सर्जिकल स्ट्राइक पर सबूत मांगने वालों हमें भी सबूत दो
   दिनांक 05-मार्च-2019
जिन्हें राम काल्पनिक लगते हैं, सर्जिकल और एयर स्ट्राइक पर क्या यकीन करेंगे। जिन्होंने सिखों का नरसंहार किया, उनसे राष्ट्रीय गौरव की उम्मीद बेमानी है। किस मुंह से सबूत मांग रहे हैं हमें भी कुछ सबूत चाहिए
पाकिस्तान में भारतीय वायुसेना ने घुसकर जैश ए मोहम्मद के हेडक्वार्टर को तबाह कर दिया, इस पर किसी हिन्दुस्तानी को संदेह नहीं है. क्योंकि आम भारतीय अपनी सेना पर संदेह नहीं करता. गौरवशाली परंपरा वाली भारतीय सेना पर संदेह किया भी कैसे जा सकता है. लेकिन कांग्रेस और उस जैसी 21 पार्टियों को संदेह है. इन्हें सबूत चाहिए. आज कांग्रेस और उस जैसी पार्टियों ने ये बात छेड़ी है, तो चलिए सुबूतों की बात करते हैं. वैसे किस मुंह ये सुबूत की बात करते हैं. इन्हें तो हमारे आराध्य श्री राम ही काल्पनिक किरदार लगते हैं. सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस पार्टी की सरकार कहती है कि राम के होने का कोई सबूत नहीं. लेकिन हम आपको बताएंगे कि कांग्रेस के लिए सबूत कैसे अपनी पसंद का खिलौना है.
 
सिखों का नरसंहार
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद न जाने कांग्रेसियों को कौन सा सबूत मिला कि आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी राजनीतिक दल का प्रायोजित दंगा एक धर्म के खिलाफ भड़का. एक नवंबर 1984 को देश के हर कोने में कांग्रेसी नेता उन्मादी कार्यकर्ताओं की भीड़ के साथ मिलकर सिखों को ढूंढकर जिंदा जला रहे थे. कांग्रेस की सरकार, पुलिस और अन्य सरकारी एजेंसियां या तो तमाशबीन थीं या फिर मददगार. सरकार की शह का सुबूत-अपनी मां की मौत के बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने कहा था कि जब एक बड़ा पेड़ गिरता है, तो पृथ्वी भी हिलती है. यानी देश का प्रधानमंत्री नरसंहार को क्रिया की प्रतिक्रिया बताकर एक सामान्य घटना करार दे रहा था. और अब राजीव गांधी के बेटे दुश्मन के कलेजे पर हुए हमले का सुबूत मांग रहे हैं. सिखों के नरसंहार में कांग्रेस ने अपने नेताओं को बचाने के लिए पुलिस, अन्य जांच एजेंसियों और यहां तक कि अभियोजन का दुरुपयोग किया. आखिरकार ये भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार थी, जिसमें ये सबूत कोर्ट को मिले. इन्हीं सबूतों के आधार पर पटियाला हाउस कोर्ट ने 17 दिसंबर 2018 को मुख्य आरोपी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई. यानी सुबूत थे, लेकिन कांग्रेस पार्टी अपने नेताओं को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. कोई ताज्जुब नहीं, आज कांग्रेस पार्टी पाकिस्तान को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है. और ये सबूत की बात करते हैं...
इन्हें तो राम के अस्तित्व पर संदेह
12 सितंबर 2007 को रामसेतु को तोड़ने के खिलाफ याचिका पर केंद्र की यूपीए सरकार ने हलफनामा दाखिल किया. जरा भाषा देखिए- निसंदेह वाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस भारत के प्राचीन साहित्य में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं (इन्हें हमारे आराध्य ग्रंथ प्राचीन साहित्य लगते हैं). लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि इसके पात्र (यानी भगवान श्री राम) और इनमें लिखी घटनाओं के घटित होने का कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है. ये हलफनामा सीधे-सीधे कहता था कि भगवान राम और उनके जीवन का कोई सुबूत नहीं है. इनके सहयोगी द्रमुक सुप्रीमो एम. करुणानिधि तब ताल ठोककर कहते थे कि राम काल्पनिक है. रामसेतु कोई मानव निर्मित रचना नहीं है. लेकिन 2018 आते-आते भगवान ने लीला दिखाई. भारतीय नहीं, अमेरिकी एजेंसी नासा ने कहा कि रामसेतु मानवनिर्मित होने के पर्याप्त सबूत हैं. अब जरा सोचिए, जिन्हें भगवान राम के होने के सुबूत नजर नहीं आते, उन्हें दुश्मन पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक और उसमें मारे गए आतंकवादियों के क्या सुबूत नजर आएंगे. बहरहाल सिख दंगों की तरह की मोदी सरकार ने राम और रामसेतु के होने के सुबूतों के मद्देनजर सेतु समुंद्रम प्रोजेक्ट पर सुप्रीम कोर्ट को बता दिया है कि राम सेतु अपनी जगह कायम रहेगा. और ये सबूत की बात करते हैं...
लोकतंत्र की हत्या के सुबूत
12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सबूतों की रोशनी में पाया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने रायबरेली के चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया था. इसी आधार पर उनके निर्वाचन को खारिज कर दिया गया. सबूतों की मांग करने वाले राहुल गांधी की दादी ने हाई कोर्ट के फैसले और इसके नतीजतन देश भर में फैले विरोध को देखते हुए 25 जून 1975 की आधीरात को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी. 21 मार्च 1977 तक देश में ऐसा राज रहा, जहां कोई सबूत, अपील, दलील और वकील नहीं था. बस इंदिरा और उनके दुलारे बेटे दिवंगत संजय गांधी थे. पाकिस्तानी फ्रंट पेज की खबर बनने वाली राहुल एंड कंपनी को जरा बता दें कि अखबारों, मैगजीनों में कुछ भी लिखने, लोगों के बोलने और यहां तक कि सोचने-विचारने तक के अधिकार को छीन लिया गया था. विपक्ष के तमाम वरिष्ठ नेताओं समेत लाखों लोगों को देशभर में जेलों में ठूस दिया गया था. लोकतंत्र की हत्या के इस घिनौने कारनामे के सुबूत आज तक चिल्ला रहे हैं. और ये सबूत की बात करते हैं....
नेशनल हेराल्ड की लूट के सबूत
नेशनल हेराल्ड घोटाले में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी माता श्रीमती सोनिया गांधी जमानत पर हैं. सुबूत इतने पुख्ता हैं कि नेशनल हेराल्ड हाउस को खाली करने के निचली अदालत के आदेश को रोकने से उच्च न्यायालय ने भी इनकार कर दिया है. दिसंबर 2015 में भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने पुख्ता सबूतों के साथ सोनिया गांधी परिवार की सुनियोजित लूट के खिलाफ मुकदमा कायम कराया. साल 2008 में नेशनल हेराल्ड अखबार को पूरी तरह से बंद कर दिया गया. इस अखबार का मालिकाना हर एसोसिएट जर्नल्स को दे दिया गया. इस कंपनी ने कांग्रेस से बिना ब्याज के 90 करोड़ रुपए कर्जा लिया. लेकिन अखबार फिर भी शुरु नहीं हुआ. 26 अप्रैल 2012 को एक बार फिर से मालिकाना हक का स्थानांतरण हुआ. अब नेशनल हेराल्ड का मालिकाना हक यंग इंडिया को मिला. यंग इंडिया में 76 फीसदी शेयर सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास हैं. जानकारी के मुताबिक यंग इंडिया ने हेराल्ड की संपत्ति महज 50 लाख में हासिल की जिसकी कीमत करीब 1600 करोड़ के आस पास है. पचास लाख को 1600 करोड़ बना लेने की कारिगरी के पुख्ता सुबूत अदालत के सामने हैं. स्वामी का दावा है कि श्रीमती गांधी और राहुल को जेल जाने से कोई नहीं बचा सकता है. और ये सबूतों की बात करते हैं...
जरा बताइये कहां है सबूत
सुभाष चंद्र बोस के लापता होने के बाद उनका क्या हुआ. ये आज जन-जन के बीच विश्वास है कि सुभाष यदि लौटे होते, तो जवाहर लाल नेहरू की कुर्सी खतरे में पड़ गई होती. हमें सबूत चाहिए कि सुभाष चंद्र बोस की तलाश, उन्हें वापस लाने के लिए क्या किया गया. या हम उन सुबूतों पर यकीन कर लें, जो बताते हैं कि कांग्रेस नेताओं ने सुभाष चंद्र बोस के आजादी के बाद भारत लौटने और सक्रिय राजनीति में लौटने पर अड़ंगा लगाया.
ताशकंद समझौते के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की संदिग्ध मौत की जांच के लिए कांग्रेस की सरकारों ने क्या किया. तमाम संकेत बताते हैं कि शास्त्री जी की मौत स्वाभाविक नहीं थी. फिर उनकी मृत्यु कैसे हुई. विदेश में हुई और इतने महत्वपूर्ण समझौते के बाद हुई. क्या जांच हुई, क्या सबूत आए.
ओटावियो क्वात्रोची का राजीव गांधी और सीधे कहें, तो सोनिया गांधी से क्या संपर्क था और उस समय की राजीव सरकार पर क्या प्रभाव था. ये कहीं ढकी-छिपी बात नहीं है. क्वात्रोची देश छोड़कर कैसे भागा. कैसे उसके विदेशी खातों पर लगी रोक को कांग्रेस की मेहरबानी से हटाया गया. हमें सुबूत चाहिए कि आपके परिवार की लूट में क्वात्रोची साझीदार नहीं था. किसने क्वात्रोची के खिलाफ सारे सबूत मिटाए.
तीन दिसंबर 1984 को भोपाल में यूनियन कार्बाइड के संयंत्र से गैस रिसाव से हजारों लोगों की मृत्यु हो गई. गैस त्रासदी के मुख्य आरोपी वॉरेन एंडरसन को तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने विशेष विमान से एंडरसन को दिल्ली पहुंचाया. वहां से राजीव गांधी सरकार के सौजन्य से एंडरसन अमेरिका भाग गया या भेज दिया गया. हजारों लोगों की मौत के सबूत मिटाने के लिए कौन जिम्मेदार है.