मनोहर पर्रिकर एक अनथक योद्धा
   दिनांक 22-मार्च-2019

चंद माह पहले आहट हुई थी, उसके बाद अनहोनी का अंदेशा गहराता गया और अंतत: वह दुखद घड़ी आ ही गई।
गोवा के मुख्यमंत्री, देश के पूर्व रक्षा मंत्री और भाजपा के एक बेहद रचनात्मक और संभावनाशील कद्दावर नेता ने 17 मार्च को इस जग से असमय विदा ले ली। वे अग्नाशय कैंसर से पीड़ित थे।
मनोहर पर्रिकर राजनेता थे। राजनेता कई हैं और कई अन्य हो सकते हैं।
वे कुशल प्रशासक थे, कई अन्य लोग अच्छे प्रशासक—हो सकते हैं।
उनकी जैसी सादगी, काम के प्रति समर्पण, और तो और जीवटता के भी उदाहरण मिल जाएंगे।
फिर अंतर क्या है? अंतर यह है कि ये सब गुण-विशिष्टताएं अलग-अलग व्यक्तियों में तो मिलती हैं, किन्तु किसी एक व्यक्ति में ये सब दिखें, ऐसा उदहारण सरलता से नहीं मिलता।
पर्रिकर जी का जीवन इन समस्त विशिष्टताओं का सम्मिश्रण रहा।
गोवा जैसे छोटे राज्य में पर्यावरण का नाश करने पर तुले खनन माफिया से लोहा लेना हो या मत-पंथ और भाषा की विभाजक राजनीति को परास्त करने की बड़ी चुनौती, संगठन को प्रभावी बनाना हो या प्रशासन को जवाबदेह और पारदर्शी, उन्होंने जो काम हाथ में लिया, पूरा कर दिखाया।
मनोहर पर्रिकर का जाना कितनी बड़ी घटना है, इसका आभास तो अखबारी जगत की हलचलों से लगता है, किन्तु उन्होंने बिना कोई हलचल-कोलाहल पैदा किये जो काम किये, उनके बारे में आज भी लोगों को कम ही जानकारी है। यह इस कारण भी है, क्योंकि एकदम अलग-अलग प्रकार के कार्यों को मनोहर पर्रिकर जिस तरह डूबकर पूरा करते थे, उससे वे तात्कालिक कार्य और उनसे जुड़े आयाम इस प्रकार घनीभूत हो उठते थे कि पिछले अन्य कार्यों या उपलब्धियों की चर्चा ही दब जाती थी। खासकर राष्ट्रीय फलक पर देश के रक्षा मंत्री रहते हुए, ‘वन रैंक वन पेंशन’ जैसे चर्चित निर्णय के इतर भी, उन्होंने जो कार्य किये। उनका संज्ञान यदि न भी लिया जाए तो भी उन निर्णयों और कार्यों का दीर्घकालिक लाभ और प्रभाव देश की रक्षा-सुरक्षा पर रहेगा।
लक्ष्य पाने के लिए पूरे परिदृश्य पर बारीकी से बिंदुवार सोचना और फिर हर बिंदु को जोड़ते हुए विस्तृत योजना बनाना, ये उनकी कार्यशैली की विशेषता थी। यह अभियांत्रिकी पृष्ठभूमि वाले पर्रिकर ही थे जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर सोच में बदलाव, उचित सैन्य तैयारी और निर्णय प्रक्रिया में तेजी के तीन अलग-अलग आयामों को रेखांकित किया और इसके अनुरूप एक समग्र योजना पर काम किया। उनके कार्यकाल में यह बात तय हुई कि सीमा पर राइफल की, मशीनगन की, गोलियों की कमी है या फिर बुलेटप्रूफ जैकेट की कमी है तो सीमा पर तैनात सैन्य अधिकारी उसे अपने हिसाब से खरीद सकते हैं। पहले उत्तरी कमान को 10 करोड़ रु. तक की सैन्य सामग्री खरीदने का अधिकार था, उन्होंने इसे बढ़ाकर 50 करोड़ तक कर दिया।
किसी मुद्दे को समस्या मान लेने की बजाय वे उसके मूल में जाते थे और निराकरण के अतिरिक्त अनावश्यक भ्रमों को चुटकियों में छांटते जाते थे। सेना में अफसरों की कमी के प्रश्न को ही लें, वे मानते थे कि एक तो अधिकारियों को प्रशिक्षण देने की एक प्रकिया होती है, दूसरे सैन्य अफसरों की कमी का मुद्दा ज्यादा अफसर स्वीकृत करने के कारण ज्यादा बड़ा दिखता है। लगातार संयत गति से हर वर्ष 500-600 सैन्य अधिकारी बढ़ाते हुए तथा सैन्य अकादमियों की ट्रेनिंग देने की क्षमताओं में बढ़ोतरी का मार्ग प्रशस्त कर उन्होंने इस प्रश्न को सुलझाने की राह बनाई।
संख्या बल में प्रभावी, किन्तु नेहरू काल से ही हथियारों तथा उपकरणों की कमी झेलते सैन्य बलों के लिए उन्होंने ठंड में काम करने वाले उपकरण, बंदूकों, गोलियों और मोर्टार आदि की कमी को दूर किया। एक लाख बुलेटप्रूफ जैकेट के लिए आदेश दिये। इसके अतिरिक्त 1 लाख 86 हजार बुलेटप्रूफ जैकेट का नियमित अनुबंध करने की पहल करने वाले भी पर्रिकर ही थे। बड़े युद्धक हथियारों के मामले में भारत का तोपखाना और आयुध भंडार लम्बे समय से खाली से ही थे। 1984 में बोफर्स तोप खरीदे जाने के बाद 33 साल में तोपखाने के लिए कोई खरीद नहीं की गई थी। पर्रिकर के रक्षा मंत्री रहते हुए आर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड में बनी तोप ‘धनुष’ को स्वीकृति मिली। हल्के लड़ाकू विमानों की तीन दशक से लटकी योजना को पूरा करने के लिए उन्होंने सभी एजेंसियों को 16-17 बार एक जगह बैठाया और उनकी जो भी दिक्कतें थीं, उनका समाधान किया। पुराने भारी जंगी मिग-21 विमानों को थोड़ा-थोड़ा करके बाहर कर हल्के युद्धक विमानों (एलसीए) की योजना भी उनके कार्यकाल में बनी। नौसेना की शक्ति को अभूतपूर्व रूप से बढ़ने वाली पहली विश्वस्तरीय पनडुब्बी का जलावतरण हुआ।
आवश्यकताओं का मूल्यांकन और समस्या समाधान के अतिरिक्त सोच में ऐसा बदलाव, जो समस्या को केवल तात्कालिक तौर पर हल करने की बजाय निर्मूल करे, पर्रिकर उस समाधान के लिए निर्भयता से कदम बढ़ाते थे। उदाहरण के लिए, पहले आतंकी हमला होने पर सैनिकों की सोच रक्षात्मक होती थी लेकिन उन्होंने स्पष्ट कहा कि ‘यदि कोई आतंकी सीमा पार करके आता है तो बिना अपने लोगों को खोए सीधे उसे खत्म करने की कार्रवाई करें। यदि कोई समस्या आती है तो मुझसे सीधी बात की जाए।’ सेना को अधिकार मिले तो सेना का मनोबल बढ़ा।
यह समग्र और दूरगामी सोच ही थी कि तीनों सेनाओं की जरूरतें पूरी करने के अलावा देश का रक्षा मंत्री हथियारों और गोलाबारूद से हटकर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी सचेत करता रहता था।
समाज के नेतृत्वकर्ताओं को कैसा साफ, सादा, सहज, दृढ़, निर्णयक्षम और इस पर भी पारदर्शी व्यक्तित्व वाला होना चाहिए, मनोहर पर्रिकर इसका अप्रतिम उदाहरण थे। व्यक्ति निर्माण क्या है और संघ की संस्कारशाला में ढला नेतृत्वकर्ता कैसा हो सकता है, इसका उदाहरण भी मनोहर पर्रिकर थे।
वे जिस जीवट के साथ अंतिम श्वास तक राष्ट्रकार्य में लगे रहे, उससे संघ प्रार्थना की ये पंक्तियां अनायास याद आती हैं-
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे, पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते...
परिश्रम की पराकाष्ठा दिखाते हुए, आखिरी पल तक मातृभूमि के कार्य में रत रहे मनोहर पर्रिकर को पाञ्चजन्य परिवार की श्रद्धाञ्जलि!