मुसलमान यदि होली रंग में सराबोर हो नमाज पढ़ेगा तो क्या दुआ कबूल नहीं होगी ?
   दिनांक 20-मार्च-2019
- अविनाश त्रिपाठी                           
 हिन्दुओं के लिए ईद की सैवइयां खाना और क्रिसमस पर केक खाना उदारता है तो मुस्लिमों के लिए भी होली के दाग अच्छे रहने दीजिए। क्योंकि दूसरे मत को सम्मान देकर अगर दाग लगते हैं तो वे दाग अच्छे हैं
30 सेकेंड में कोई सामाजिक संदेश देते हुए अपने उत्पाद का प्रचार करना सरल काम नहीं है। यह बिल्कुल तलवार की धार पर चलने जैसा है। कब यह संदेश सद्भावना की जगह दुर्भावना फैलाने लगेगा, इसे समझने के लिए संवेदनशीलता चाहिए। वैसे जब बात हिन्दू आस्था की हो तो ज्यादातर कंपनियों से संवदेनशीलता की आशा करना बेमानी मालूम देता है। बहुराष्ट्रीय कंपनी हिन्दुस्तान यूनीलीवर ने तो जैसे अपने कमर्शियल विज्ञापन के माध्यम से हिन्दू विरोधी एजेंडा ही अपना लिया है। इस ब्रिटिश-डच कंपनी के उत्पादों के कमर्शियल विज्ञापनों में एक के बाद एक हिन्दुओं की आस्था को चोट पहुंचाई जा रही है। सबसे ताजा उदाहरण डिटर्जेंट पाउडर सर्फ एक्सल के विज्ञापन से जुड़ा है। इस विज्ञापन में दिखाया गया है कि एक मुस्लिम बच्चा इसलिए मस्जिद नमाज पढ़ने नहीं जा पाता, क्योंकि मोहल्ले में होली खेली जा रही है। फिर एक हिन्दू बच्ची द्वारा सारे रंग खत्म करवा देने पर बच्चा बिना रंग गिरे मस्जिद जाने में सफल होता है। हालांकि बच्ची जब उससे कहती है कि नमाज के बाद रंग खेलेगा तो वह बच्चा हामी भरता है। इस विज्ञापन को लेकर सर्फ एक्सल को सोशल मीडिया पर काफी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। विज्ञापन जहां एक तरफ मुस्लिम बच्चे को निरीह, होली से ‘डरा’ हुआ दिखाता है तो वहीं हिन्दुओं को गैर हिन्दुओं पर जबरदस्ती रंग डालते हुए दिखाया गया है। यह अजीब तरह का विमर्श है जिसमें होली के रंग इस्लाम, नमाज और मस्जिद के विरोधी दिखाए जा रहे हैं।
इस विज्ञापन को देखकर कुछ सवाल मन में जरूर उठते हैं कि अगर कोई मुस्लिम होली के रंग से सराबोर होकर नमाज पढ़ता है तो क्या उसकी दुआ कबूल नहीं होती? क्या इस्लाम या पैगम्बर होली के रंगों के खिलाफ है? इस विज्ञापन के संदेश से सबसे ज्यादा दिक्कत होली खेलने वाले उन कुछ उदारमना मुसलमानों को होनी चाहिए, क्योंकि यह विज्ञापन ना सिर्फ इस्लाम और होली को विरोधी बता रहा है बल्कि दूसरे के पांथिक उत्सवों में शामिल ना होने की कट्टरवादी सोच का भी समर्थन करता दिखता है। अगर होली के रंग नमाज में आड़े आ रहे हैं तो क्या कल ईद की सैवइयों या क्रिसमस के केक के खिलाफ भी ऐसा ही वैमनस्य फैलाया जा सकता है? वहीं, एक दूसरी लघु फिल्म ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ में दिखाया गया है कि जब एक हिन्दू बच्चा मंदिर में पुजारी को भोजन और दक्षिणा देने निकलता है और मस्जिद पहुंच जाता है। यह समझाकर कि ‘ईश्वर-अल्लाह एक हैं, मंदिर-मस्जिद एक हैं’, अपना मौलवी को देता है और एक जरूरतमंद को दक्षिणा देकर वापस आ जाता है। हैरानी की बात है कि दोनों ही कहानियां ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ की हैं, लेकिन मुस्लिम बच्चे को मस्जिद जाते हुए होली के रंगों से भी परहेज है, पर हिन्दू बच्चा मंदिर की जगह मस्जिद पहुंच जाए तो गुरेज नहीं। क्या रंगों से बचते बच्चों को यह बात नहीं पता कि ‘ईश्वर-अल्लाह एक’ हैं? यह सीख क्या सिर्फ हिन्दुओं के लिए हैं?
 
बात सिर्फ इस अकेले विज्ञापन की नहीं है। हिन्दुस्तान यूनीलीवर का ही दूसरा उत्पाद रेड लेबल टी के ढाई मिनट के वीडियो में कुंभ मेले को लेकर ‘संदेश’ दिया गया कि ‘कुंभ में हिन्दू अपने वृद्ध मां-बाप को छोड़ जाते हैं’।’ कुंभ को लेकर बनाए गए इस आपत्तिजनक वीडियो से पहले भी रेड लेबल के एक अन्य विज्ञापन में हिन्दुओं को कट्टर दिखाया गया था, जिसमें एक हिन्दू पति-पत्नी पड़ोसी मुस्लिम महिला के यहां चाय पीने को लेकर रूढ़िवादी दिखाए गए थे। इसके उलट रमजान को लेकर बनाए गए सर्फ एक्सल के वीडियो बेहद सकरात्मक दिखते हैं। हिन्दू त्योहारों पर कभी पानी बचाने, कभी प्रदूषण, कभी शोर, कभी उन्हें महिला विरोधी बताकर उनकी आलोचना करना एक तरह फैशन बन गया है, लेकिन मोहर्रम पर सड़कों पर खुद पर हिंसा करते मुस्लिम बच्चों, बकरा ईद पर कुर्बानी के नाम पर पशु हिंसा पर समाज कल्याण का कोई विज्ञापन आज तक नहीं बना।
सवाल है कि क्या रचनात्मकता के नाम पर बार-बार एक ही धर्म को निशाना नहीं बनाया जा रहा ? क्या ऐसे विज्ञापन दूसरे मत-पंथों पर बन सकते हैं? क्या मोहर्रम पर सड़कों पर खुद को प्रताड़ित करते बच्चों को बचाने के लिए रेड लेबल चाय रूढ़िवादी मुस्लिमों का दिमाग खोलेगी? क्या सड़क पर कटते जानवरों को देखकर डरे किसी हिन्दू बच्चे को कोई मुस्लिम बच्ची बचाकर मंदिर तक छोड़कर आएगी ? क्या होली के रंगों को दाग बताने वाले खून के धब्बों को दाग बताने के हिम्मत जुटा पाएंगे ? सुधार की तलवार और सामाजिक सद्भावना, सब एकतरफा ही क्यों हैं?
यह सिर्फ कमर्शियल विज्ञापनों तक सीमित नहीं है, फिल्म हैदर में मार्तण्ड सूर्य मंदिर को ‘शैतान की गुफा’ दिखाया गया है? क्या किसी मस्जिद को इस तरह दिखाया जा सकता है? महिला समलैंगिक संबंधों पर बनी फिल्म फायर में दोनों प्रधान महिला चरित्रों के नाम सीता और राधा रखे गए। क्या ऐसे ही कभी फातिमा और मारिया नाम की दो महिला चरित्रों के बीच अंतरंग दृश्य फिल्माए जा सकते हैं?
विवाद सिर्फ फिल्मों और कमर्शियल विज्ञापनों से ही जुड़ा नहीं है। यह एक तरह की मानसिकता है जिसमें मुसलमान हमेशा ‘दुखी, पीड़ित व उदारवादी’ है और हिन्दू हमेशा ‘कट्टर, रूढिवादी, असंवेदनशील’ दिखाया जाता है। यह मानसिकता विज्ञापनों और फिल्मों, यहां तक कि इतिहास लेखनों, सामाजिक सुधार के कार्यक्रमों, अखबारों के संपादकियों में भी सब जगह दिखायी देती है। हॉकी खिलाड़ी मीर रंजन नेगी के जीवन से प्रभावित फिल्म चक दे इंडिया में नायक का नाम कबीर खान कर दिया जाता है और फिल्म के माध्यम से यह बताया जाता है कि पाकिस्तान के हाथों एक मैच हारने पर एक मुस्लिम खिलाड़ी के साथ उसके पड़ोसी ऐसा अमानवीय व्यवहार करते हैं कि उसे घर छोड़कर जाना पड़ता है, जबकि असल जिंदगी में जिस मुसलमान खिलाड़ी पर मैच फिक्सिंग का आरोप लगा था वह मो. अजरुद्दीन घर छोड़ने की जगह लाखों के वोट पाकर लोकसभा पहुंच जाते हैं। लेकिन फिल्म मुसलमान ‘विक्टिम मोड’ को बढ़ावा देती है तो राष्ट्रीय पुरस्कार जीत जाती है। यही वह मानसिकता है जो साल दर साल, फिल्म दर फिल्म और विज्ञापनों के माध्यम से हममें रोपने की कोशिश की जाती है।
फिल्मों और विज्ञापनों के माध्यम से मुसलमानों को लगातार ‘पीड़ित’ व हिन्दुओं को ‘शोषक’ दिखाना एक तरह का चलन हो चला है। इसका विरोध करने की जगह इस मानसिकता को और हवा दी जा रही है। इतिहास लेखन में तो यह मानसिकता और क्रूर हो जाती है। 1920 के दशक में केरल के मालाबार में हुए हिन्दू नरसंहार, जिसे दंगा भी नहीं कहा जा सकता, को वामपंथी इतिहासकार ‘किसान विद्रोह’ कहकर संबोधित करते हैं। वामपंथी इतिहासकार इसे किसानों का जमीदारों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह बताते हुए कहते हैं कि ‘क्योंकि ज्यादातर मजदूर, किसान मुसलमान थे और जमींदार हिन्दू थे इसलिए इसे दंगा समझ लिया गया, वास्तव में यह दंगा नहीं था, जमींदारों के खिलाफ किसान विद्रोह था’। इसी तरह कश्मीर से हिन्दुओं के पलायन के लिए वे सरकारी नौकरी में उनके संख्या से अधिक प्रधिनिधित्व और राजा हरि सिंह के समय मुस्लिमों के साथ किए गए कथित शोषण को जिम्मेदार बताते हैं। विभाजन के लिए भी हिन्दुत्ववादी सोच के समर्थकों को द्विराष्ट्र सिद्धांत के समर्थक के तौर पर पेश करने की कोशिश की जाती रही है।
इस्लामिक कट्टरता एक हकीकत है। आधी दुनिया इससे जूझ रही है। खुद मुस्लिम देश इससे सर्वाधिक प्रभावित हैं, लेकिन इसकी आलोचना और जवाबदेही तय करने की जगह भारत में हिन्दू उपहास व विरोध का चलन है। इस देश में घूंघट एक कुप्रथा कही जाती है, पर बुर्का या हिजाब मजहबी आजादी। हिन्दू मर्दों के लिए बहुविवाह अपराध है, पर मुस्लिम मर्दों के लिए जायज। दहेज पर सख्त कानून हो सकता है, लेकिन तीन तलाक पर सजा का प्रावधान करना मुस्लिम मर्दों को जेल भेजने की ‘साजिश’। जिन्हें यह लगता है कि ऐसे तुष्टीकरण या पीड़ितवाद से वे मुसलमानों क भला कर रहे हैं तो उन्हें दोबारा सोचना चाहिए कि ऐसा करके वे मुसलमानों, हिन्दुओं और देश तीनों का नुकसान कर रहे हैं। हिन्दुओं के लिए ईद की सैवइयां खाना और क्रिस्मस पर केक खाना उदारता है तो मुस्लिमों के लिए भी होली के दाग अच्छे रहने दीजिए। क्योंकि दूसरे मत को सम्मान देकर अगर दाग लगते हैं तो वे दाग अच्छे हैं।