फिर से मोदी सरकार बनने की उम्मीद से रुपया हुआ मजबूत
   दिनांक 22-मार्च-2019
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए के दोबारा सत्ता में वापसी आने के मजबूत संकेतों के चलते डॉलर के मुकाबले रुपये को मजबूती दी है। पिछले पांच हफ्तों में एशियाई अर्थव्यवस्था में रुपया सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गई है। भारतीय रुपये की दशा और दिशा हाल के वक्त में बेहतर दिखायी पड़ती है। इसकी वजह यह है कि भारतीय पूंजी बाजार में निवेश करने वाले निवेशकों को भारत की स्थिति बेहतर दिखायी पड़ रही है। कुछ समय पहले तमाम आशंकाओं के चलते ऐसा देखा गया था कि भारत के पूंजी बाजार में निवेश करनेवाले निवेशकों ने अपनी पूंजी को देश से बाहर खींचना शुरु कर दिया था। अब भारत की राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता में पूंजी बाजार के विदेशी निवेशकों का विश्वास बेहतर हुआ है और इसी वजह से भारतीय शेयर बाजार और रुपया दोनों ही मजबूत स्थिति में आये हैं।
रुपया मजबूत होने का आशय यह होता है कि पहले एक डॉलर के मुकाबले 74 रुपये से ज्यादा की रकम मिल रही थी, अब एक डालर के बदले 69 रुपये से कम की रकम मिल रही है। यानी डॉलर पहले के मुकाबले कम रुपये खरीद पा रहा है, रुपया ज्यादा डॉलर खऱीद पा रहा है। जैसे जैसे एक डॉलर के मुकाबले कम और कम रुपये खरीदे जाने का दृश्य बनेगा, वैसे वैसे ही कहा जा सकेगा भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले ज्यादा मजबूत हो रहा है। रुपये के कमजोर या मजबूत होने की वही वजह होती है जो किसी भी बाजार में किसी भी आइटम के कमजोर या मजबूत होने की होती है। अगर बाजार में किसी आइटम की आपूर्ति खूब जबरदस्त है और मांग कमजोर है, तो निश्चय ही उस आइटम के भाव गिरेंगे। अगर किसी आइटम की मांग जबरदस्त है और आपूर्ति उसके मुकाबले नहीं हो पा रही है, पक्के तौर पर उस आइटम के भाव बढ़ेंगे। रुपये के भाव तब बढ़ते हैं, जब इसकी मांग बाजार में बढ़ती है। मांग इसकी तब बढ़ती है, जब विदेशी निवेशक भारत में डॉलर लेकर आते हैं और इनके बदले रुपये लेते हैं और भारतीय बाजार में निवेश करते हैं। बढ़ता विदेशी निवेश भारत के रुपये को मजबूत करता है। हाल के महीनों में के आंकड़े देखें, तो साफ होता है कि मार्च 2019 में 22 मार्च तक पूंजी बाजार के विदेशी निवेशक भारतीय पूंजी बाजार में करीब 27000 करोड़ रुपये का निवेश कर चुके हैं। यह दो सालों में भारतीय पूंजी बाजार में विदेशी निवेशकों द्वारा किया गया सबसे बड़ा पूंजी निवेश है। करीब दो साल पहले भारतीय पूंजी बाजार में विदेशी निवेशकों ने 33000 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम लगायी थी। उसकी एक राजनीतिक वजह थी। वह वजह यह थी कि राजनीतिक तौर पर बहुत ही महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया था। अभी मार्च के महीने में पूंजी बाजार में निवेश की एक बड़ी वजह यह है कि भारत में आगामी चुनावों के बाद एक स्थिर सरकार का अनुमान किया जा रहा है। पूंजी बाजार उम्मीदों और आशंकाओं पर चलता है। इसलिए भविष्य को लेकर जो उम्मीदें लगायी जाती हैं, उनके असर अभी से शेयर बाजारों पर दिखाई पड़ने लगते हैं।
मुंबई शेयर बाजार का संवेदनशील सूचकांक सेनसेक्स एक महीने में करीब सात प्रतिशत चढ़ चुका है और एक साल में यह करीब 16 प्रतिशत चढ़ गया है। भारतीय पूंजी बाजार में विदेशी निवेश के बढ़ने का सीधा फायदा सेनसेक्स को होता है। सेनसेक्स के बढ़ने का एक आशय यह होता है कि भारतीय निवेशक और विदेशी निवेशक भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीति में एक न्यूनतम स्थिरता को लेकर आश्वस्त हैं। भारतीय रुपये के मजबूत होने की एक वजह और है कि कच्चे तेल के भावों को लेकर आशंकाएं कम हो गयी हैं।
अक्तूबर 2018 में ब्रेंट कच्चे तेल के भाव आसमान छू रहे थे। उस वक्त आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं कि ये 90 डालर प्रति बैरल तक का भाव छू सकते हैं। अब यह भाव करीब 67 डालर के आसपास हैं। यानी कच्चे तेल को लेकर भारतीय अर्थव्यवस्था राहत महसूस कर सकती है।
इस तरह से कुल मिलाकर भारतीय अर्थव्यस्था में रुपये, सेनसेक्स और पूंजी बाजार में विदेशी निवेश की चाल के प्रति एक न्यूनतम आशावाद महसूस किया जा सकता है। इसके मूल में एक बड़ी वजह यह है कि विदेशी निवेशकों को भारतीय अर्थव्यस्था और राजनीति में एक न्यूनतम स्थिरता दिखायी दे रही है।