सभ्यताओं का टकराव !
   दिनांक 28-मार्च-2019
 
क्राइस्टचर्च मस्जिद में हमला हो या नाइजीरिया में मजहबी जिहादियों द्वारा चर्च को जलाना और सैकड़ों ईसाइयों की हत्या, दोनों घटनाओं से यह बात साफ है कि इस आक्रामक कट्टरवादी गोलबंदी का निराकरण मानव को एकता और बंधुता के सूत्र में पिरोने वाली विश्व बंधुत्व की दृष्टि से ही हो सकता है
 क्राइस्टचर्च की वह मस्जिद जहां हमलावर ने अंधाधुंध गोलियां बरसा
न्यूजीलैंड में क्राइस्टचर्च की घटना दुनिया भर में सुर्खियों में है। मृतकों के शव, पीड़ितों के आंसू विचलित करने वाले हैं। घटना की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं। आरोपियों से पूछताछ हो रही है। निर्दोषों की जान लेने वाले इस उन्माद को समझने और नफरत का आधार जानने के प्रयास हो रहे हैं। किंतु क्या इतने भर से तस्वीर साफ होगी? क्या यह इकलौती घटना है या इस तरह की उन्माद की कड़ियां आपस में कहीं जुड़ती हैं? यहां एक और दुखद घटना का जिक्र करना जरूरी है, जिसकी चर्चा क्राइस्ट चर्च मामले की तरह मीडिया में नहीं हुई और जिसके लिए विश्व में मातम की लहर भी नहीं उठी।
फरवरी अंत से मार्च के पहले हफ्ते तक नाइजीरिया से कुछ ऐसी ही दिल दुखाने वाली सूचना आई, किंतु किसी ने ध्यान नहीं दिया।
खबर थी कि नाइजीरिया में उन्मादी मुसलमानों ने कजूरी प्रांत के मारो जिले में चर्च को तबाह कर दिया और 30 ईसाइयों की जान ले ली।
 
 नाइजीरिया में फरवरी, 2019 में फलूनी जिहादियों ने अल्लाहो-अकबर के नारे लगाते हुए 32 कैथोलिक ईसाइयों को मार डाला
मस्जिद या चर्च। गोलियां नाइजीरिया में भी बरसीं और न्यूजीलैंड में भी, निर्दोष लोगों की लाशें वहां भी गिरीं, यहां भी, मगर दोनों को अलग-अलग घटना के तौर पर दिखाया गया। शायद टुकड़ों में देखने की यह फितरत ही है कि लोग दुनिया में पलती और बढ़ती नफरत और पागलपन की पूरी तस्वीर देख नहीं पाते। नाइजीरिया हो या न्यूजीलैंड, शव देखे जा सकते हैं। किसी तरह आहतों-पीड़ितों के आंसू भी पोंछे जा सकते हैं। गोलियां भी गिनी जा सकती हैं लेकिन इतने से बात नहीं बनती।
नाइजीरिया की जिस घटना को 'द गार्जियन' सरीखें पत्रों ने सामुदायिक हिंसा के तौर पर प्रस्तुत किया या क्राइस्ट चर्च की घटना को आप्रवासियों के प्रति गहरा आक्रोश (जैसा कि अभियुक्त ने भी कहा) बताना काफी है?
इन घटनाओं को जातीय हिंसा समझा जाए या नस्लभेद या आप्रवासियों से जुड़ी समस्या?
सवाल यह है कि यह घटना यदि किसी अफ्रीकी जनजाति या आप्रवासियों, आप्रवासी कामगारों से जुड़ी है तो इसमें चर्च या मस्जिद का क्या काम?
शायद यह वही बिंदु है जिसे राजनीति विज्ञानी सेमुअल पी. हटिंग्टन ने 'सभ्यताओं के संघर्ष' का नाम दिया था। मस्जिद पर हमला करने वाला ब्रैंटन टेरेंट हो या चर्च पर हमला करने वाले मुसलमान, यह पागलपन ऐसा है कि निर्दोषों के खून से हाथ रंगने वाले को कोई पछतावा नहीं है और हिंसक विक्षिप्तता का यह घेरा पूरी दुनिया में बढ़ता ही जा रहा है।
भूमंडलीकरण के दौर में इन घटनाओं को न तो अलग-अलग देखा जा सकता है, न ही इन्हें सिर्फ स्थानीय माना जा सकता है। और सबसे बड़ी बात यह कि ऐसी घटनाओं के पीछे इतिहास में दबे बिंदुओं की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती।
ध्वस्त सीरिया से उखड़कर यूरोप के जनसांख्यिकीय रूप को सदा के लिए बदलने वाले 'आव्रजकों' की बाढ़ हो या रोहिंग्या घुसपैठियों का भारत में गरमाया मुद्दा, आहिस्ता से आने और अन्य संस्कृतियों को निगल लेने वाली एकेश्वरवादी लहर की कहानी एक ही है। कहानी जितनी नई है उतनी ही पुरानी भी है। आरंभिक तौर पर जितनी मानवीय और शांत, आगे चलकर उतनी ही क्रूर और थर्रा देने वाली।
यह कहानी है दुनिया को दो हिस्सों में चीरकर देखने वाले उस नजरिए की जिसके लिए इनसान और इनसान में फर्क है। इनसान और ह्यईमान वाले इनसानह्ण में फर्क है। यह कहानी घृणा में लिपटे मजहबी उन्माद और खून से लथपथ मानवता की कहानी है।
खुद को औरों से अलग और खास साबित करने की यह जिद्दी कहानी एकेश्वरवादी (सेमिटिक) सोच पर आधारित संकीर्णता की है। इसके एक छोर पर क्रिश्चियन ब्रदरहुड है तो दूसरे छोर पर इस्लामी उम्मत या द्विराष्ट्रवाद है। उधर बहुलताओं में विश्वास रखने वाले देश, धर्म, मत-पंथ, सभ्यताएं, इस संघर्ष में पिस रही हैं।
 
 क्राइस्टचर्च मस्जिद से घायलों को अस्पताल पहुंचाते हुए राहतकर्मी
भाषाविदों के अनुसार उर्दू-फारसी का उम्मत और अंग्रेजी का 'ब्रदर' समानार्थी शब्द हैं जिसका अर्थ है भाई। किंतु ब्रदरहुड और उम्मत की छतरियों तले इनका अर्थ सिर्फ इसे या मुसलमानों को अपना भाई मानने और अन्य को बाहरी, काफिर और घृणा तथा दंड के योग्य शत्रु मानना हो जाता है।
इतिहासकार मानते हैं कि इस नफरत और खासकर इस्लाम के साथ यूरोप सहित अन्य सभ्यताओं की तकरार का मुद्दा इस्लाम के अस्तित्व में आने के बाद से जिंदा है और अन्य संस्कृतियों का लहू पीकर अस्तित्वमान है। इतिहासकार प्रो. मक्खनलाल कहते हैं, 'यह ऐसा मुद्दा है जिस पर बात करने से कथित प्रगतिशील कतराते हैं। आमतौर पर समाजशास्त्री जिसके अध्ययन में नहीं उतरना चाहते। इतिहासकार भी इस प्रश्न और इसके प्रभाव को समग्रता में देखने की बजाय अलग-अलग घटनाओं के रूप में अंकित करके रह जाते हैं।'
समाजविज्ञानियों के अनुसार किसी एक घटना का सीमित आधार लिए बिना और किसी मत-पंथ के प्रति पूर्वाग्रह रखे बगैर इस मुद्दे के कुछ ऐतिहासिक संदर्भों और वैश्विक घटनाक्रमों को एक साथ सामने रखना जरूरी है।
भारत में द्विराष्ट्रवाद शब्द से भले देश विभाजन की त्रासदी का चित्र आंखों के आगे कौंधता हो लेकिन न्यूजीलैंड क्राइस्ट चर्च की घटना ने यह बात साबित कर दी है कि विभिन्न देशों की सरकारों के साथ इस्लामी टकराहट का प्रश्न आज पूरी दुनिया के सामने है। उसका स्वरूप ऐसा है कि यह सिर्फ किसी एक देश की बात नहीं रही, किसी एक वर्ग की बात नहीं रही, इसका भूगोल बदल गया है, इसका सामाजिक परिदृश्य बदल गया है। वास्तव में यह प्रश्न आज वैश्विक है। प्रो. मक्खनलाल कहते हैं कि भारत में यह घटना सामान्य हिंसा नहीं है। इसके पीछे कुछ घोर कट्टर आग्रह हैं जो किसी पर आधिपत्य के अलावा वहां की समझ और उसकी आस्था-विश्वासों को लांछित और नष्ट करने वाली घृणा तक जाते हैं। यह उम्मत और ब्रदरहुड का टकराव या कहिए, एक किस्म का हिंसक जिहाद है जिसमें अपनी बात मनवाने के लिए दूसरे की जान लेने से भी परहेज नहीं है। गौर कीजिए कि भारत ने भी ऐसा ही जिहाद और उससे मिले घाव झेले हैं। विभाजन का आधार बनी नफरत की जड़ें तलाशते हुए हम सिर्फ सौ वर्ष पीछे तक जाते हैं और भारतीय संदर्भों की सीमित छान-फटक में भटककर रह जाते हैं, यह हमारी भूल है। हमें ज्यादा पीछे जाना चाहिए। इस देश के भूगोल को लांघकर घटनाओं को देखना चाहिए।
बात ठीक है, हमें यह जानना चाहिए कि इस एक राष्ट्र के भीतर दूसरी पहचान-समझ में अपने आपसी टकराव का बीज आया कहां से? कैसे फूटा? कैसे पनपा?
 
 बोको हराम द्वारा आग के हवाले किया गया मध्य नाइजीरिया का एक चर्च
इतिहास से इसका जवाब हम उस्मानी साम्राज्य (ऑटोमन साम्राज्य) के उदय, फैलाव और संघर्षों की कहानियों से गुजरते हुए और यूरोप में इस्लाम के प्रवेश को समझते हुए देते हैं। स्पेन पर इस्लाम का आक्रमण 711 ईस्वीं में बनी उमैय्या के शासनकाल में हुआ। इटली का सिसली जब अरब असर में आया तब शायद पहली बार चीजें बदल गर्इं। यूरोप में इस्लाम की वह पहली आहट थी। वह देश के भीतर दूसरी पहचान के ऐसे आक्रमण की पदचाप थी जिसका इतिहास ने संज्ञान लिया। हंगरी अल्प समय तक इस्लाम के प्रभाव में रहा। लेकिन बाल्कन क्षेत्र (ऐतिहासिक तौर पर अल्बानिया, यूनान, बुल्गारिया, यूगोस्लाविया, रोमानिया के आस-पास का भूक्षेत्र) में इस्लाम का एक गहरा-स्थायी प्रभाव पड़ा। और जो हुआ हो, इस फैलाव से कम-अज-कम एक ऐसी दरार बनी जिससे दुनिया देख सकती थी कि इस्लाम अपने मूल स्वरूप में क्या है और वह अन्य सभ्यताओं और राष्ट्रों के साथ कैसा बर्ताव करता है। इस्लाम के साथ बाकी दुनिया का पहला बड़ा साक्षात्कार यहां से प्रारंभ होता है।
मगर सभ्यताओं की टकराहट के विश्लेषण में एक बात सूक्ष्मता से देखने की है-जब सेनाएं हथियार लेकर चलती हैं तो उनका व्यवहार क्या होता है? और जब पलटनें लौट जाती हैं तो पीछे समाज पर क्या असर छोड़ जाती हैं? ऐसी बड़ी घटनाओं से बदला हुआ समाज आगे कैसा बर्ताव करता है?
तलवारों के म्यानों में जाने के बाद यूरोप पर इस्लामी असर कल-कारखानों की घरघराहट तक में पैठ चुका था, पर इसे अनसुना किया गया।
यह असर युद्धोन्माद के बाद औद्योगिक क्रांति के साथ इस्लाम के ताजा बने संबंध से पैदा हुआ था। औद्योगिक क्रांति के समय एक रास्ता खुला था, देशों के लिए प्रगति और संपन्नता की संभावनाओं से जुड़ने का रास्ता। इस क्रांति ने सस्ते श्रमिकों के लिए आवश्यकता पैदा की। स्थानीय नागरिकों को जितने मौके मिले सो मिले, बड़े तौर पर यह भी हुआ कि मुस्लिम देशों से सस्ते श्रमिक यूरोप जाने लगे। एक प्रकार का संगठित अप्रवास, संगठित आव्रजन, दूसरे देशों में एक ही जगह बस्तियां बसाना, यह काम औद्योगिकीकरण के साथ ही शुरू हो गया था।
 
 अपने मुस्लिम पड़ोसियों के मारे जाने पर शोक जताते हुए क्राइस्टचर्चवासी
अलग-अलग देशों से आते अनजान मुसलमानों के लिए स्थानीय मुसलमानों की गजब की गर्मजोशी के बिना यह संभव नहीं था। पास-पड़ोस, मित्र-संबंधी, और तो और, अपने ही देश के अन्य गैर- मुस्लिम नागरिकों को चौंकाने वाली इस घटना का इतिहास और समाजशास्त्रियों द्वारा ठीक से संज्ञान लिया जाना चाहिए था, क्योंकि मुसलमानों को लेकर चौंकने की यह मुद्रा आगे चलकर अलग-अलग देशों, समाजों और सभ्यताओं की गहरी चिंताओं में बदलती चली गई।
संगठित घुसपैठ, पास-पास बसना, उच्च प्रजनन दर...औद्योगिक क्रांति के दौरान यूरोप ने मुस्लिम लहर के ये चिन्ह देखे। साथ ही पश्चिम के समाजों को धीरे-धीरे यह भी इलहाम हुआ कि जहां जाकर मुसलमानों ने रोजी-रोटी कमाई, जहां पर उन्हें अपने बच्चों का भविष्य देखना था, उस समाज और देश से घुलने-मिलने में उनकी ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। आपस में घुल-मिल और बाकियों से 'परे-परे'... इस्लाम की इस रुकावट (संकोच) को भी दुनिया ने उस समय से ही देखना शुरू किया।
दुनिया भर में मुस्लिम मान्यताओं के परस्पर संघर्ष की झलक देखनी हो तो ईरान-इराक के ऐतिहासिक शिया-सुन्नी संघर्षों से लेकर पाकिस्तान में लाल शाहबाज कलंदर जैसी सूफी दरगाहों पर वहाबी आत्मघाती हमलों को देखिए। दूसरे मत-पंथ में अपने लिए, अपनी अलग पहचान के साथ गुंजाइश बनाने वाले सबसे तेज आव्रजन के रिकॉर्ड देखने हों तो जर्मनी में सीरियाई मुस्लिम जमावड़े को देखिए। राजनीतिक तंत्र को अपनी जरूरत का औजार और अंतत: पंगु कर छोड़ने वाली ताबड़तोड़ घुसपैठ का उदाहरण देखना हो तो बांग्लादेश से लगते असम-बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों को देखिए, शरिया के प्रति संविधान से ज्यादा आग्रह और स्थानीय नागरिकों के साथ मुसलमानों के तीखे सशस्त्र संघर्षों को देखना हो तो ब्रिटेन-फ्रांस में ही खबरें भरपूर मिल जाएंगी। इस सब पर आज खबरों की भरमार है। मगर खबरें बिखरी हुई हैं। इनसे जुड़े तथ्य व आंकड़े पर्याप्त मात्रा में हैं, परंतु इन्हें एक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। इन सबसे एक तस्वीर सहज ही उभरती है जो काफी चिंताजनक है। विश्व में मुस्लिम वर्ग की पहचान एक ऐसे सामाजिक वर्ग के तौर पर हो रही है, जो अल्पसंख्यक है, घुसपैठिया है और आक्रामक है। सोचिए, क्या विश्व में किसी भी वर्ग के लिए ऐसी पहचान हितकारी है?
 
 मस्जिद में गोलीबारी में एक परिजन को गंवाने पर दुखी एक स्थानीय मुस्लिम
एक और सवाल है। आज यूरोप में सड़कों पर नारे लगते हैं- देश का कानून भाड़ में जाए, हमें शरिया चाहिए। आप गूगल पर इससे जुड़ा एक शब्द डालकर क्लिक करें, असंख्य चित्र और साक्ष्यों का अंबार लग जाएगा! तथ्यों की कमी नहीं है। हाल तक फ्रांस को खुलेपन की जमीन माना जाता था, फैशन की जमीन माना जाता था। माना जाता था कि नवाचार की लहरें सबसे पहले पेरिस से उठती हैं। स्लाव देशों को उन्मुक्तता की जमीन माना जाता था। यूरोप का आंगन नवाचार, मानवाधिकार, मानवीय गरिमा, समानता और अभिव्यक्ति की अलख से गुंजायमान रहता था। लेकिन अब क्या है?
इतिहास से उठी जिन आहटों की अनसुनी की गई थी वे भूगोल को भयाक्रांत करने लगी हैं।
स्थिति यह है कि नॉर्वे में 'ब्लॉन्ड' यानी सुनहरे बालों वाली लड़कियां अकेले सड़कों पर जाने से डरती हैं। अपने बाल काले रंग में रंगवाती हैं। क्यों? क्योंकि उन पर मुसलमानों द्वारा हमले होते हैं। मुसलमानों से अलग एथनिसिटी, अलग नस्ल, अलग पहचान यानी अपने घर के भीतर तक खतरे का न्यौता। 'ब्लॉन्ड' लड़की पहली ही नजर में मुसलमान नहीं लगती इसलिए हमले का खतरा बढ़ जाता है। फ्रांस, ब्रिटेन और नॉर्वे में उन देशों के भीतर उन्हीं देशों के झण्डे जलाए जाते हैं। रूस के राष्ट्रगान पर आपत्ति जताई जाती है। यह सिर्फ हमारे यहां की कहानी नहीं है कि प्रयागराज में एक स्कूल का मुस्लिम संचालक-प्रबंधक ऐसा कर रहा था। रूस के राष्ट्रगान पर मुसलमानों को यह आपत्ति है कि उसमें कुछ घंटियों की आवाज है, यह आवाज, उनके मुताबिक चर्च की घंटियों से मिलती-जुलती है। और अब उन घंटियों की आवाज तक से मुस्लिम लोगों की भावनाएं आहत होने लगी हैं!
मुसलमान यूरोप में बाहर से आए, यूरोप ने उन्हें जीवन में आगे बढ़ने का मौका पूरी उदारता से दिया, लेकिन वे नफरत की उस राह पर बढ़ते गए कि आज उन्हें यहां के लोगों के बालों के रंग, वेश-भूषा, भाषा और परंपरा सबसे बास आने लगी! और तो और, जो देश मुसलमानों का पालना बने, आज उनके राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगीत और संविधान तक पर मुसलमान बेहूदा आक्रामक आपत्तियां उठाने लगे हैं!
 
 उत्तर पूर्व नाइजीरिया में जिहादियों के बम धमाके से ध्वस्त चर्च
यह सिर्फ भारत में नहीं है कि न्यायालयों के संकेत और निर्देशों के बावजूद नमाज और लाउडस्पीकर को मुसलमानों द्वारा शक्ति प्रदर्शन के औजार के तौर पर इस्तेमाल किया गया। यह चुनौती वैश्विक स्तर पर हर गैर-मुस्लिम समाज और हर गैर-इस्लामी शासन व्यवस्था के लिए है। आज सड़क पर सामूहिक नमाज और लोगों को सुबह-सुबह लाउडस्पीकर की गरज परेशान करने की स्थिति तक जाने वाली जो बात है, यह ब्रिटेन और फ्रांस में भी दर्ज की जा रही है। सब कहते हैं कि भारत सांस्कृतिक बहुलता का देश है, जबकि कहना यह चाहिए कि यह सांस्कृतिक बहुलता का देश नहीं है, बल्कि यह संस्कृति बहुलता को स्थान देने वाली है। अति सहिष्णु है।
लेकिन सांस्कृतिक बहुलता के तर्क को हद से ज्यादा ढोने के क्या कुछ खतरे भी हैं? बहुलतावादी संस्कृतियों के सपनीले तर्क को छतरी की तरह तानकर, कालीन की तरह बिछाकर जगह-जगह जमे-बढ़े इस्लाम ने इस बहुलतावाद को खुद कितना स्वीकार किया है? दुनिया आज इस बारे में क्या अनुभव कर रही है? जर्मन चांसलर एंजेला मार्केल ने इस्लाम का नाम न लेते हुए कहा है-''यूरोप में बहुसंस्कृतिवाद विफल हो चुका है।'' मार्केल की बात से एक प्रश्न पैदा होता है-कि जब सांस्कृतिक बहुलतावाद विफल हुआ है, तो इसकी जगह क्या आया है? दरअसल इस खालीपन में पहले कुछ चिंताएं उभरीं और फिर समाधान रूप में कुछ ऐसे चमकते बिंदु हाथ आए जिनमें जर्मनी को भविष्य की राह दिख रही है।
मार्केल के नजरिए से देखें तो लोकतंत्र और मानवता को देखने, पहचानने और इस पर सवाल न उठाने का नजरिया, इसको स्थापित करने की जरूरत कुछ ऐसे बिन्दु हैं जिनसे बहुसंस्कृतिवाद के थोथे और खतरनाक गड्ढे भरे जा सकते हैं।
आज जर्मनी की शीर्ष नेता निष्कर्ष रूप में यह बात कह रही हैं कि बहुसंस्कृतिवाद की बजाय सिर्फ मानव स्वतंत्रता और लोकतंत्र के स्वरों को बल दिया जाना चाहिए।
पश्चिम में इस तर्क को लेकर मैदान में उतरने वाली वे अकेली नहीं हैं। हॉलैंड की फ्रीडम पार्टी कह रही है कि हम असहिष्णुता के प्रति बहुत ज्यादा सहिष्णु रहे हैं, पर अब हम हॉलैंड में हॉलैंड की संस्कृति चाहते हैं। फ्रीडम पार्टी की इच्छा है कि देश में बच्चों को हॉलैंड के मूल्यों से अवगत कराने वाली शिक्षा दी जाए।
जिसके साम्राज्य का सूरज नहीं डूबता था वह ब्रिटेन भी इस नए खतरे के उदय को देख रहा है।
टोनी ब्लेयर, जो कि ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री हैं, ने आक्रामक, उन्मादी इस्लाम के विरुद्ध यूरोपीय शक्तियों की एकजुटता का आह्वान किया। उनका मानना है कि रूस के साथ यूक्रेन के विषय पर मतभिन्नता के बावजूद इस्लामी आक्रामकता और कट्टरपंथ के खिलाफ सबको एक साथ आना होगा। एक अन्य पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन भी कह रहे हैं कि नफरत फैलाने वाले मजहबी नेता चाहे हिंसक हों या अहिंसक, समाज में कट्टरता को बढ़ावा दे रहे हैं।
कैमरन इस तर्क के प्रखर प्रवर्तक हैं कि ब्रिटेन में रहने वालों को ब्रिटिश जीवन मूल्य और जीवन पद्धति अपनानी ही होगी। इसका कोई विकल्प नहीं है। वे मानते हैं कि आज ब्रिटेन में ब्रिटिश जीवन मूल्यों को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने की जरूरत है।
 
 क्राइस्टचर्च मस्जिद से एक घायल को सुरक्षित स्थान पर पहुचाते हुए राहतकर्मी
इन सब बातों का क्या मतलब है? दुनियाभर में उठती इन चिंताओं में क्या कोई साझापन नहीं है?
कुछ समय पहले तक मुसलमानों के साथ अन्य वर्गों की टकराहट को सामान्य या छोटी-मोटी घटना के तौर पर देखा जाता था। ज्यादातर मामलों में तो खबर भी नहीं छपती थी। फिर घटनाएं और इनके प्रकार बढ़ने लगे। खबरें भी छपने लगीं। कुछ लोगों को अब भी ऐसी खबरें सिर्फ स्थानीय और बढ़ा-चढ़ाकर कही गई लगती हैं। ऐसा सोचना गलत है।
ठीक है कि हमारे पांव के पास जब एक तीली भी जलकर गिरती है तो वह हमें जंगल की आग से बड़ी लगती है, जलने के बाद हमारी प्रतिक्रिया ऐसी हो भी सकती है। मगर ध्यान से देखिए, तीली सिर्फ आपके पैरों के पास नहीं पड़ी। दुनिया के जंगल में जगह-जगह धुआं उठ रहा है। कहीं ह्यउम्मतह्ण और ह्यइत्तिहादह्ण (मुस्लिम एकता और भाईचारा) से प्रतिकार में छिटपुट रगड़ की चिनगारियां हैं तो कहीं जिहादी शोले भड़क रहे हैं। 
कुछ वर्ष पहले तक अलग-अलग देशों ने सिर्फ अपने पांव के पास का अंगारा ही देखा था। तब समस्या छोटी लगी, नजरिया भी छोटा रहा। परन्तु अब दुनिया इस्लामी कट्टरता और मानसिक संकीर्णता को पहचान रही है। कहने लगी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबसे बड़ी है, व्यक्ति की गरिमा सबसे बड़ी है, समाज के हितों को किसी की आस्था का बंधक नहीं बनाया जा सकता, यह लोग कहने लगे हैं। ज्यादा चिंता और दु:ख उत्पन्न करने वाली बात यह है कि इन सब के लिए, चाहे यह कुछ लोगों की करतूत की वजह से हो, परन्तु दोषी के तौर पर आज पूरे मुस्लिम वर्ग को लक्षित करके इस सबका जिम्मेदार कहा जा रहा है। सभी मुसलमानों को दुनियाभर के गैर मुस्लिम देशों में अनकही, लेकिन ज्यादा सतर्क सुरक्षा जांच से क्यों गुजरना पड़ता है? आखिर क्यों मौलवियों को घृणा संदेशों के संदिग्ध हरकारे के तौर पर देखा जाता है? क्यों ऊंचे पाजामे, झब्बा दाढ़ी और बुर्के को दुनिया अनकही आशंकाओं के साथ देखने लगी है? कुछ तो कारण होगा! 2012 में डच संसद ने बुर्के पर प्रतिबंध लगाया। डेनमार्क ने एक नियम बनाया कि आप हमारे देश में आएंगे तो आपको तीन साल हमारी भाषा की शिक्षा लेनी ही होगी। इतिहास और संस्कृति की परीक्षा अनिवार्य रूप से उत्तीर्ण करनी होगी। अभिव्यक्ति की आजादी, मानवीय स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर उंगली उठाने की आजादी किसी को नहीं होगी।
 
नाईजीरिया में बोको हराम द्वारा अगवा की गईं स्कूली छात्राएं (वीडियो से लिया गया फाइल चित्र) 
इन सब कदमों को उठाने का क्या कारण है? मुसलमानों की जरा-सी आलोचना, इस्लाम की खरी समीक्षाओं का रास्ता किसने बंद किया? किसे यह सब जरा बर्दाश्त नहीं? आज बेल्जियम में 'बेलचिस्तान' के बोर्ड लगे हैं, लोग कुछ नहीं कहते। उस डेनमार्क के लोग, जहां दूसरे विश्वयुद्ध में नाजियों के हाथ कमान आने से पहले रातोरात साढ़े सात हजार यहूदियों को अपने देश से बाहर स्वीडन भेज दिया गया था, वे गोरे लोग आज अपने देश की सड़कों पर लोगों को मरते हुए देखते हैं, खुद पिटते हैं, परेशान होते हैं। ये परेशानियां और इनका प्रतिकार आगे क्या रूप लेगा? अखबारों के दफ्तरों पर हमले, 'शार्ली एब्दो' के कार्टूनिस्ट की हत्या और मुसलमानों को लेकर पनप रही वैश्विक चिंताओं और प्रतिबंधात्मक उपायों के लिए उठती हलचलों में क्या कोई परस्पर संबंध नहीं है?
संबंध है। यह संबंध देशों और समाजों में बढ़ती उस फांक का है जिसे दुनिया ह्यकट्टरवाद की फांसह्ण के तौर पर पहचान रही है और इसके समाधान की आवश्यकता महसूस कर रही है।
ये सारी आशंकाएं और समाधान की आवश्यकताएं किसने पैदा कीं? ये आवश्यकताएं एकेश्वरवाद में अंतर्निहित उन तत्वों ने ही पैदा की हैं, जो इन्हें मानने वालों को बाकियों से मिलने नहीं देते। कैथोलिक अपनी बातों को लेकर जड़ हैं। इस्लाम अपने में मिलावट करने की गुंजाइश नहीं देता। अगर मेल की गुंजाइश नहीं है, तो लोग सिर्फ अपने खांचों और जमातों के खूंटे से बंधे रहने और उसी के मुताबिक बर्ताव करने के आदी हो जाते हैं। ऐसी साझा बाड़बंदी अच्छी बातों को, खुले मन से सोचने की आदत को बढ़ने नहीं देती, अपनी या फिर किसी भी बुरी चीज की समीक्षा के पर्याप्त मौके नहीं देती। बल्कि यह लोगों को जकड़ती है। नाइजीरियाई मुसलमानों या ब्रैंटन टेरेंट जैसे लोगों के दिमाग में खूनी पागलपन भरती है।
धीरे-धीरे खूंटे से बंधे लोग जंजीरों को ही अपनी ताकत का प्रतीक बताते हैं। और आतंकित लोगों की आवाज और अधिकारों को यह बाड़बंदी ही कुंद करती जाती है।
 
एक पीड़ित महिला को ढाढस बंधाते वक्त सिर पर हिजाब पहने हुए न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आरडर्न। इस तरह उन्होंने इसे तुष्टीकरण की ओर मोड़ दिया और घटना के मूल कारण से आम लोगों का ध्यान हट गया।  
उदाहरण के तौर पर चाहे तलाक का मसला हो, सम्पत्ति का मसला हो, इस्लामी फिरकों और मुस्लिम स्त्री-पुरुषों के बीच आंतरिक संघर्ष की चक्की सदियों से घरघरा रही है। यह लगातार चलती है और चलाने वालों को भी पीसती है। चक्की चली कैसी, निकला क्या, अच्छा-बुरा...किसी ने कभी परवाह ही नहीं की।
समीक्षा नहीं हुई, जांच नहीं हुई...धीरे-धीरे इसका शोर बढ़ता गया। आज पूरी दुनिया इस शोर की तरफ देख रही है। यह यूरोप की कहानी थी, अफ्रीका में तो और बुरी स्थिति है। वहां अल-शवाब है, बोको-हराम है। बोको का मतलब पश्चिम है, यानी पूरा पश्चिम ह्यहरामह्ण है। देश, काल, परिस्थितियां जो भी रही हों, मुसलमानों के लिए, आज भी वही सब सही है जो उन्हें बताया जाता है कि 'तब अरब से' आया था।
पश्चिम चाहे कहीं पहुंच गया हो, परन्तु पश्चिम हराम है। यह सोच क्या करा सकती है और इसके कैसे खतरे हैं, इसे समझने के लिए बोको हराम की एक करतूत का उदाहरण काफी है। इसी सोच के कारण क्योंकि जरा सी बड़ी हुई बच्चियों का स्कूल में पढ़ना हराम है इसलिए नाइजीरिया के चिबौक में स्कूल पर हमला करके 276 बच्चियों उठा लिया जाता है। वर्ष 2014 से उन बच्चियों में से 219 बच्चियों का अता-पता नहीं है। बोको हराम के नेता अबू-बकर शेकउ ने न सिर्फ वीडियो जारी करके इस अपहरण की जिम्मेदारी ली बल्कि यह भी कहा कि उसने यह अल्लाह के आदेश पर किया है, क्योंकि 'इस्लाम के हिसाब से 9 साल से बड़ी लड़कियों को स्कूल में नहीं होना चाहिए था। इतनी बड़ी लड़कियों का निकाह कर दिया जाना चाहिए था।'
कुरान और हदीस को आगे रखकर उठाए जा रहे ऐसे कदमों को मुसलमान कितना पचा पा रहे हैं, नहीं पता। परंतु यह कबाइली मानसिकता अफ्रीका, मध्य एशिया और यूरोप के साथ-साथ पूरी दुनिया में चिंता की लहरें पैदा कर रही है।
यह एक चित्र है कि यह हो कैसे रहा है। दूसरी बात यह है कि यह हो क्यों रहा है?
जब दुनिया में कहीं भी इस्लाम द्वारा नागरिकता और संविधान को ललकारा जाता है तब इस्लाम को ह्यउदारह्ण बताने वाले संभ्रांत प्रवक्ता किस पाले में होते हैं? उनके मन में अपने देश, संस्कृति और संविधान के लिए आदर का भाव उमड़ता है या सउदी अरब के लिए अज्ञात प्रेम ठाठें मारने लगता है?
1987 से लेकर 2007 तक सऊदी अरब वहावी शिक्षा के प्रसार पर, यूरोप के बच्चों को अपने यहां के वजीफे देने पर, उन्हें कट्टरपंथ की तरफ धकेलने पर 87 अरब डॉलर खर्च कर चुका था। पेट्रोल से उपजी एक संस्कृति ने बाकियों की संस्कृति को फूंकने का सामान तैयार किया और दुनिया भर के देशों में मुसलमान इस मुहिम को ताकत देते जुड़ते गए। क्या उनके मन में अपने देश की चिंता नहीं थी? या वे किसी अन्य एकता का सपना संजोते रहे? प्रश्न तीखा है मगर आज दुनिया भर में मुखर हो रहा है।
 
 नाइजीरिया में अगवा की गईं स्कूली छात्राओं की मांओं ने उन्हें छुड़ाने की मुहिम छेड़ी थी, पर किसी ने खास ध्यान नहीं दिया (फाइल चित्र)
चिंतक इस्लाम को विशुद्ध आस्था मानने को तैयार नहीं हैं। क्योंकि इस्लाम अकेला नहीं चलता, वह आस्था के साथ एक व्यवस्था की घोषणा करता हुआ राजनैतिक व्यवस्थाओं को ललकारते हुए चलता है। वह व्यवस्था किन लोगों के हित में है, कितने हित में है और इस ललकार के बाद अंत में कौन से देश और लोग बचेंगे? उन देशों का भूगोल किन बातों से निर्धारित होगा, इसकी समीक्षा करने के लिए विश्व में एक प्रक्रिया शुरू हुई है। अच्छी बात यह है कि वैश्विक चिंतन प्रक्रिया सिर्फ इस्लाम को कोसने का काम नहीं कर रही बल्कि इस उन्माद की रोकथाम पर विचार कर रही है। इस्लाम को बंधक बनाए बैठे इसके ठेकेदारों और शासकीय व्यवस्थाओं को उजागर कर रही है। इस्लाम में जड़ जमा बैठी बुराइयों को ललकारते हुए इसमें सामयिक बदलावों के लिए आवाज उठा रही है।
बेल्जियम के कोनराड एल्स्ट, बांग्लादेश की तस्लीमा नसरीन, अमेरिका की पामेला जैलर, कनाडा के तारेक फतेह और पाकिस्तान के हसन निसार या भारत के तुफैल अहमद और ताबिश सिद्दीकी जैसे लोगों का आपस में कोई संबध नहीं। ये दुनिया के अलग-अलग देशों के नागरिक हैं जो मुस्लिम द्विराष्ट्रवाद और उन्माद को अपने-अपने तरीके से देख रहे हैं। उपरोक्त नाम तो सिर्फ उदाहरण के लिए हैं। इनके अलावा भी विश्व के अनेक लोग साफगोई के उस साहसी अभियान में जुटे हैं जो इस कठमुल्लेपन को आईना दिखा रहा है। किसी देश में दरारें पैदा करने वाले कट्टरवाद को रेखांकित कर रहा है।
इस्लाम को जितनी मजबूती के साथ वहावी लोग प्रचारित करते हैं कि यह बढ़ रहा है, इसकी समीक्षा का आन्दोलन उतना ही जोर पकड़ रहा है।
बात ठीक है—अलग-अलग देशों को एक कठोर इस्लामी कवच में बांधने की योजना भीतर से बहुत ही भंगुर है। जो किसी एक सुधारक को सहन न कर पाए, समीक्षा की एक लाइन को सहन न कर पाए, जो तस्लीमा जैसी एक महिला की टिप्पणियों को सहन न कर पाए, जो समाज के अनुसार, देश के अनुसार ढल न पाए, वह अड़ा जरूर दिखे, परंतु कब तक चलेगा? सो, किसी एक देश के भीतर उस देश और समाज को ही चुनौती देने वाली अलग पहचान के मुद्दे पर इस्लाम अभी बहुत गंभीर स्थिति से गुजर रहा है। जिस दिन इसके भीतर समीक्षा की स्थिति आएगी, कड़वाहट और नफरत का बड़ा ढांचा टूटेगा, कट्टरवाद का ढांचा टूटेगा। परंतु नफरत यू ही नहीं बह जाया करती, विचार के साथ पर परिवर्तित विचार ही उसका ठीक समाधान और सहमान कर सकता है। बहुत संभव है कि नाइजीरिया या न्यूजीलैंड की घटनाओं से सबक लेते हुए कट्टरवाद का ढांचा भारत की जमीन से ही टूटे। क्योंकि जो पिंड में है, वही ब्रह्माण्ड में है, यह दर्शन अगर किसी ने दिया है, तो भारत की जमीन ने दिया है। सर्वशक्तिमान ही नहीं है, ईश्वर सबको एक नजर से देखने वाला भी है। आपको आपके कर्मों के लिए उत्तरदायी ठहराने वाला वही है। फैसला अगर उसको करना है तो फैसला करने का हक उसने अपने से पहले आपको नहीं दिया है। यह करने वाला भी ईश्वर है। अगर यह दर्शन भारत ने दिया है, तो इसी धरती से वह उत्तर भी निकलेगा।
अंत में इतना ही कि विश्वभर में विभिन्न देशों के सामने, उनके भीतर तैयार होती आक्रामक कट्टरवादी गोलबंदी का आज जो विकट चित्र है, उसका निराकरण पूरे जीव-जगत में तादात्मय देखने वाली, मानव को एकता और बंधुता के सूत्र में पिराने वाली एकात्म मानव दर्शन की दृष्टि के साथ ही हो सकता है।
हम इसका हल अपने पुरखों, परम्पराओं, जमीन और भारत की संस्कृति में ढूंढें। बहुलता है,परन्तु बहुलता का पालना और उसका सम्मान कराने वाली हमारी संस्कृति है, हमारे पुरखे हैं, हमारी परंपराएं हैं। ये वे शाश्वत तत्व हैं जो नागरिकों को सही गलत का ज्ञान और इस राष्ट्र को चिरंतन काल से प्राण देते रहे हैं। भारतीय संस्कृति के ये सूत्र हिंसा और उन्माद की अंधेरी परतों में लिप्त दुनिया को नई सुबह की रोशनी दिखा सकते हैं।
हत्यारे की राइफल पर युद्धों और आतंकवादियों के नाम- लेपांतों 1571 -लेपांतों का युद्ध। इस युद्ध में ऑटोमन हार गए और पूरे मध्य यूरोप में यूनानी साम्राज्य का विस्तार हुआ। बाजो पिव्ल्जनिन-17वीं शताब्दी का ऑटोमन शासन के खिलाफ लड़ाई में शामिल। सर्बिया और क्रोएशिया का हीरो। बैटल ऑफ बुलेयर 1913- ऑटोमन के खिलाफ बुल्गारिया की जीत। युद्ध का नेता जनरल जॉर्जी टोडोरोव। फ्रुझिन- बुल्गारिया का 15वीं शताब्दी का शासक। ऑटोमन के खिलाफ दूसरा युद्ध जीता था।