तो इस वजह से वायनाड से चुनाव लड़ेंगे राहुल गांधी
   दिनांक 25-मार्च-2019
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने पारिवारिक संसदीय सीट अमेठी में संभावित चुनावी हार से भयाक्रांत होकर दक्षिण का रुख कर रहे हैं। राहुल गांधी अमेठी के अलावा केरल की वायनाड संसदीय सीट से भी चुनाव लड़ेंगे। अमेठी में जीत के प्रति खतरे को देखते हुए राहुल को कर्नाटक कांग्रेस ने भी कर्नाटक से चुनाव लड़ने का आमंत्रण दिया था। कर्नाटक में कांग्रेस सत्ता में भी है। इसके बावजूद राहुल गांधी वामपंथी शासन वाले केरल की वायनाड संसदीय सीट से क्यों लड़ेंगे, यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है।
परिसीमन के बाद बना संसदीय क्षेत्र
इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए वायनाड संसदीय क्षेत्र की राजनीतिक-सामाजिक संरचना के बारे में जानना समीचीन होगा। वायनाड कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा से सटा 1980 में गठित जिला है। यहां अधिकांश निवासी केरल राज्य की भाषा मलयाली की बजाय कन्नड़ बोलते हैं। 2008 में परिसीमन के बाद वायनाड जिले की विधानसभा सीटों के साथ पड़ोस के मल्लपुरम और कन्नूर जिले की कुछ विधानसभा सीटों को मिलाकर वायनाड संसदीय सीट का गठन किया गया। यहां अब तक दो बार लोकसभा चुनाव हुए हैं। 2009 में हुए पहले चुनाव और 2014 में हुए दूसरे चुनाव में, दोनों बार यहाँ से कांग्रेस के प्रत्याशी एम.आई. शानावास विजयी हुए। नवंबर, 2018 में शानावास की मृत्यु हो गयी।
मुस्लिम-इसाई आबादी प्रभावी
इसके अलावा केरल वह राज्य है जहां राजनीतिक रूप से हिंदू बहुत प्रभावी नहीं हैं। यहां मुस्लिमों की जनसंख्या लगभग 28 प्रतिशत और ईसाइयों की जनसंख्या लगभग 18 प्रतिशत है। केरल वह राज्य है जहां देश का पहला गिरिजाघर और पहली मस्जिद बनी। चौथी शताब्दी से ही अरब के व्यापारी यहां मसालों का व्यापार करने के लिए आने लगे थे। सातवीं-आठवीं शताब्दी तक ये अरब व्यापारी स्थानीय लोगों से घुलने-मिलने लगे और कुछ यहां रहने लगे। इसी के साथ यहां इस्लाम में कन्वर्जन का सिलसिला चल निकला।
यूडीएफ का वोटबैंक
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार वायनाड में 28.65 प्रतिशत जनसंख्या मुस्लिम और लगभग 21.34 प्रतिशत जनसंख्या ईसाई हैं, यानी मुस्लिम और ईसाई मिलाकर 49.99 प्रतिशत है। यहां हिंदुओं की जनसंख्या 49.48 प्रतिशत है। वायनाड ही वह जिला है जहां सेंट विन्सेन्ट चर्च ने क्षेत्र के हर कैथोलिक परिवार को पांचवें बच्चे के जन्म पर 10 हजार रुपये देने की घोषणा की थी। केरल की राजनीति पर नजर रखने वाले जानते हैं कि यहां कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) का राजनीतिक आधार मुस्लिम और ईसाई जनसंख्या ही है। हिंदू आमतौर पर वाम खेमे के वोटर माने जाते हैं जिनमें भाजपा सेंध लगा रही है।

अरबी संस्कृति के नजारे
वायनाड संसदीय सीट में आंशिक भागीदारी करने वाला मल्लपुरम जिला एक तरह से केरल में अरबी संस्कृति का नजारा दिखाता है। प्रवासी भारतियों से देश में भेजे जाने वाली विदेशी मुद्रा का 40 प्रतिशत हिस्सा केरल में आता है और केरल में आने वाली विदेशी मुद्रा का 20 प्रतिशत हिस्सा अकेले मल्लपुरम जिले में आता है। यहां अरबी संस्कृति का इतना प्रभाव है कि यहां अरबी व्यंजनों के रेस्टोरेंट, अरबी माध्यम के स्कूल और अरबी लिबासों की दुकानें भी खुल गयी है। यहां की कई मस्जिदों में अरबी भाषा में ही कामकाज होता है। यहां के तमाम युवा अपने धार्मिक विश्वासों के लिए इंटरनेट पर उपलब्ध अरबी गुरुओं के संपर्क में रहते हैं और उनमें इस्लाम के कट्टर सलफी संप्रदाय का असर बहुत तेजी से बढ़ा है।
शिवभक्त कार्ड पर भरोसा नहीं
महज सवा साल पहले दिसंबर, 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव और उसके बाद मई, 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनावों में मंदिर-मंदिर घूम कर स्वयं को शिवभक्त साबित करते राहुल गांधी इसीलिए अमेठी की हिंदू बहुल सीट के मतदाताओं पर भरोसा न करते हुए केरल की वायनाड सीट से अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं जहां मुस्लिम और ईसाइयों की संयुक्त जनसंख्या हिंदुओं से थोड़ी अधिक है और दूसरे यह कि हिंदू मतदाताओं में वाम मोर्चा और भाजपा, दोनों में बंटवारा है।
 
वेटिकन और खाड़ी देशों का भरोसा
दरअसल, केरल के चुनाव में वेटिकन सिटी के चर्च और खाड़ी के देशों का बहुत हस्तक्षेप रहता है। ईसाई मां और पारसी पिता की संतान राहुल गांधी समझ चुके हैं कि विमान से वाया नेपाल उनकी मानसरोवर यात्रा और मंदिरों में जाकर माथा टेककर वह चुनाव नहीं जीत सकते। ऐसे में उन्हें हिंदू मतदाताओं की बजाय वेटिकन सिटी के सहयोग से वायनाड के इसाई मतदाताओं और अपनी तुष्टिकरण की नीति के आधार पर मुस्लिम मतदाताओं का ही भरोसा रह गया है।
बड़े धोखे हैं इस राह में
हालांकि 2014 के आम चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशी को यहाँ से महज 20 हजार मतों के अंतर से ही जीत मिली थी। तब वाम प्रत्याशी को 28 प्रतिशत और भाजपा प्रत्याशी को 8 प्रतिशत वोट मिले थे। इसलिए मुस्लिम और इसाई मतदाताओं की बहुलता के बावजूद यह कहना कि यहां से राहुल गांधी विजयी ही होंगे, फिलहाल जल्दबाजी होगी।
इसके अलावा एक बात और जो राहुल गांधी की वायनाड से जीत के आड़े आ रही है, वह यह कि क्या राहुल गांधी का कद इतना बड़ा है कि वह देश के किसी भी संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ कर जीत जायें? जो नेता ऐसा करते रहे हैं उन राजनेताओं की एक राष्ट्रव्यापी छवि रही है जिसके आधार पर वे भिन्न भाषाई क्षेत्रों में भी समान रूप से पसंद किये जाते रहे हैं। लेकिन राहुल गांधी के साथ अभी ऐसा नहीं है। एक सांसद के रूप में वे अमेठी को मॉडल रूप दे देते तो भी उनके हिस्से एक उपलब्धि होती। संसद की बहसों में कोई ठोस भूमिका निभाने में वे असमर्थ पाए गये हैं। मौजूदा लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में वह सरकार के खिलाफ कोई आंदोलन खड़ा करने या सरकार को घेर कर उसे घुटनों के बल ला देने में भी अभी तक असहाय दिखे हैं। ऐसे में वायनाड की जनता उन्हें हाथों-हाथ ले, इसका कोई ठोस आधार तो नहीं दिखता।