भ्रष्ट ठेकेदारों-इंजीनियरों पर छापे के खिलाफ सड़क पर उतरे जेडीएस-कांग्रेस नेता
   दिनांक 31-मार्च-2019
- अरुण जेटली           

 
बेंगलुरु में 28 मार्च, 2019 को एक अभूतपूर्व वाकया घटा। भ्रष्ट ठेकेदारों और इंजीनियरों पर आयकर विभाग के छापे पड़ने के विरोध में यहाँ जेडीएस और कांग्रेस नेताओं ने पार्टी के झंडे लेकर आयकर कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन किया। आश्चर्यजनक तरीके से राज्य के मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों ने भी इस विरोध प्रदर्शन में भाग लेने का फैसला किया था। ये नेता इस छापा-तलाशी की कार्रवाई को राजनीति प्रेरित बता रहे थे। इन प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि मंत्रियों की तलाशी ली जा रही है। इस आरोप के प्रमाण के तौर पर वे यही कह सके कि एक मंत्री के भतीजे के परिसरों की तलाशी हुई थी।
वास्तव में हुआ क्या था?
बेंगलुरु के आयकर अधिकारियों ने विरोध प्रदर्शन के बाद प्रेस को एक बयान जारी कर साफ शब्दों में कहा था कि किसी सांसद, विधायक या मंत्री की कोई तलाशी नहीं ली गयी थी। तलाशियां न तो किसी राजनीतिज्ञ के विरुद्ध थीं, न ही किसी राजनीतिक कार्यकर्ता के खिलाफ। मीडिया में भी यह स्पष्ट प्रकाशित हुआ था। जब किसी राजनीतिज्ञ की तलाशी ली ही नहीं गयी थी तो विरोध किसलिए?
शक की सुई
कांग्रेस और जेडीएस के लोगों का असंतुलित व्यवहार शक पैदा करता है। भ्रष्ट ठेकेदारों और इंजीनियरों की तलाशी होने पर किसी राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्रियों को प्रदर्शन क्यों करना चाहिए? क्या किसी मंत्री का भतीजा या भांजा सार्वजनिक निर्माण विभाग का ठेकेदार था जिस पर दरियादिली दिखायी गयी थी – यानी क्या भाई-भतीजावाद का मामला था? प्रदर्शनकारियों की असंगत प्रतिक्रिया से यह संदेह भी पैदा होता है कि वे तलाशी में मिली ’महत्वपूर्ण’ जानकारियों को लेकर ज्यादा चिंतित थे। क्या उन ’महत्वपूर्ण’ जानकारियों का संबंध उनके छद्म नाम से संचालित आर्थिक हितों से था? यह मामला ऐसा है कि सार्वजनिक निर्माण विभाग ने ठेकेदारों को भुगतान किया, इंजीनियरों ने उनसे एजेंटों के रूप में वसूली की और इन एजेंटों के नियोक्ता विरोध प्रदर्शनकारियों के रूप में सामने आये। इन प्रश्नों का उत्तर मुख्यमंत्री और प्रदर्शन में शामिल उनकी कैबिनेट के मंत्रियों को देना है।
 
क्या राज्य का रवैया संघवाद को खतरा है?
संघवाद का आशय केवल राज्यों के अधिकारों से नहीं है। भारतीय संघवाद में भारत ‘राज्यों के संघ’ के रूप में अंतर्निहित है। यहां संघ के अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। भारत की सुरक्षा, सम्प्रभुता, आतंकवाद से निपटना, सीमाओं की सुरक्षा, सीमा-शुल्क जांच बिंदु और आय कर प्रवर्तन आदि संघ के कुछ संवैधानिक अधिकारों में शामिल हैं। यदि कोई राज्य इन्हें बाधित करता है तो वह संघीय मानदंडों का उल्लंघन करने का अपराधी है। क्या कोई राज्य किसी सीमा शुल्क क्षेत्र में अपने पुलिस बल को भेज कर सीमा शुल्क अधिकारियों को निर्देशित कर सकता है कि वे अपना काम कैसे करें? कई राज्यों ने आयकर अधिकारियों को उनकी कार्रवाई के समय पुलिस बल उपलब्ध करवाना बंद कर दिया है। कुछ अन्य राज्यों में वैकल्पिक रूप से पुलिस बल की मांग करने पर यह सूचना राज्य के राजनीतिक तंत्र के माध्यम से उन तक पहुंचा दी जाती है जिनके खिलाफ कार्रवाई होनी है। कर अधिकारियों को लगातार अपनी कार्रवाइयों के लिए केंद्रीय बलों के भरोसे रहना पड़ रहा है। कश्मीर घाटी में राज्यपाल शासन के दौरान 17 सालों के बाद कुछ तलाशी अभियान चलाये जा सके हैं। उल्लेखनीय है कि ये कर भारत के गरीबों के कल्याण में लगाये जाते हैं।
ऊपर का उदाहरण दो मोर्चों पर यूपीए के आचरण के दो तरीकों की व्याख्या करता है : पहला, सरकारी पैसे का इस्तेमाल करो और उसे ठेकेदारों तथा अन्य लाभार्थियों के माध्यम से वापस हासिल करके अमीर हो जाओ और दूसरी बात यह कि संघीय प्रणाली के प्रति जबानी सहानुभूति जताते रहो और जब मौका आये, तब उसे नष्ट करो। यह बहुत पारदर्शी तरीके से आत्मघाती गोल करने जैसा है।