपर स्टार एनटी रामाराव ने तेलुगू देशम पार्टी का गठन किया था। दरअसल उनके सामने ही कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव राजीव गांधी ने हैदराबाद हवाई अड्डे पर आंध्र प्रदेश के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री टी अंजैया को खुलेआम झाड़ पिलाई थी। इस दृश्य से विचलित एनटी रामाराव ने कांग्रेस को ही उखाड़ फेंकने का संकल्प ले लिया। इसका असर भी हुआ। तेलुगू देशम ने अगले चुनाव में कांग्रेस को आंध्र प्रदेश से उखाड़ फेंका। बाद के दौर में तेलुगू देशम पहले राष्ट्रीय मोर्चा और बाद के दौर में एनडीए की सरकारों के गठन में बड़ी सहयोगी रही। लेकिन वही तेलुगू देशम पार्टी अब उसी कांग्रेस के साथ कदम बढ़ाते हुए आगे बढ़ रही है, जिसके खिलाफ उसका गठन हुआ था। एनटी रामाराव को अपदस्थ करके पार्टी पर कब्जा जमाए बैठे एन चंद्रबाबू नायडू को भी अब कांग्रेस के साथ गठबंधन से परहेज नहीं है। अब तो वे जगह-जगह नरेंद्र मोदी विरोधी अभियान में कांग्रेस के साथ कंधा से कंधा भिड़ाकर आंदोलन चलाते नजर आ रहे हैं। आम आदमी पार्टी की तरह अब उनका भी उद्देश्य सिर्फ नरेंद्र मोदी का विरोध रह गया है। दोनों का मोदी विरोध भ्रष्टाचार या कुशासन को लेकर नहीं, बल्कि अन्य कारणों से है। दोनों का कहना है कि मोदी तानाशाह हैं। हालांकि दोनों यह नहीं बता रहे कि जिस कांग्रेस के खिलाफ उनकी पार्टियों का गठन हुआ, क्या वह अब भ्रष्टाचारी नहीं रही, अगर भविष्य में उसे राज्य या केंद्र की सत्ता मिलती है तो सदाचार की धाराएं बहा देंगी।
इन सवालों का जवाब तो जनता पूछेगी, जनता तो यह भी पूछेगी कि नए राजनीतिक दर्शन का आधार क्या है? फिलहाल इससे बेपरवाह केजरीवाल जहां कांग्रेस का हाथ थामने को बेकरार हैं, वहीं चंद्रबाबू नायडू थाम चुके हैं।
वैसे भी गठबंधन पर फैसला कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को लेना है। बहरहाल यह माना जा रहा है कि अगर दिल्ली में गठबंधन हुआ तो शीला दीक्षित के लिए असहज स्थिति हो जाएगी। चूंकि आम आदमी पार्टी का गठन ही शीला दीक्षित के भ्रष्टाचारों और उन्हें जेल भेजने के नाम पर हुआ है। ऐसे में देखना यह होगा कि बेमेल और नई नैतिकता गढ़ने वाला गठबंधन होता भी है तो दिल्ली की राजनीति किस करवट बैठती है।