मुगलकाल में भी जमकर खेली जाती थी होली
   दिनांक 20-मार्च-2019
   - फिरोज बख्त अहमद                             
रंग के छीटों से जिनका मजहब खतरे में पड़ जाता है, उन्हें सद्भाव से भरी गुलाल और अबीर की महक क्यों नहीं दिखती? होली की गुझिया की मिठास क्यों नहीं भाती? होली इंद्रधनुषी रंगों का उत्सव है, कोई एक रंग प्रधान नहीं है। रंगों की पालेबंदी करने वाले अपने दिमाग जोर डालें और खिड़की-दरवाजे खोल कर पे्रम की शुद्ध हवा को अंदर आने दें तो उन्हें भी होली के रंग सराबोर कर देंगे।
 मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर लालकिले के बाहर होली-ठिठोली करते हुए
आ मिटा दें  दिलों पे जो स्याही आ गई है,
तेरी होली मैं  मनाऊं, मेरी ईद तू मना ले !
दिल्ली में मुगल शासन के दौरान होली में जो चटकीले और तीखे रंग हुआ करते थे, आज भी उनकी शोखी में कोई कमी नहीं आई है। दिल्ली की शानदार होली का प्रथम वर्णन आईन-ए-अकबरी में मिलता है। इसमें मुगल बादशाह अकबर के समय की सुंदर होली-ठिठोली का उल्लेख है। आईन-ए-अकबरी के मुताबिक, अकबर के जमाने में जन-जीवन में रंग घोलने वाले रंगों का उत्सव होली बहुत धूमधाम से मनाया जाता था। अकबर भी होली खेला करते थे। एक माह पहले से ही राजमहल में होली की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। जगह-जगह सोने-चांदी के ड्रम रखे जाते, जिनमें एक शुभ अवसर पर रंग घोले जाते थे। ये रंग महल के आसपास स्थित टेसू के फूलों से तैयार किए जाते थे। अकबर की ही तरह जहांगीर, शाहजहां, हुमायूं, बहादुरशाह जफर भी उसी उत्साह से होली मनाते थे। दिल्ली के लालकिले के किला-ए-मुअल्ला में होली का जश्न बहुत धूमधाम से मनाया जाता था। प्राचीन उर्दू दैनिक ‘असद-उल-अखबार’ के अनुसार, बहादुरशाह जफर राज-काज की समस्याएं और रंजिश भूलकर पूरे जोश के साथ होली का उत्सव मनाते थे। अपने उजड़े दयार के बावजूद जफर होली का बहुत सम्मान करते थे। अखबार लिखता है कि सुबह-सवेरे से ही बादशाह हिन्दू-मुस्लिम उमरा के साथ लाल किले के झरोखे में आकर बैठ जाते और होली मनाने वाले समूह, स्वांग रचने वाले और हुड़दंग मचाने वाले टोलियां बनाकर उनके सामने से वैसे ही निकलते थे, जैसे गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्टÑपति के सामने से झांकियां निकलती हैं। बादशाह सभी को दिल खोलकर इनाम दिया करते थे। जफर तो गुलाल का टीका ही लगवाते थे, पर उनके मंत्री और दरबारी तो गुलाल में नहा जाते थे। होली पर बादशाह के कहारों को भी सोने की एक-एक अशर्फी भेंट की जाती थी। जफर ऐसे शायर थे, जिन्होंने फाग भी लिखा है। उनके द्वारा लिखित फाग का बंद इस प्रकार है- ‘‘क्यों मो पे मारी रंग की पिचकारी, देखो कुंवरजी दूंगी मैं गारी।’’ उसी समय के एक अन्य प्रसिद्व दैनिक ‘सिराज-उल-अखबार’ लिखता है कि होली क्या आती है, दिल की कली खिल जाती है। होली मिलन का त्योहार है। मुल्ला नसीर फिराक ने अपनी प्रसिद्व पुस्तक ‘लाल किले की एक झलक’ में लिखा है कि ‘‘होली के मुगलिया रंगों की रंगीनी के समां का चित्रण शब्दों में नहीं किया जा सकता। मौसम बदला, हवा की खुनकी (सर्दी) टूटी और जाड़ा भागा। वसंत पंचमी के आते ही फिजा में गुलाल उड़ने लगते हैं। बदलते मौसम की बहार, नई उमंगों से भरपूर मस्ती, सुहावनी हवा और मदमस्त वातावरण आदि सबकुछ बहुत ही लुभावना लगता है।’’
महेश्वर दयाल ‘आलम में इंतिखाब-दिल्ली’ में लिखते हैं कि होली से पूर्व वसंत के आगमन पर देवी-देवताओं पर सरसों के फूल चढ़ाना दिल्ली की प्राचीन परंपरा रही है। होली के रसिया पर्व से दो सप्ताह पूर्व ही ढाक और टेसू के फूलों को पानी से भरे मटकों में डालकर चूल्हे पर चढ़ा देते थे, ताकि गेरुआ रंग तैयार किया जा सके। होली के मतवाले, मस्त कलंदर गली-गली, कूचे-कूचे घूमते थे। सारंगी, डफली, चंग, नफीरी, मृदंग, ढमढमी, तंबूरा, मुंहचंग, ढोलक, रबाब, तबला, घुंघरू वाद्य लेकर टोलियों में निकलते और तान लगाते- ‘‘तेरे भोले ने पी ली भंग, कौन जतन होली खेले !’ होली पर बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था। चाहे वह आश्ना हो या बेगाना, उस पर रंग डाल कर बोलते- ‘‘यह तो होली का भड़वा है!’’ जिस व्यक्ति पर रंग डाला जाता वह भी इन्हीं शब्दों का प्रयोग करता और बच्चों के मुंह पर गुलाल मल देता।

 
 मुगल दरबार में होली की मस्ती का दृश्य
सन् 1748-54 तक अहमद शाह बिन मुहम्मद शाह ने अपने दरबार में होली पर जश्न का जैसा आयोजन किया, उसकी मिसाल आज तक नहीं मिलती। मुंशी मित्तर सेन लिखते हैं कि बादशाह होली के दिन खुशी से झूम उठते थे। शाह आलम सानी (1759-1806) द्वारा लाल किला और शाहजहांनाबाद (पुरानी दिल्ली) में मनाई जाने वाली होली का उल्लेख ‘पैसा अखबार’ नामक उर्दू दैनिक में मिलता है। लाहौर से प्रकाशित होने वाले इस दैनिक के 24 मार्च, 1892 के अंक में लिखा है कि बादशाह के उमरा और वजीर भी वही करते थे, जो हाकिमे-वक्त किया करते थे। वे होली के रोज हिन्दू दोस्तों के यहां जाते और उन्हें अपने यहां बुलाते। होली पर हवेलियों में महफिल जमती और शेर-ओ-शायरी का दौर चलता। नाच-गाना भी होता था, जिसमें डोमनियों, कंचनियों और भांडों को बुलाया जाता था। शाह आलम सानी उच्च कोटि के कवि भी थे। उन्होंने अपनी कविताओं में होली का सांगोपांग चित्रण किया है-‘‘नैनन निहारियां, क्यारियां लगें अति प्यारियां / सौ लेकर पिचकारियां और गावें गीत गोरियां !’’
शाहजहानाबाद में तो होली के अनेक रंग देखने को मिलते थे। अगर किसी मंडली के पास वाद्य यंत्र नहीं होते तो वह टूटे कनस्तर, हांडी, मटकी आदि बजाकर ही होली का राग अलापते थे। युवा तरह-तरह के स्वांग रचते थे। कोई साहब की फटी टाई और पुराने पैबंद लगे सूट पहन कर ‘यस-नो’ की गिट-पिट करता तो कोई काला-कलूटा युवा चुहिया-मेम बनकर घूमता था। होली के रोज तो बड़े-बूढ़े भी गली-मुहल्लों के बच्चों की टोलियों में शरीक हो जाते थे। लड़के पीतल, टीन, कांच व बांस की पिचकारियां लिए ‘शिकार’ की तलाश में घूमते थे। लड़के क्या होते थे, आफत के परकाले होते थे। रंग नहीं भी होता तो किसी भी दुकान या मकान से भर लेते थे। राहगीरों को मूर्ख बनाने के लिए गली या सड़क के बीचोबीच चांदी का सिक्का इस तरह चिपका देते, मानो अभी-अभी किसी की जेब से गिरा हो। कोई उनके झांसे आ जाता तो पहले खूब ठहाका मार कर हंसते, फिर रंगों से उसका स्वागत करते। साथ ही, उसे चोर, बेईमान, उठाईगीर, डाकू आदि विशेषणों से नवाजा जाता और लड़के तब तक उसका पीछा नहीं छोड़ते थे, जब तक कि वह मिठाई-हलवा के लिए कुछ पैसे नहीं दे देता। पुरानी दिल्ली की घनी व मिलीजुली आबादी वाले क्षेत्रों में मुस्लिम महिलाएं हिन्दू महिलाओं को रंग से भरे मटके और लाल रंग में रंगे हुए चावल भेंट करती थीं। दिल्ली के वरिष्ठ शायर वाजिद सहरी बताते हैं कि दिल्ली की हवेलियों में खासतौर से होली पर महफिल व मुशायरे का आयोजन होता था। वे कहते हैं कि भव्य हवेलियों में पानदान, इत्रदान, मेवे, हुक्के और चांदी के वर्क वाले पान सजाए जाते थे। आज भी हमदर्द के हकीम अब्दुल हमीद की मालचा मार्ग स्थित हवेली पर होली पर ऐसा ही आयोजन होता है, जिसमें शहर के खास-ओ-आम शरीक होते हैं। दिल्ली की हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित संस्कृति के उर्दू लेखक व एक उर्दू दैनिक के संपादक डॉ. अजीज बर्नी की मानें तो होली जैसा रंग और आनंद किसी अन्य त्योहार में नहीं है। इस दिन अच्छी शक्लो-सूरत वाले लड़के लड़कियों के कपड़े पहनते और लड़कियों को लड़कों के कपड़े पहनने को कहते। कभी वे वेश बदल कर बंदर, कुत्ता, गधा, शेर आदि बनते और लोगों का दिल बहलाते। हुड़दंगी लड़के आलू व लकड़ी पर ‘गधा’, ‘420’ और ‘चोर’ उलटा लिख कर लोगों की पीठ पर छापते, जिसे पढ़कर लोग उसका मजाक उड़ाया करते थे।
 
तुज्क-ए-जहांगीरी में भी होली का वर्णन है। जहांगीर काल के चित्रकारों ने कई चित्रों में मुगल सम्राट को कुतुब मीनार के पास होली खेलते दिखाया है। चित्रकार रसिक व गोवर्धन ने अपनी-अपनी शैली में जहांगीर को रत्नजड़ित प्याले से रंग खेलते हुए दर्शाया है। न्यूयॉर्क स्थित मेट्रोपॉलिटन संग्रहालय में एक नायाब चित्र है, जिसमें जहांगीर के हाथ में चांदी की पिचकारी दिखाई गई है। एक चित्र में जहांगीर को नूरजहां के साथ होली खेलते दिखाया गया है। मुहम्मद शाह रंगीला के समय के एक चित्र में किला-ए-मुअल्ला की बेगमों को मुहम्मद शाह सम्राट पर पिचकारी छोड़ते दिखाया गया है। बहादुरशाह जफर की ‘होरिया’ के जिक्र के बिना होली अधूरी लगती है। ‘होरिया’ ‘कुफ्र कचहरिया’ में विशेष रूप से अमीरों, रईसों, राजाओं और नवाबों पर फब्तियां कसी जाती थीं। यहां तक कि शहजादे-शहजादियों पर भी कटाक्ष किए जाते थे। बीच-बीच में कहा जाता, ‘‘बुरा न मानो आज हमारी होली है!’’ इस दिन सबकुछ माफ था। अगर कुछ माफ नहीं था तो वह था छिपकर कोने में बैठना।    
 
(लेखक मौलाना आजाद के पौत्र और उर्दू, हिन्दी और अंग्रेजी के वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)