नैतिकता को ताक पर रख शोक की घड़ी में सत्ता के लिए लालायित कांग्रेस
   दिनांक 18-मार्च-2019
चार बार गोवा के मुख्यमंत्री रहे मनोहर पर्रिकर का असामयिक निधन न सिर्फ गोवा की जनता, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के लिए भी बड़ा झटका है। राज्य में अभी सात दिनों का राजकीय शोक है। लेकिन सत्ता पर निगाह जमाए बैठी कांग्रेस ने एक पल भी देर लगाए बिना अपना दावा ठोक दिया। ऐसी परिस्थितियों में कांग्रेस का दावा उसकी मानसिकता को बताता है कि सत्ता के लिए कांग्रेस कितना नीचे तक गिर सकती है
सिनेमा के संदर्भ में मशहूर अभिनेता और निर्देशक राजकपूर का एक कथन अक्सर उद्धृत किया जाता है, शो मस्ट गो ऑन...यानी कोई रहे या नहीं रहे, शो जारी रहना चाहिए। सिनेमा के संदर्भ में कही जाने वाली इस बात का निहितार्थ यह है कि किसी के रहने या न रहने से जीवन की गति नहीं रूकनी चाहिए। भारतीय परंपरा में इस पर किसी को एतराज भी नहीं होना चाहिए। लेकिन क्या असल जिंदगी में ऐसा हो पाता है। कम से कम किसी के असामयिक निधन के तुरंत बाद शो जारी रहना ही चाहिए? निश्चित तौर पर इस सवाल का ज्यादातर लोग न में ही जवाब देंगे। लेकिन लगता है कि गोवा कांग्रेस हर हाल में शो जारी रखने की ही तैयारी में है। शायद यही वजह है कि जब मनोहर पर्रिकर के निधन से स्तब्ध गोवा का जनमानस कायदे से शोक भी मनाने को तैयार नहीं हो पाया था, तभी गोवा कांग्रेस ने वहां की राज्यपाल मृदुला सिन्हा को सत्ता पर दावेदारी के लिए अपनी चिट्ठी दे डाली।
गोवा कांग्रेस ने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि चूंकि मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद उनकी अगुआई वाली राज्य की भारतीय जनता पार्टी की सरकार अल्पमत में आ गई है और 14 विधायकों के साथ कांग्रेस विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन गई है, इसलिए उसे सरकार बनाने का मौका दिया जाए।
चार बार गोवा के मुख्यमंत्री रहे मनोहर पर्रिकर का असामयिक निधन न सिर्फ गोवा की जनता, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के लिए भी बड़ा झटका है। राज्य में अभी सात दिनों का राजकीय शोक है। जाहिर है कि इस पूरी अवधि में राज्य में नई सरकार बनने से रही। लेकिन सत्ता पर निगाह जमाए बैठी कांग्रेस ने एक पल भी देर लगाए बिना अपना दावा ठोक दिया। इसे स्वतंत्र राजनीतिक समीक्षक भी उचित नहीं मान रहे हैं। इसे सत्ता के प्रति उसकी ओछी राजनीति के तौर पर देखा जा रहा है। अव्वल तो कांग्रेस को कम से कम शोक की अवधि तक इंतजार करना चाहिए था। चूंकि अभी सत्ता भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाले गठबंधन के हाथ में है, लिहाजा उसे यह इंतजार करना चाहिए था कि वह सत्ता बना पाती है या नहीं। अगर वह नाकाम होती तो कायदे से कांग्रेस आगे आती और सरकार बनाने में जुट जाती। वैसे भी मनोहर पर्रिकर की ऐसी उम्र नहीं थी कि उनकी मृत्यु को प्राकृतिक तरीके से लिया जाता।
राजनीति में 63 साल की उम्र कुछ खास नहीं मानी जाती। अपनी सादगी के लिए विख्यात मनोहर पर्रिकर से ना सिर्फ गोवा, बल्कि देश ने भी काफी उम्मीदें लगा रखी थीं। देश चाहता था कि वे जल्द स्वस्थ होकर पूरी ऊर्जा के साथ काम पर लौटें। साल 2001 में पत्नी की असामयिक मृत्यु के बाद भी जिस मनोहर पर्रिकर का मनोबल कम नहीं हो पाया था, उस पर्रिकर से देश की उम्मीदें लगाना बेमानी भी नहीं है। वैसे भी खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी अपने ट्वीट में उन्हें गोवा का सपूत बताया है। ऐसे में गोवा कांग्रेस को इंतजार करना चाहिए था कि कम से कम शोक की घड़ी बीत जाए।
 
अब जरा गोवा विधानसभा पर भी नजर डाल लेते हैं। राज्य विधानसभा की 40 सीटों में से दो विधायकों मुख्यमंत्री पर्रिकर और भारतीय जनता पार्टी के विधायक फ्रांसिस डिसूजा के असामयिक निधन तथा दो विधायकों के इस्तीफे के बाद विधानसभा का मौजूदा संख्या बल महज 36 रह गया है। इस लिहाज से राज्य में बहुमत का आंकड़ा 19 सीटों का है। फिलहाल सत्तारूढ़ बीजेपी के पास जहां 11 विधायक हैं, वहीं उसकी सहयोगी महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के तीन और गोवा फॉरवर्ड पार्टी के तीन विधायकों के साथ उसे 3 निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल है। इसके साथ ही पार्टी के विधानसभा अध्यक्ष भी हैं। जबकि 14 सदस्यों वाली कांग्रेस को राष्ट्रवादी कांग्रेस के एक विधायक का भी समर्थन हासिल है। इस लिहाज से देखें तो कांग्रेस के पास अभी महज पंद्रह विधायक ही हैं। इसके बावजूद उसने सत्ता पर दावेदारी ठोक दी है। अगर मौजूदा सत्ताधारी गठबंधन में से कुछ विधायक साथ छोड़ते या इसकी घोषणा भी करते तो कांग्रेस की दावेदारी का तार्किक आधार होता। लेकिन अभी ऐसी हालत भी नजर नहीं आ रही है।
पिछले विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा दल होने के बावजूद गोवा की सत्ता से दूर रह गई कांग्रेस को लगता है कि अपनी वह नाकामी खत्म करने की कोशिश में है। लेकिन अपनी नाकामी छुपाने के लिए उसने जो वक्त और राह चुनी है, उसे किसी भी कीमत पर नैतिक नहीं कहा जा सकता। इससे उस पर सवालिया निशान लग चुके हैं। शोक में डूबे गोवा में सत्ता के लिए जारी उसकी जल्दबाजी का अगर मौजूदा चुनावी मौसम में उसे जनता की अदालत में खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है।