चुनाव से पहले देश के हर कोने में बेआबरू होती कांग्रेस
   दिनांक 22-मार्च-2019
2019 के चुनाव में मतदान से पहले ही कम से कम एक नतीजा तो आ चुका है. कांग्रेस ऐसे मुकाम पर आ खड़ी हुई है, जहां उसके पुराने सहयोगी ही उसे छोड़कर भाग रहे हैं या बांह मरोड़ रहे हैं. गठबंधन की इस राजनीति में कांग्रेस को देश के हर कोने पर अपमान का घूंट पीना पड़ रहा है
कांग्रेस क्या किसी संक्रामक रोग से ग्रस्त है. 134 साल पुरानी पार्टी. आजादी के बाद के 72 साल में 55 साल एकछत्र शासन. और आज. आज 44 सांसदों पर सिमटकर मुख्य विपक्षी दल का दर्जा तक गंवा देने वाली कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में खाता तक न खोल पाने वाली बहुजन समाज पार्टी दुत्कार रही है. राष्ट्रीय जनता दल बांह मरोड़ रहा है. महागठबंधन का बिगुल फूंकने वाली ममता बनर्जी ने दूध से मक्खी की तरह अलग निकाल फेंका है. चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र प्रदेश में हाथ झटक दिया है. कांग्रेस की इस हालत के दो ही जाहिरा कारण हो सकते हैं. या तो कांग्रेस ऐसी किसी संक्रामक राजनीतिक बीमारी का रूप ले चुकी है कि एक सूबे तक सिमटे दल भी इसकी पऱछाई से भाग रहे हैं. या फिर दूसरा कारण ये कि कांग्रेस राजनीतिक रूप से बेअसर और अप्रांसगिक होकर अपने पतन की ओर बढ़ रही है.
कुछ घटनाओं पर गौर करना जरूरी है. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन किया. सीटें आपस में बांट ली. कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को करिश्मे की उम्मीद में उत्तर प्रदेश में उतार तो दिया लेकिन जमीनी हकीकत सामने आते-आते जमीन ही खिसक गई. ये नया भारत है. यहां किसकी नाक किससे मिलती है, इस पर अब वोट तय नहीं होता. इसके बाद कांग्रेस ने बैक डोर से गठबंधन में एंट्री की कोशिश की. सात सीटें सपा और बसपा के लिए छोड़कर ये दर्शाने की कोशिश की कि हम भी सपा और बसपा के गठबंधन के साथ हैं. मायावती राजनीति की घाघ खिलाड़ी हैं. उन्हें पता था कि ये कांग्रेस ने मतदाताओं के बीच कन्फ्यूजन पैदा करने का दाव चला है. उन्होंने तुरंत साफ किया, हमें किसी से कोई सीट नहीं चाहिए. हमारा कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन नहीं है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी के साथ गलबहिया करके खुद को यूपी के लड़के करार देते अखिलेश यादव ने भी चंद सेकेंड बाद साफ कर दिया कि कांग्रेस से हमारा कोई गठबंधन नहीं है. इतनी एलर्जी. हकीकत ये है कि बसपा और सपा दोनों इस तथ्य से बखूबी वाकिफ हैं कि वोटर के मामले में कांग्रेस की जेब खाली है. वह गठबंधन में शामिल ही इसलिए होना चाहती है कि सपा और बसपा का वोट चुराकर अपनी जेब में डाल लें. साफ शब्दों में कहें, तो यूपी की राजनीति में कांग्रेस नॉन प्लेयर है और किसी भी गठबंधन के लिए एक बोझ से ज्यादा कुछ नहीं.
तीन सूबों के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को हार का सामना करना पड़ा, तो तमाम विपक्षी दलों को उम्मीद जागी कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी हराया जा सकता है. कोलकाता और दिल्ली में तमाम नजारे सामने आए. इसमें एक-दूसरे की जड़ खोदते विपक्षी नेता एक मंच पर थे. महागठबंधन का हल्ला था. इस महागठबंधन के नाम पर गैर कांग्रेसी विपक्ष ने एक जाल बिछाया और कांग्रेस उस जाल में फंस गई. महागठबंधन का जुमला पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने उछाला. ममता बनर्जी ने कोलकाता में मेगा शो किया, जिसमें कांग्रेस की ओर से उसके नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल हुए. कांग्रेस को लग रहा था कि नरेंद्र मोदी को रोकने की अभियान की अगुआई उसे मिलने वाली है. इन्हीं ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की सभी 42 सीटों पर उम्मीदवार घोषित करके कांग्रेस को जोरदार झटका दिया. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस वामपंथी दलों क साथ गठबंधन में चुनाव लड़ती है. ममता ने पहले कांग्रेस को अपने मंच पर बुलाया और फिर चुनाव के समय धक्का दे दिया. अब ममता के दर से बेआबरू कांग्रेस ने आखिरी मौके पर वामपंथी दलों का रुख किया. देखा तो वहां भी नजारा बदल चुका था. कांग्रेस की मजबूरी का फायदा वामपंथी दल उठा रहे हैं. 32 सीटों पर उन्होंने अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है. वामपंथी दल सिर्फ चार सीट कांग्रेस के लिए छोड़ना चाहते हैं, जो इस पार्टी ने पिछले चुनाव में जीती थीं. कांग्रेस की हालत ये है कि वह अभी तक 11 उम्मीदवारों के नाम की ही घोषणा कर सकी है.
 
जो बंगाल में हुआ, वही पैंतरा चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र प्रदेश में दिखाया. उन्होंने कांग्रेस से गठबंधन खत्म करके चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया, तो कांग्रेस हक्की-बक्की थी. ठीक बंगाल की तरह आंध्र में भी कांग्रेस सिर्फ अपने बूते चुनाव में उतरने के लिए तैयार ही नहीं थी. बिहार में कांग्रेस को लगता था कि राष्ट्रीय जनता दल के साथ उसका गठबंधन सहज है. लेकिन तेजस्वी यादव बहुत तेज निकले. कांग्रेस को चारों ओर से मिलते झटकों में उन्होंने भी अपना रंग दिखाया. कांग्रेस बिहार की 40 में से 15 लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ना चाहती थी. राजद ने जब इस पर साफ इंकार कर दिया तो कांग्रेस 11 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गई. लेकिन राजद खुद 19 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुका है. गठबंधन में कांग्रेस को महज 9 सीट देने की पेशकश की गई है. कांग्रेस के सामने इसे स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. आप समझ सकते हैं कि ये गठबंधन नहीं मजबूरी का सौदा है.
 
अगर आप राज्यवार देखेंगे, तो पाएंगे कि ये चुनाव कम कांग्रेस के अपमान का शो ज्यादा है. कभी देश पर एकछत्र राज करने वाली पार्टी की इससे ज्यादा क्या दुर्गति होगी कि महाराष्ट्र में प्रकाश अंबेडकर का भारिपा बहुजन महासंघ बाकायदा बयान जारी करके कहता है कि कांग्रेस के साथ वह किसी सूरत में गठबंधन नहीं करेंगे. दिल्ली में आम आदमी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन की बेहद इच्छुक है, लेकिन यहां कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व समझ रहा है कि अरविंद केजरीवाल गठबंधन के नाम पर कांग्रेस के राजधानी में बचे-खुचे वजूद को भी निगल लेना चाहते हैं. कर्नाटक में बातचीत के दौर चल रहे हैं. जनता दल सेक्यूलर कांग्रेस की राष्ट्रीय मजबूरी देखते हुए आंखें दिखा रहा है. यहां भी सीटों का बंटवारा अभी तक फाइनल नहीं हो सका है. तमिलनाडु में द्रमुक गठबंधन के नाम पर इस तरह का नजारा जनता के सामने पेश कर रही है कि वह मानो कांग्रेस पर कोई अहसान कर रही हो.
अगर आप इसकी तुलना राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन करेंगे, तो पाएंगे कि वहां भारतीय जनता पार्टी क्षेत्रीय दलों के साथ ज्यादा बेहतर तालमेल बना पाई है. बिहार में जनता दल यूनाइटेड और लोकजनशक्ति पार्टी के साथ गठबंधन बिल्कुल स्पष्ट है. तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बिछी जा रही है. महाराष्ट्र में नाराज शिवसेना सीटों के बंटवारे से संतुष्ट है और मिलकर चुनाव लड़ रही है. असम में असम गण परिषद के साथ गठबंधन और सीटों का बंटवारा हो चुका है. उत्तर प्रदेश में अपना दल (अनुप्रिया) अब भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में हैं. दो सीटों पर ये पार्टी गठबंधन में चुनाव लड़ेंगी. पूर्वोत्तर के सात राज्यों में पार्टी का गठबंधन घोषित हो चुका है. सीटों के बंटवारे पर किसी तरह का कन्फ्यूजन नहीं है.
ये तुलना इसलिए जरूरी है कि राजनीतिक दल का नेतृत्व ही उसकी ताकत होता है. राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में समान विचारधारा के दलों को ही साथ लाने में विफल नजर आ रहे हैं. पुराने गठबंधन सहयोगी तक बिदक रहे हैं. कांग्रेस के लिए 2019 का चुनाव मतदान से पहले ही एक रिजल्ट तो कम से कम ले आया है. कमजोर नेतृत्व, खिसकते जनाधार, देश विरोधी ताकतों के साथ खड़े होने की आदत उनके युवराज को शायद ही कभी प्रधानमंत्री बना सके.