वामपंथ का हो रहा पतन, सब तोड़ रहे नाता
   दिनांक 25-मार्च-2019
 -कर्नल मूल भार्गव (से.नि.)                         
 
कभी पूरी दुनिया को अपने प्रभाव में समेटने में सक्षम दिखने वाली राजनीतिक विचारधारा, मार्क्सवाद, आज लुप्तप्राय है। अब यह शोध का विषय है कि जिन लोगों ने सर्वहारा (वंचितों) के नाम पर लड़ाई शुरू की थी वे ही कैसे अब धार्मिक कट्टरपंथ और अल्पसंख्यकवाद की सबसे नशीली अफीम को ठीक ठहराने के काम में लग गए हैं। दुनिया के हर कोने में वामपंथी आज जनतंत्रों और उनके निर्वाचित नेताओं को गाली देने के लिए नए-नए शब्दों, परिभाषाओं और सिद्धांतों को गढ़ते हुए तालिबान, अल कायदा, लश्कर-ए-तयबा और इस्लामी घेराबस्तियां बनाने के प्रयासों को औचित्यपूर्ण साबित करने की कोशिश में लगे हैं। इसे समझने के लिए हमें पहले मार्क्सवाद के इतिहास में जाते हुए दुनिया में इसके प्रसार के बारे में समझना होगा।
“कार्ल मार्क्स के प्रसिद्ध सिद्धांत ‘द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ में मूल रूप से छह निर्णायक ऐतिहासिक चरण थे - आदिकालीन साम्यवाद, दासता, सामंतवाद, पूंजीवाद, सर्वहारा की तानाशाही और अंत में साम्यवाद।”
 
मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी व्यवस्था में ‘वंचितों’ का शोषण इस हद तक बढ़ जाएगा कि क्रांति हो जाएगी और उसके बाद कामगारों-मजदूरों (सर्वहारा) की तानाशाही स्थापित होगी जो अंततः पूर्ण साम्यवाद की ओर जाएगी। उनकी समझ इंग्लैंड और जर्मनी की तत्कालीन परिस्थितियों से पैदा हुई थी जहां औद्योगीकरण और पूंजीवाद के कारण शोषण सचमुच शोचनीय स्तर तक पहुंच गया था। इसीलिए मार्क्स ने कल्पना की कि अंततः वंचित समुदाय पूंजीवाद के खिलाफ क्रांति करेगा। यह 1860-70 की स्थितियां थीं। कार्ल मार्क्स की 1883 में मृत्यु हो गई। जीवन भर वह इंग्लैंड और जर्मनी में क्रांति होने का इंतजार करते रहे, लेकिन वहां ऐसा हुआ नहीं।
उनकी मृत्यु के लगभग 35 वर्ष बाद यह ‘क्रांति’ घटित हुई पुराने जमाने के रूस में।
उस जमाने में रूस सामंतवादी समाज था और उसका औद्योगीकरण नहीं हुआ था। अतः मार्क्स के हिसाब से वहां की स्थितियां क्रांति के लिए पूरी तरह से उपयुक्त नहीं थीं, फिर भी ऐसा हुआ। लेनिन की समझ के हिसाब से यह ‘वर्ग संघर्ष’ था जिसके बारे में मार्क्स ने तीस साल पहले लिखा था। हालांकि, मार्क्सवादी सिद्धांतों की व्याख्याओं के क्रम में उन्होंने मूल छह चरणों में एक चरण साम्राज्यवाद को जोड़ा जिसके बारे में उनकी धारणा थी कि वह पूंजीवाद का चरम रूप है। इसीलिए उनकी निगाह में जार के खिलाफ हुई क्रांति वैचारिक आधार पर बिलकुल ठीक थी। लेनिन की भी मृत्यु 1924 में हो गई और उस समय भी रूस मुख्यतः कृषि आधारित अर्थव्यवस्था था। लेनिन के बाद स्टालिन सत्तारूढ़ हुआ और उसने कठोरता के साथ शासन करना शुरू किया। इसी दौर में वह पश्चिमी यूरोप के अन्य नेताओं के साथ श्रेष्ठता की गहरी होड़ में फंस गया। द्वितीय विश्व युद्ध आसन्न था और उसमें पश्चिमी के “साम्राज्यवादियों” के साथ युद्ध के लिए सोवियत संघ को आधुनिक हथियारों और युद्धक अवसंरचनाओं की आवश्यकता थी।
इस प्रकार, यह सोवियत संघ था जिसने बड़े पैमाने पर औद्योगिक विकास आरंभ किया। चूंकि रूस उस समय इंग्लैंड और जर्मनी से लगभग 100 साल पीछे चल रहा था इसलिए उसे उनकी बराबरी करने के लिए बहुत तेज गति से काम करना था। परिणामस्वरूप, धीरे-धीरे ही सही लेकिन निश्चित रूप से ‘वंचितों’ का राज्य नए औद्योगिक साम्राज्य में बदल गया और जल्दी ही वहां का सत्तारूढ़ वर्ग खुद बुर्जुआ वर्ग में बदल गया।
अब, मार्क्स के मुताबिक, यह नई स्थिति एक और क्रांति की ओर ले जाने के लिए परिपक्व परिस्थितियां पैदा करती थी। और ऐसा हुआ भी। सन 1980 के दशक में सोवियत संघ का पतन इस राज्य की बुर्जुआजी और अपने कम्यूनों को सर्वहारा में बदलने देने का प्रत्यक्ष परिणाम था। दूसरी ओर, उन देशों में क्रांति कभी नहीं हुई जहां के बारे में कार्ल मार्क्स ने क्रांति होने का अनुमान किया था। वे देश सुधारों की प्रक्रिया से गुजरते हुए कार्ल मार्क्स के बताये क्रांति की संभावनाओं को उत्प्रेरित करने वाले दो प्रमुख कारकों - श्रम-मजदूरी और खराब कार्यदशाओं - को बदलने में लग गए थे। अतएव, जिस एकमात्र स्थान पर क्रांति हुई थी वहां क्रांतिकारियों द्वारा शुरू की गई गतिविधियां खुद ‘गति के नियमों’ का शिकार हो गईं। इसके परिणामस्वरूप विश्व के लोकतंत्रों में मौजूद उन मार्क्सवादी नेताओं के सामने दिशाहीनता की स्थिति पैदा हो गई जो वहां की पूंजीवादी परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए क्रांति लाने की उम्मीदें पाले बैठे थे। अलबत्ता, ऐसी क्रांति कहीं हुई नहीं।
अब यूरोप के तुलनात्मक रूप से सुखी पूंजीवादी देशों और बिखरे हुए तथा टुकड़ों में बंट चुके साम्यवादी राज्य के साम्यवादियों ने विश्व भर में विश्वसनीय नेतृत्व खो दिया और उनकी वैचारिक दिशा भी खो गई। अमेरिका, भारत, आस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे बड़े लोकतंत्रों में उनका राजनीतिक महत्व तेजी से खत्म हो रहा था। छिन्न-भिन्न हो चुके मार्क्सवादी सिद्धांतों को नए सिरे से गढ़ा जाना था और नए नामों के साथ उनका औचित्य स्थापित किया जाना था। इसीलिए, इन लोगों ने ज्यादातर जगहों पर कट्टर साम्यवादी होने के बिल्ले से पीछा छुड़ा कर ‘मानवतावादी’, ‘प्रगतिशील’, ‘उदारवादी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ या सीधे-सीधे ‘बौद्धिक’ जैसी नई पहचानें अपना लीं। उन लोगों ने इन शब्दों को अपने लिए गढते हुए इन व्याख्यात्मक पदों पर पेटेंट जैसा हासिल करते हुए इन्हें केवल वामपंथियों के लिए सुरक्षित कर दिया। केवल नए नाम ग्रहण करना उनके लिए पर्याप्त नहीं था तो अपने समर्थकों और विश्वासों को बनाए रखने के लिए उन्होंने नए वर्ग-संघर्ष की पहचान भी कर ली। उन्हें नए बूर्जुआ समुदाय और नए सर्वहारा की भी पहचान करनी पड़ी। ऐेसा करने वालों को यह मौका मिला नाजियों और फासीवादियों से जिन्होंने विशिष्ट राष्ट्रवाद के तथ्यहीन सिद्धांतों के सहारे बड़े पैमाने पर नरसंहारों को अंजाम दिया था। चूंकि सोवियत संघ द्वितीय विश्वयुद्ध के सबसे बड़े पीड़ितों में था, साम्यवादियों ने ‘राष्ट्रवाद-विरोधी’ हल्ले-गुल्ले का नेतृत्व संभालते हुए पूरी दुनिया को डराने का अभियान शुरू कर दिया था। इस प्रयास में वे भूल गए थे कि नाजीवाद राष्ट्रवाद का खराब उदाहरण था और उसे अमेरिका, ब्रिटेन और खुद रूस के सकारात्मक राष्ट्रवाद ने ही परास्त किया था। खुद स्टालिन ने कई अवसरों पर अपने सहयोगियों में जोश भरने के लिए रूसी राष्ट्रवाद का उल्लेख किया था।
राष्ट्रवादियों की नए बूर्जुआ समुदाय के रूप में पहचान करने के बाद उन्हें नया सर्वहारा भी गढ़ना पड़ा। औद्योगीकृत जगत में श्रमिक वर्ग के आम तौर पर सुखी होने के कारण नया सर्वहारा ढूंढ़ना उनकी बाध्यता थी क्योंकि प्रायोजित श्रमिक हड़तालों और डराने-धमकाने की कोशिशों के बावजूद सुधरा हुआ पूंजीवाद मजदूर-वर्ग के प्रति अनुदार और जानलेवा नहीं था। नए सर्वहारा को तलाशने का मौका दिया 80-90 के दशकों में मुस्लिम जगत पर अमेरिका और उसके सहयोगियों के हमले ने। किसी मुस्लिम देश ने साम्यवाद को अपने यहां फलने-फूलने नहीं दिया था सिवाय अफगानिस्तान के जहां थोड़े ही समय में जिहादियों ने अमेरिका की मदद से उसे उखाड़ फेंका था। लेकिन, इसके कुछ ही समय के बाद खुद अमेरिका ने मुस्लिम जगत पर कब्जा कर लिया और उसे ‘शैतान’ की संज्ञा दी जाने लगी थी। इससे पश्चिमी लोकतंत्रों में मुस्लिम आबादी का पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति मोहभंग हुआ और मानव अधिकारों या धर्मनिरपेक्षता की आड़ में इन नव कम्युनिस्टों ने उन पर कब्जा कर लिया। मुस्लिम जगत में पश्चिमी लोकतंत्रों की दखलंदाजी के साथ ही इन लोकतंत्रों में वामपंथियों को नया सर्वहारा वर्ग भी मिल गया।
"साम्राज्यवादी पश्चिम" के प्रेत से आतंकित मुसलमान आसानी से डराए और प्रभावित किए जा सकते थे और उन्हें क्रांति का हथियार बना कर उन लोकतंत्रों में सत्ता हासिल की जा सकती थी। इसने किसी लोकतंत्र में लोकमत का ज्वार नए पूंजीपतियों के खिलाफ मोड़ने के लिए चार से पांच प्रतिशत मतों का निर्णायक आधार भी प्रदान किया। इस स्थिति में "पूंजीवाद का चरम रूप साम्राज्यवाद है" के लेनिन के सिद्धांत की सटीक प्रतिध्वनि भी सुनने को मिल रही थी।
लेकिन इस्लामी दुनिया में मार्क्सवादी सिद्धांत के साथ एक बड़ी समस्या थी।
अधिकांश मुस्लिम देश मार्क्स के प्रसिद्ध उद्धरण "धर्म जनता की अफीम है" से सहमत नहीं थे क्योंकि इससे उनके स्वयं के अस्तित्व का खंडन होता था। फिर भी, उन्होंने पश्चिमी लोकतंत्रों में अपने हितों का समर्थन करने वाले इन नव-वामपंथियों को खुशी से स्वीकार कर लिया। जल्द ही, "साधन-सम्पन्नों और वंचितों" पर आधारित वास्तविक मार्क्सवादी भावना "धर्मनिरपेक्षता" और "धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों" जैसे नारों में खो गई। वामपंथियों ने धार्मिक कट्टरता के प्रति कार्ल मार्क्स की घृणा को अपनी सुविधा के मुताबिक दफन कर दिया और दुनिया के अधिकांश लोकतंत्रों में अल्पसंख्यक वोटों पर को अपनी ओर मोड़ने की कोशिशों में लग गए। आज, अधिकांश साम्यवादी या वामपंथी सभाओं में वैचारिक आधार के रूप में "द्वंद्वात्मक भौतिकवाद" की चर्चा शायद ही सुनाई पड़ती हो, लेकिन "धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा" के प्रति स्पष्ट समर्थन जरूर सुनने को मिलता है, भले ही इसके नाम पर हिंसक चरमपंथ की अनदेखी करनी पड़े।
मेरा भरोसा है कि आज की वामपंथी दुनिया और धार्मिक अतिवाद के प्रति इसके समर्पण को कार्ल मार्क्स अगर देख पाते तो बहुत दुखी होते। वास्तव में, नव साम्यवादी दायरों में मार्क्स का नाम जरूर रहता है, लेकिन उनके अपने ही अनुयायियों ने मार्क्सवाद को बहुत अच्छी तरह से जमीन के नीचे दफन कर दिया है।