सत्ता के लिए राहुल ने फिर चला 48 वर्ष पुराना झूठा दाव
   दिनांक 26-मार्च-2019
  1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी गरीबी हटाओ के नारे के साथ चुनावी मैदान में उतरी थीं, वह चुनाव जीत गईं। 48 साल बाद एक बार फिर राहुल गांधी ने एक बार गरीबों को न्याय देने की बात कहकर दाव खेला है, अब ये दाव कितना सफल होगा ये तो समय तय करेगा लेकिन एक बात स्पष्ट है कि कांग्रेस के दावे आज तक सिर्फ हवा —हवाई ही साबित हुए हैं
वर्ष 1971 के लोकसभा के आम चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं, गरीबी हटाओ – देश बचाओ’। ये वो वक्त था जब नेहरू के बाद के कांग्रेस के सभी दिग्गज के. कामराज, निजलिंगप्पा, मोरार जी देसाई, अतुल्य घोष, नीलम संजीव रेड्डी एक तरफ खड़े थे। पार्टी से निष्कासित इंदिरा गांधी ने कांग्रेस (रेक्वेजिशन) नाम से नई पार्टी बनायी थी। नेहरू के कांग्रेस के चुनाव चिह्न से इतर इंदिरा की पार्टी को नया चुनाव चिह्न मिला था। 1971 में चुनाव का समय आया। हल्की गुलाबी साड़ी पहने इंदिरा ने जनता के सामने बैठक कर तभी गरीबी हटाओ का नारा दिया और इस नारे के साथ देश भर में 300 चुनावी सभाएं कीं। इंदिरा की पार्टी को उस चुनाव में 352 सीटें मिलीं।
इंदिरा गांधी के पोते राहुल गांधी को यह किस्सा शायद यहीं तक बताया गया है। लेकिन जनता को याद होगा कि इस गरीबी हटाओ नारे की आड़ में क्या-क्या हुआ और कैसे अंतत: इसकी परिणति आपातकाल लागू करने की तानाशाही में हुई।
बाद में विरोधियों ने अगले चुनाव में इंदिरा के इसी नारे के खिलाफ जवाबी नारा दिया था – देखो इंदिरा का ये खेल, खा गयी राशन, पी गयी तेल। दरअसल, इस नारे के सहारे जीतने के दो वर्ष बाद ही देश में महंगाई इतनी बढ़ गयी कि जनता त्राहिमाम करने लगी और देशव्यापी प्रदर्शन शुरू हो गये। तब पांचवीं पंचवर्षीय योजना में गरीबी उन्मूलन की तीन प्रमुख योजनाएं शामिल की गयीं - ‘श्रीमान कृषक’, ‘खेतिहर मजदूर एजेन्सी’ और ‘लघु कृषक विकास एजेन्सी’। लेकिन इन योजनाओं से कोई फायदा नहीं हुआ। बोफोर्स कांड के बाद राजीव गांधी ने भी चुनावी जीत के लिए गरीबी उन्मूलन के नारे का सहारा लिया।
अब राहुल गांधी ने वर्ष 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस की जीत के लिए इसी गरीबी हटाओ के 48 वर्ष पुराने जुमले को नया जामा पहना कर पेश किया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 20 फीसदी गरीब परिवारों को सालाना 72 हजार रुपये नकदी देकर उनकी गरीबी दूर करने का वादा किया है। राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में कहा, 'अब हम हिंदुस्तान के गरीब लोगों को न्याय देने जा रहे हैं, जो न्यूनतम आय योजना होगी। यह एक ऐसी ऐतिहासिक स्कीम है, हिन्दुस्तान को छोड़िये, दुनिया में ऐसी स्कीम नहीं है। राहुल गांधी ने आगे कहा, 'अब हम आय गारंटी देकर दिखा देंगे। हम गरीबी मिटा देंगे। हमारा कहना है कि अगर आप काम कर रहे हो तो महीने में 12 हजार रुपये आय कम से कम होनी चाहिए।' इस योजना के तहत ऐसा किया जाएगा। जैसे- अगर किसी की इनकम छह हजार रुपये है, तो सरकार उसे 6 हजार रुपये और देगी। जब वह व्यक्ति 12 हजार की इनकम से ऊपर आ जाएगा, तो वह इस स्कीम से बाहर आ जाएगा।
48 साल का सबसे बड़ा चुनावी जुमला
राहुल के इस दावे कि - हम गरीबी मिटा देंगे – पर कई सवाल उठते हैं। सभी जानते हैं कि गरीबी हटाओ का नारा 48 वर्ष पूर्व उनकी दादी का था। पिछले 48 वर्षों में लगभग 29 वर्ष (1971 से 1976, 1980 से 1989, 1991 से 1996 और 2004 से 2014) कांग्रेस की सरकार रही है। गरीबी खत्म हुई क्या? मनरेगा योजना किस तरह कांग्रेस राज में भ्रष्टाचार का केंद्र बनी रही, यह सभी जानते हैं। इंदिरा गांधी के काल में भी गरीबी उन्मूलन योजनाओं का यही हश्र हुआ। इंदिरा के दूसरे कार्यकाल (1980-1984) में गरीबी उन्मूलन योजनाओं का क्या हश्र हुआ, यह उनकी हत्या के तत्काल बाद प्रधानमंत्री बनाये गये उन्हीं के पुत्र राजीव गांधी के इस बयान से साबित होता है कि केंद्र से चला एक रुपये गरीब तक पहुंचते-पहुंचते 15 पैसा रह जाता है। यही हाल यूपीए के कार्यकाल में रहा।
वर्ष 2011 में विश्व बैंक की एक रिपोर्ट आयी थी कि गरीबी से लड़ने के लिए भारत सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भ्रष्टाचार और प्रभावहीन प्रबंधन इसमें बड़ी बाधा है। इन्हीं कारणों से गरीबों के लिए बनी सरकारी योजनाएं सफल नहीं हो पायी हैं। स्मरण रहे इस रिपोर्ट से 7 साल पहले 2004 से कांग्रेस की ही सरकार थी।
राहुल-प्रियंका को सिर्फ दादी का सहारा
दूसरा सवाल यह उठता है कि आज क्या कांग्रेस के पास कोई नयी सोच नहीं है। राहुल गांधी अपनी दादी के नारे पर वोट पाना चाहते हैं और राहुल की बहन प्रियंका गांधी दादी से मिलती-जुलती अपनी नाक के आधार पर जनता से कांग्रेस के लिए वोट चाहती हैं। देश के लिए कांग्रेस अध्यक्ष की क्या सोच है, वे कैसा भारत बनाना चाहते हैं, विकास की उनकी अवधारणा क्या है, इस पर कांग्रेस और उसके अध्यक्ष खामोश हैं। राहुल गांधी हर काम करने वाले को 12 हजार रुपये न्यूनतम आय के वादे को ऐतिहासिक बता रहे हैं। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि क्या न्यूनतम आय गारंटी योजना राहुल के दावे के मुताबिक दुनियाभर में कहीं नहीं है? राहुल यहां या तो साफ झूठ बोल रहे हैं या उन्हें कोई जानकारी नहीं होती। फिनलैंड और कनाडा में बीते दो वर्ष के भीतर ऐसी योजनाएं शुरू की गयी थीं जो नाकाम रहने पर बंद कर दी गयीं जबकि स्विटजरलैंड के वोटरों ने ऐसी योजना को अस्वीकार कर दिया।
वादों पर अमल का नहीं रहा है कांग्रेस का इतिहास
यदि कांग्रेस के चुनावी वादों पर अमल की बात करें तो यही सामने आता है कि कांग्रेस चुनाव में वादे तो बढ़-चढ़ कर करती है लेकिन उस पर अमल के समय खामोश हो जाती है। और जिन वादों पर अमल होता दिखाया भी जाता है, उसमें भ्रष्टाचार के कारण जनता को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता। गरीबी हटाओ के नारे-वादे का विवरण तो आप पढ़ ही चुके हैं, अभी ताजा मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की ही बात ले लें। राहुल गांधी ने घोषणा की थी कि सरकार बनने के 10 दिन के भीतर किसानों के कर्जे माफ किये जायेंगे वरना मुख्यमंत्री बदल दिये जायेंगे। न दस दिन में वादा पूरा हुआ और बाद में हो-हल्ला मचने पर जो कार्रवाई हुई भी उसमें किसानों के साथ छल किया गया। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने वचनपत्र में बेरोजगारों को 10 हजार रुपये भत्ता देने का वादा किया था। लेकिन सरकार बनने के बाद कांग्रेस पीछे हट गयी और आखिरकार फरवरी, 2019 में बेरोजगारी भत्ते की घोषणा हुई भी तो महज 4000 रुपये की। वह भी यह भनक लगने पर कि मोदी सरकार देश भर के युवाओं को तीन से चार हजार रुपये तक का बेरोजगारी भत्ता देने की कवायद में जुटी है।
अगर कांग्रेस की सरकार बनने पर यह योजना अमल में आती है तो इस पर सालाना 3.60 लाख करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं। यह 2019-20 के बजटीय खर्च का 13 प्रतिशत हिस्सा होगा। यह रकम मोदी सरकार द्वारा कल्याण योजनाओं पर सालाना खर्च किये जा रहे 3.27 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा होगी। यह जीडीपी का 2 प्रतिशत हिस्सा होगा। इससे महंगाई भी 2 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है। निश्चित रूप से इससे वित्तीय अनुशासन बिगड़ेगा और अर्थव्यवस्था निढाल होगी। लेकिन सत्ता के लिए लालायित राहुल गांधी या कांग्रेस को इससे क्या फर्क पड़ता है।
 
कांग्रेस ने देश को गरीबी में डाला। कांग्रेस का नारा है- गरीब को नारे दो, उसे साधन मत दो। कांग्रेस का इतिहास गरीबी हटाने का नहीं बल्कि गरीबी हटाने के नाम पर व्यवसाय करने का रहा है। गरीबी हटाने के साधन पर भी उसका ध्यान नहीं रहा है। कांग्रेस के कार्यकाल में छल-कपट, धोखा होता रहा है। 2008 में कर्जमाफी के लिए 70 हजार करोड़ का कर्ज माफ करने की बात कही गयी, लेकिन कर्जमाफी हुई 52 हजार करोड़ की और इसमें भी दिल्ली के बड़े व्यापारियों का लाभ दिया गया। आज केंद्र सरकार 55 विभागों की योजनाओं के लाभार्थियों को डीबीटी के माध्यम से बैंक के खाते में सीधे लाभ दे रही है। राहुल गांधी द्वारा किये गये ऐलान से 1.5 गुना ज्यादा हम पहले से डीबीटी के माध्यम से गरीबों को दे रहे हैं।                                                                                                                                                                       - अरुण जेटली, वरिष्ठ भाजपा नेता, केंद्रीय वित्त मंत्री
 
 "क्या आरजी (राहुल गांधी) की न्यूतनम आय गारंटी (योजना) गेम चेंजर है या तुलना से परे निर्थक है? यह आइडिया मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण है और इसलिए तुलना से परे है."”                                                                                                                                        -  
सुरजीत भल्ला, अर्थशास्त्री
 
                                              
 
‘कांग्रेस के पुराने रिकार्ड को देखा जाये तो वह चुनाव जीतने के लिए चांद लाने जैसे वादें करती रही है। कांग्रेस अध्यक्ष ने जिस योजना की घोषणा की है, उससे राजकोषीय अनुशासन खत्म होगा, काम नहीं करने को लेकर एक प्रोत्साहन बनेगा और यह कभी क्रियान्वित नहीं होगा। न्यूनतम आय गारंटी योजना की लागत सकल घरेलू उत्पाद का 2 प्रतिशत तथा बजट का 13 प्रतिशत बैठेगा। इससे लोगों की वास्तविक जरूरतें पूरी नहीं हो पायेंगी।' 
                                                                                                 - राजीव कुमार, उपाध्यक्ष, नीति आयोग