मोदी सरकार ने बदला भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य क्षेत्र का चेहरा
   दिनांक 23-मार्च-2019
- सुमन कुमार                              
अब जबकि लोकसभा चुनावों की रणभेरी बज चुकी है और सभी पार्टियां मैदान में ताल ठोक रही हैं तो ऐसे में स्‍वाभाविक रूप से विभिन्‍न क्षेत्रों में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की सफलताओं और विफलताओं का आकलन किया जाएगा और किया जाना भी चाहिए। ऐसा ही एक क्षेत्र है जन स्‍वास्‍थ्‍य का। ये एक ऐसा क्षेत्र है जो आजादी के बाद से ही तकरीबन उपेक्षित रहा और इसकी वजह पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा इसमें पर्याप्‍त रूचि न लेना भी रहा। मगर पीएम मोदी ने इस क्षेत्र को भी उसी गति से विकास के रास्‍ते पर ले जाने का प्रयास किया है जो गति उन्‍होंने सड़क, बिजली, पानी, रेलवे आदि में दिखाई है। यहां हम नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा स्‍वास्‍थ्‍य क्षेत्र में उठाए गए कदमों पर एक निगाह डालते हैं:
 
आयुष्‍मान भारत
इस योजना के बारे में पहले ही इतना अधिक लिखा और बताया जा चुका है कि हम सिर्फ संक्षेप में ही इसकी चर्चा करेंगे। मोदी सरकार की इस सबसे महत्‍वाकांक्षी योजना का लक्ष्‍य इस देश में हर गरीब को मुफ्त में गुणवत्‍ता पूर्ण चि‍कित्‍सा सुविधा उसके अपने घर के पास मुहैया कराना है। इस योजना के तहत देश के 10 करोड़ गरीब परिवारों का हर वर्ष 5 लाख रुपये तक का इलाज सरकारी या निजी अस्‍पताल में मुहैया कराया जाता है। ये एक बीमा आधारित योजना है जिसमें गरीब व्‍यक्तियों का कार्ड बनाया जाता है और उस कार्ड को दिखाकर वो योजना में शामिल किसी भी अस्‍पताल में मुफ्त इलाज की सुविधा ले सकते हैं।
 
मेडिकल कॉलेजों का जाल
हमारे देश में आबादी तेजी से बढ़ी मगर उसके अनुपात में डॉक्‍टर नहीं बढ़े क्‍योंकि दशकों से देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्‍या नहीं बढ़ी। अगर भूले भटके किसी सरकार ने मेडिकल कॉलेज खोल भी दिया तो उसका इस प्रकार प्रचार किया जाता मानों जनता पर कोई अहसान किया गया हो। मोदी सरकार ने इस स्थिति में बदलाव लाने के लिए देश के हर तीन संसदीय क्षेत्र के बीच एक मेडिकल खोलने की योजना पर काम शुरू किया। इसके तहत 20 राज्‍यों/केंद्र शासित प्रदेशों के 58 जिला अस्‍पतालों का चयन कर उन्‍हें मेडिकल कॉलेजों में बदलने और इसके अनुरूप सुविधाएं जुटाने की योजना लागू की। खास बात ये है कि इसमें आर्थिक रूप से संपन्‍न राज्‍यों के बदले ऐसे राज्‍यों के जिला अस्‍पतालों को चुना गया है जहां स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं वास्‍तव में बेहद खराब हैं। ये योजना पूरी तरह धरातल पर उतरने के बाद देश में स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं में गुणात्‍मक बदलाव आने के साथ डॉक्‍टरों की कमी भी पूरी हो पाएगी।
एमबीबीएस सीटों में बढ़ोतरी
वर्ष 2014 से पहले देश में एमबीबीएस की करीब 30 हजार सीटें थीं। मोदी सरकार ने पिछले पांच वर्षों में अलग-अलग राज्‍यों में फैले सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की 10 हजार नई सीटें जोड़ने की मंजूरी दी और इसके लिए पूर्वोत्‍तर के राज्‍यों में 90:10 के अनुपात में खर्च का बंटवारा किया। यानी इस मद में होने वाले खर्च का 90 प्रतिशत भार केंद्र सरकार और 10 प्रतिशत संबंधित राज्‍य सरकारों पर डाला गया। अन्‍य राज्‍यों के मामले में ये अनुपात 70:30 का रखा गया है।
देश में एम्‍स या उसके समकक्ष अस्‍पतालों का जाल
इस देश की स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं में गुणात्‍मक बदलाव लाने की सोच सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने दिखाई थी। किसी जमाने में पूरे देश में सिर्फ एक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्‍थान दिल्‍ली में हुआ करता था जिसके कारण वहां इलाज के लिए आने वाले मरीजों की भीड़ रोज रिकॉर्ड तोड़ती थी। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने देश में 6 नए एम्‍स खोलने पर काम शुरू किया। मोदी सरकार ने इसमें भी गुणात्‍मक बदलाव लाने का फैसला किया और देश के अलग-अलग शहरों में तीन नए एम्‍स और 13 एम्‍स जैसे नए अस्‍पताल बनाने का फैसला किया। इन सभी पर काम तेजी से चल रहा है।
स्‍वास्‍थ्‍य बजट में गुणात्‍मक वृद्धि
मोदी सरकार ने शासन संभालने के बाद स्‍वास्‍थ्‍य क्षेत्र के बजट में लगातार बढ़ोतरी की है। इस क्षेत्र को लेकर सरकार की गंभीरता इसी बात से समझी जा सकती है कि शासन के पहले ही साल में मोदी सरकार ने कुल बजट का 1.8 फीसदी हिस्‍सा स्‍वास्‍थ्‍य पर खर्च किया और 2019-20 के बजट में कुल बजटीय आवंटन में स्‍वास्‍थ्‍य क्षेत्र की हिस्‍सेदारी उन्‍होंने 2.2 फीसदी पर पहुंचा दी। कांग्रेस सरकार के आखिरी पूर्ण बजट यानी 2013-14 के बजट में स्‍वास्‍थ्‍य क्षेत्र के लिए 37 हजार 330 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था जबकि मोदी सरकार के आखिरी पूर्ण बजट 2018-19 में ये राशि 54 हजार 600 करोड़ रुपये रही थी। यानी आजादी के बाद के 66 सालों में जो बजटीय आवंटन 37 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचा था, मोदी सरकार ने सिर्फ 5 साल में उसमें 17 हजार करोड़ रुपये अधिक की वृद्धि कर दी।
बाल मृत्युदर घटी
किसी भी देश में बच्‍चों का स्‍वास्‍थ्‍य उस देश के स्‍वास्‍थ्‍य क्षेत्र की सेहत मापने का सबसे अच्‍छा पैमाना हो सकता है। इस मामले में मोदी सरकार ने शानदार काम किया है। भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्‍चों की विभ‍िन्‍न वजहों से होने वाली मौत के मामले में साल 2012 के मुकाबले 2017 में 30 प्रतिशत की कमी आ गई है और इस मामले में भारत अब वैश्विक औसत की बराबरी पर पहुंच गया है। साल 2012 में देश में 5 वर्ष से कम उम्र के 14 लाख बच्‍चों की मौत हुई थी जबकि 2017 में ये आंकड़ा 9 लाख 89 हजार पर आ गया है। वैसे अभी 2018 के आंकड़े आने बाकी हैं।
गर्भवती महिलाओं की मृत्‍युदर भी घटी
बच्‍चे को जन्‍म देने के दौरान माताओं की मौत का आंकड़ा भी मोदी सरकार के दौरान तेज गति से गिरा है। साल 2011-13 के दौरान प्रति एक लाख जीवित जन्‍म में माताओं की मौत की संख्‍या 167 थी जो कि साल 2014-16 के दौरान गिरकर 130 रह गया। ऐसा इसलिए हुआ क्‍योंकि ज्‍यादा से ज्‍यादा महिलाओं को घर की बजाय अस्‍पताल में डिलिवरी का मौका मिला।
टीबी उन्‍मूलन का महत्‍वाकांक्षी अभियान
दुनिया में टीबी उन्‍मूलन का सबसे बड़ा अभियान नेशनल स्‍ट्रैटजिक प्‍लान मोदी सरकार ने 2017 में शुरू किया और इसका लक्ष्‍य 2025 तक देश से टीबी का उन्‍मूलन कर देना है। गौरतलब है कि पूरी दुनिया में टीबी उन्‍मूलन के लिए 2030 का लक्ष्‍य तय किया गया है मगर भारत सरकार उससे पांच साल पहले ही ये लक्ष्‍य हासिल करना चाहती है।