चुनावी फायदे के लिए दादा फिरोज को भूलीं प्रियंका
   दिनांक 19-मार्च-2019
प्रियंका के दादा फ़िरोज़ गांधी पारसी थे. पारसियों का ज्यादा वोट बैंक नहीं है, सो उनकी मजार पर जाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था. इसलिए वह उनकी मजार पर नहीं गईं
हनुमान जी के दर्शन करने के बाद बाहर आती हुई प्रियंका गांधी
प्रियंका गांधी के राजनीति में पदार्पण को लेकर कांग्रेसियों ने जबरदस्त प्रचार किया है. जबकि सचाई यह है कि प्रियंका गांधी हर लोकसभा चुनाव में रायबरेली और अमेठी में प्रचार करने आती रहीं हैं. इस बार बदलाव सिर्फ इतना है कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी बहन प्रियंका को पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी है. अपने भाई राहुल को जीत दिलाने के लिए प्रियंका गांधी ने प्रयागराज से अपने चुनाव अभियान की औपचारिक शुरुआत की. प्रयागराज में प्रियंका ने ‘लेटे हनुमान’ जी के मंदिर में दर्शन -पूजन और आरती की. संगम गयीं और वहां से जलमार्ग से वाराणसी के लिए रवाना हुईं. प्रियंका गांधी ने अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत के लिए प्रयागराज को चुना. मंदिर में दर्शन और गंगा जी के जलमार्ग पर यात्रा करके, हिन्दुओं से अपनापन प्रदर्शित करने की भरपूर कोशिश की. कुछ कांग्रेसियों को लगता है कि इंदिरा गांधी के नाक - नक्श सी दिखने वाली प्रियंका गांधी देश की बड़ी नेता बन सकती हैं. प्रियंका गांधी भी अपनी दादी की छवि को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं. मगर इस बार जब प्रियंका गांधी प्रयागराज पहुंची तो उन्होंने अपने दादा फ़िरोज़ गांधी से किनारा करके निकल गयीं. प्रियंका गांधी ने अपने दादा फ़िरोज़ गांधी की मजार पर झांकने तक की जहमत नहीं उठाई.
यह सब कुछ बेवजह नहीं था. हमेशा मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली कांग्रेस को, अब यह समझ में आ गया है कि हिन्दुओं को साधे बगैर सत्ता में वापसी संभव नहीं है. यही वजह है कि प्रियंका गांधी ने मंदिर में जाकर पूजा - अर्चना की. चुनाव में प्रियंका गांधी , हिन्दुओं के एक बड़े वर्ग का समर्थन हासिल करने के लिए हर जतन कर रहीं हैं. इसके साथ ही वह ,अपनी दादी इंदिरा गांधी की छवि को भुनाने का भी हर संभव प्रयास कर रहीं हैं. मगर दादा फ़िरोज़ गांधी उनके किसी काम के नहीं हैं. प्रियंका के दादा फ़िरोज़ गांधी पारसी थे. पारसियों का कोई ज्यादा वोट बैंक नहीं है, सो उनकी मजार पर जाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था.
प्रियंका गांधी, हिन्दुओं को यह विश्वास दिलाने की कोशिश में जुटी हुईं हैं कि कांग्रेस हिन्दुओं के हितों का ध्यान रखने वाली पार्टी है. कुछ समय पहले राहुल की वो तस्वीर तो सभी को याद ही होगी जिसमे वह जनेऊ धारण किये हुए हैं. दोनों भाई – बहन को काफी देर बाद यह एहसास हो चुका है कि मुस्लिम तुष्टिकरण के चक्कर में कांग्रेस पार्टी का बड़ा जनाधार समाप्त हो चुका है. वर्ष 2009 के चुनाव में हार के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ए.के एंटोनी ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ कर दिया था कि मुस्लिम परस्त होना , पार्टी की हार का बड़ा कारण था. यही वजह है कि दोनों भाई - बहन यह मानकर चल रहे हैं कि मुसलमानों के पास तो कोई विकल्प है नहीं, वो विवश होकर कांग्रेस को ही वोट देगा. किसी तरह से हिन्दुओं को मना लिया जाए तो सत्ता में लौटा जा सकता है. मगर अब जनता के मन में यह बैठ चुका है कि ‘राजशाही खानदान’ के लोग चुनाव में सिर्फ लोक लुभावन वादा करते हैं और फिर अपने महलों में लौट जाते हैं. कांग्रेस ने आज़ादी के बाद अधिकतम समय तक इस देश में शासन किया और हर चुनाव में जनता को छला गया. चुनावी फायदे के लिए जो अपनी दादी को याद रखे और दादा को भूल जाय वह जनता का कितना भला करेगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है.
 
 इलाहाबाद के मम्फोर्डगंज में स्थित फिरोज गांधी की मजार 
जन्म तिथि और पुण्य तिथि पर दो फूल को तरस गयी फिरोज की मजार
फिरोज गांधी के ससुर , बीबी और बेटा प्रधानमंत्री थे. फ़िरोज़ गांधी का जन्म दिन 12 सितम्बर 1912 और मृत्यु 8 सितम्बर 1960 को हुई थी. इन दोनों तारीखों पर उनकी मजार दो फूलों के लिए तरसती रही है. फिरोज गांधी का जन्म मुम्बई में हुआ था. फिरोज गांधी की उम्र जब 8 वर्ष की थी तब उनके पिता जहांगीर का निधन हो गया था. फिरोज से बड़े दो भाई थे उन दोनों लोगों ने मुम्बई में ही रहने का फैसला किया. वर्ष 1920 में फिरोज गांधी और उनकी मां रत्तीबाई प्रयाग आ गईं थीं.
नेहरू ने घर में प्रवेश बंद करा दिया था फिरोज गांधी का
इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष रामाधीन सिंह कहते हैं कि “फ़िरोज़ गांधी एक बेहद बदकिस्मत इंसान थे. वह भारतीय संसद के पहले और आखिरी सांसद थे जिन्होंने केन्द्र सरकार के मंत्री के खिलाफ इतने तर्क और सबूतों के साथ मामले को उठाया कि जवाहरलाल नेहरू सरकार के वित्त मंत्री, टीटी कृष्‍णामचारी को इस्तीफा देना पड़ा था. तब से आज तक कोई ऐसा सांसद नहीं हुआ जो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपनी ही सरकार के मंत्री को इस्तीफा दिए जाने को विवश कर दे. जवाहरलाल नेहरू ने इसके बाद फिरोज के लिए प्रधानमंत्री निवास में प्रवेश निषेध कर दिया था , जबकि वह सांसद भी थे ,संविधान सभा के भी सदस्य थे और परिवार के एकलौते दामाद भी थे . गुनाह बस एक था कि सरकार के भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़े होने का उन्होंने साहस किया था.