‘‘हम जानते हैं करारा जवाब देना’’
   दिनांक 05-मार्च-2019
पुलवामा आतंकी हमले में 40 वीर जवानों के बलिदान के 13वें दिन भारत ने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देते हुए पाक अधिक्रांत कश्मीर और पाकिस्तान के भीतर तक हवाई हमले कर आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया और जवानों के खून और आक्रोशित देश के आंसुओं की हर बूंद का बदला लिया। पुलवामा के बाद से हर दिन बदलते घटनाक्रम, सीमा पर उपजे हालात पर नई दिल्ली स्थित साउथ ब्लाक के अपने दफ्तर में रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पाञ्चजन्य से बात करती हुई कहती हैं,‘‘भारत अब और आतंक और आतंकी गतिविधियों को सहन नहीं करने वाला है। हमारा संदेश साफ है कि पड़ोसी कुछ भी करे तो हम शांत बैठने वाले नहीं हैं। हम ऐसी हरकत करने वालों को करारा जवाब देना जानते हैं।’’ पुलवामा हमले के बाद भारत की जवाबी कार्रवाई, देश एवं सीमाओं की सुरक्षा एवं आतंक से निपटने की भारत की तैयारियों पर पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर एवं संवाददाता अश्वनी मिश्र ने उनसे विस्तृत बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-
पुलवामा में 40 जवानों का बलिदान, पाकिस्तान में बैठे जैश का इसकी जिम्मेदारी लेना और भारी जन-आक्रोश के बीच भारतीय नेतृत्व की अभूतपूर्व दृढ़ता का प्रदर्शन। क्या यह बदला हुआ भारत है?
बिल्कुल, हमने पुलवामा में अपने 40 वीर जवानों के बलिदान का बदला लेने का संकल्प लिया। आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले तत्वों को नष्ट करना सुनिश्चित किया। यह बदला हुआ भारत जनभावनाओं को समझने वाले दृढ़ नेतृत्व और सैन्य कुशलता के अनूठे समन्वय के कारण है। जनता को इन दोनों पर गर्व भी है और भरोसा भी। स्वाभाविक है कि पुलवामा के बाद देश के लोगों का आक्रोश चरम पर था। उनके मन में दुख और पाकिस्तान की शह पर की जा रही हरकतों के खिलाफ गुस्सा था। जनता सरकार से सवाल कर रही थी कि कब सरकार 40 सीआरपीएफ जवानों के बलिदान के बाद पाकिस्तान में पलने वाले आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने वाली है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमले के बाद जनभावना को समझते हुए बार—बार देश को विश्वास दिलाया था कि इस कायराना हमले का जवाब अवश्य ही मिलेगा। उन्होंने कहा था कि आंसू की एक भी बूंद व्यर्थ नहीं जाने देंगे। जवानों के बलिदान का पूरा हिसाब लिया जाएगा। सरकार ने संकल्प लिया और सेना को खुली छूट दी। कहा गया कि हमारी सेना तय करेगी उसे क्या करना है। इस पूरे मामले पर मैं इतना ही कहना चाहूंगी कि देश का आक्रोश, बलिदान की कीमत, आंसुओं का मोल, यह बदला हुआ भारत समझता है। यह नया भारत है, जो अब किसी भी तरह की आतंकी गतिविधि को बर्दाश्त नहीं करने वाला है। जो भी आतंक फैलाएगा या उसे पालने का काम करेगा, भारत उसे कड़ा-करारा जवाब देगा।
पुलवामा में सुरक्षाबलों पर हुआ आत्मघाती हमला पहली बार हुआ हो, ऐसा नहीं है। इससे पहले भी घाटी में सुरक्षाबलों को इसी तरह निशाना बनाया जाता रहा है। सुरक्षाबलों पर इस तरह के हमले की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं?
निश्चित ही मैं सहमत हूं कि कश्मीर में इस तरह के हमले होते रहे हैं और यह भी कि पाकिस्तान की ओर से यह अंतिम हमला होगा, ऐसा नहीं है। इसलिए मैं बताना चाहती हूं कि इस दिशा में हर संभव प्रयत्न हम कर रहे हैं, ताकि फिर से ऐसे हमले न हों और हमारे जवान बलिदान न होने पाएं। पुलवामा हमले के अगले दिन ही कैबिनेट और सुरक्षा अधिकरियों की महत्वपूर्ण बैठक हुई थी और उस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमने बहुत कुछ निर्णय लिए थे। सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए जो विभिन्न कदम उठाए जा रहे हैं, वे उसी का हिस्सा हैं। इसके अलावा मैं एक बात कहना चाहती हूं कि हमारी सरकार जब से बनी है तब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पड़ोसी देशों से संबंध सुधारने में सतत लगे हुए हैं। अपने शपथ ग्रहण समारोह में उन्होंने सभी पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुलाया था। क्योंकि अटल जी कहा करते थे कि आप अपने दोस्त चुन सकते हैं पर पड़ोसी नहीं। प्रधानमंत्री उसी सूत्र को ध्यान में रखते हुए सभी से अच्छे मनोभाव के साथ बातचीत और मधुर संबंध बनाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। क्योंकि हमारे रक्त में पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध बनाए समाहित है। लेकिन उन्हीं नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में सर्जिकल स्ट्राइक भी हुई और आतंक को नेस्तेनाबूद करने का काम किया गया। इससे संदेश साफ है कि पड़ोसी कुछ भी करें तो हम शांत बैठने वाले नहीं हैं। हम करारा जवाब देना भी जानते हैं। क्योंकि हमारी सरकार का स्पष्ट मंतव्य है कि अगर हम अच्छे संबंध रखना जानते हैं तो दूसरी तरफ अराजक गतिविधियों पर कार्रवाई करना भी जानते हैं। अब भारत अराजक व्यवहार को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करने वाला है। दूसरी तरफ पाकिस्तान को अलग-थलग करने की हमारी कोशिश लगातार जारी ही है। भारत दृढ़ता के साथ विश्व मंच पर अपनी बात रख रहा है और हमें इसमें सफलता भी मिल रही है।
 
पठानकोट हमला, उरी हमला, मुंबई के ताज होटल पर हमला या अब का पुलवामा हमला। हर बार पाकिस्तान की ओर से एक ही रटा-रटाया बयान आता है कि इन हमलों में हमारा कोई हाथ नहीं है, अगर भारत को ऐसा लगता है तो वह उसे सबूत सौंपे। भारत ने हर हमले के बाद उसे सबूत भी सौंपे हैं। आज दुनिया जानती है कि पाकिस्तान आतंकवाद का पालना बन गया है। ऐसे में पाकिस्तान के झूठ को दुनिया के सामने लाने और उसकी आतंकियों को पालने वाली छवि को पूरी दुनिया में उजागर करने के लिए आप की क्या रणनीति है?
आपने सही कहा कि पाकिस्तान हर हमले के बाद सबूत मांगता है। मैं बताना चाहती हूं कि पाकिस्तान को हर बार सबूत भी दिए गए हैं। इस सरकार ने ही सबूत दिए हों, ऐसा नहीं, इससे पहले की संप्रग सरकार ने भी पाकिस्तान को सबूूत सौंपे हैं। लेकिन इन साक्ष्यों के देने के बाद भी पाकिस्तान अपने यहां पलने वाले आतंकी संगठनों पर कोई कार्रवाई नहीं करता और दिए गए सबूतों को या तो झुठलाता है या फिर अनदेखा कर देता है। इससे स्पष्ट है कि पाकिस्तान का अपने यहां पल रहे आतंकी हाफिज सईद, मौलाना अजहर मसूद जैसे आतंकियों पर कार्रवाई करने का मन नहीं है। इसलिए हम बार-बार इस विषय को अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष रख रहे हैं और बता रहे हैं कि आतंकी साबित होने के बाद भी वहां उन्हें खुला छोड़ा जाता है, उन पर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की जाती है। दूसरी बात, पाकिस्तान को दुनिया के अन्य देशों से मिलती आतंकी शह और उसके लिए मिलने वाले पैसे पर भी हमारी नजर है। हमने अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को इसके सबूत भी दिए हैं कि पाकिस्तान को मिलने वाला पैसा कहां तक जाता है। हमने एफएटीएफ को सब जानकारी दी है और इसका परिणाम है कि आज पाकिस्तान अलग-थलग पड़ा है और ग्रे सूची में है। लेकिन पाकिस्तान की हरकतों को देखते हुए हमारी कोशिश है कि उसे ब्लैक सूची में डाला जाए। इसके लिए हम पूरी तरह से प्रयासरत हैं। तीसरा, पाकिस्तान में पलने वाला आतंकवाद और आतंकी गढ़ के रूप में पाकिस्तान कैसे काम करता है, इस पर भी विश्व समुदाय को सभी जानकारी दी है। आपको पता होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ में 1986 से अब तक ‘टेरर’ का मतलब क्या है, इसकी परिभाषा क्या है, यह अभी तक तय नहीं है। इसका फायदा पाकिस्तान उठाता है। क्योंकि जब ‘टेरर’ की परिभाषा ही तय नहीं है तो वह लश्कर-ए-तैयबा को, जमात-उद-दावा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे तमाम आतंकी संगठनों को सामाजिक संगठन या कुछ और बताकर छिपा ले जाता है। लेकिन हकीकत है कि इन आतंकी संगठनों को बाकायदा फंड उपलब्ध कराया जाता है। कई जगहों से इनको फंड दिया जाता है। इस सबको देखते हुए हम संयुक्त राष्ट्र संघ में पूछ रहे हैं कि अभी तक ‘टेरर’ की परिभाषा क्यों तय नहीं है? मैं बताना चाहती हूं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार के प्रयत्न कोई एक दिशा में हो रहे हों, ऐसा नहीं है। हम आतंक को नेस्तोनाबूद करने और पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। इसके अलावा पाकिस्तान को जो अपना दोस्त मानते हैं उन्हें भी पाकिस्तान की हरकतों के बारे में सब बता रहे हैं।
...क्या इस बार भी भारत सरकार पाकिस्तान को पुलवामा हमले के सबूत सौंपने वाली है?
देखिए, अभी इस पर खुलकर कुछ भी कहना ठीक नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर कहूंगी कि पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए हम सब कुछ करेंगे और हर स्तर पर करेंगे।
 
हाफिज सईद, अजहर मसूद, दाउद इब्राहिम सहित कई आतंकी और आतंकी संगठन, जो भारत के गुनहगार हैं पाकिस्तान में पल रहे हैं। भारत सहित दुनिया यह जानती है। कब भारत अपने गुनहगारों को सजा देगा? इन आतंकी सरगनाओं पर कुछ सटीक कार्रवाई का भरोसा मिल सकता है?
बिल्कुल, ये सवाल आज जनता पूछ रही है, मैं मानती हूं। इसलिए मैं देश के लोगों को भरोसा दिलाना चाहती हूं और कहना चाहती हूं कि प्रधानमंत्री खुद कह चुके हैं कि आंसू की एक भी बूंद व्यर्थ नहीं जाएगी और भारत की जनभावना का पूरा ध्यान रखा जाएगा। हम कड़ी से कड़ी कार्रवाई कर रहे हैं।
कश्मीर में बर्फ के इलाकों से लेकर दर्रों के रास्तों से घुसपैठ होती रही है। इसके अलावा झेलम के रास्ते से भी आतंकियों की घुसपैठ हुई है। क्या इस ओर आपका ध्यान गया है? इसकी निगरानी के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
पानी के रास्तों से लेकर दर्रों, जमीन या कोई और रास्ते, जहां से आतंकी आते हैं, उन सभी पर कड़ी निगरानी है। यह कोई हमले की वजह से हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। हमारे सुरक्षाबल हर समय सख्ती से प्रत्येक रास्ते पर निगरानी रखते हैं। मैं सुरक्षाबलों के बारे में एक बात कहना चाहूंगी कि जब कोई एक घटना घटती है और उसमें जवान बलिदान होते हैं तो हम सबको दुख होता है। कुछ लोग हैं जो सुरक्षा को लेकर तरह-तरह से सवाल उठाते हैं। लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि इन्हीं सुरक्षाबलों ने इससे पहले होने वाली दसियों घटनाओं को रोका है। हां, यह सही है कि जब भी कोई घटना घटती है तो चूक पर सवाल उठना स्वाभाविक है,लेकिन हम सबको याद रखना चाहिए कि हमारे जवानों ने इस घटना के होने से पहले ऐसी नौ घटनाओं को रोका तब कहीं एक घटना घट पाई। इसलिए मैं कहना चाहती हूं कि हमारी सेना और अर्द्धसैनिक बल जमीन पर बड़ी ही मजबूती से काम करते हैं।

 
सीमाओं के प्रबंधन के लिए एक विशेष बजट है। लेकिन पता चला है कि उरी से गुरेज तक जो लंबा मार्ग है, जहां 10 वर्ग किलोमीटर के अंदर 70 के करीब गांव बसे हुए हैं। इन गांवों के लिए जो फंड आया वह यहां न लगकर कहीं और लगा है, जिसके कारण यहां से लोग पलायन करने पर मजबूर हैं और उसका परिणाम है कि घुसपैठ बढ़ी है। इस बात में कितनी सचाई है?
मैंने सेना प्रमुख को बोला है और मैं स्वयं इन इलाकों में जाऊंगी और सीमावर्ती गांवों में जहां आर्थिक रूप से संकट है,सीमापार से होने वाली फायरिंग से जिनके घर बर्बाद हो जाते हैं या फिर और भी बहुत सारी समस्याएं इन इलाकों में रहने वालों को आती हैं, हमने उन सभी लोगों के लिए कुछ करने का विचार किया है और उस पर काम चल रहा है।
भारत के लिए आतंकी घटनाएं कोई एक दिन का विषय हों, ऐसा नहीं है। यह चक्र लंबे समय से चलता आ रहा है। इसलिए जिस तरह अलग-अलग क्षेत्रों में उसके विशेषज्ञों की नियुक्ति होती है और वे काम करते हैं, ठीक उसी तरह आतंकग्रस्त क्ष़ेत्रों में अधिकरियों की नियुक्तियों का मापदंड क्या है, खासकर कश्मीर में? जिन्हें आतंक का मुकाबला करने का अनुभव है, ऐसे अधिकारियों को क्या वरीयता दी जाती है?
देखिए, अनुभव की कसौटी बिल्कुल है। सेना और अर्द्ध सैनिकबल की प्रत्येक टुकड़ी में जवानों और उनके अधिकारियों की अपने-अपने क्षेत्रों में विशेषज्ञता होती ही है। यह सेना जानती है। सेना के अधिकारी तय करते हैं कि किस स्थान पर कौन से जवान और अधिकारी होने चाहिए। रही बात जम्मू-कश्मीर की तो यहां सेना, अर्द्ध सैनिकबल, जम्मू-कश्मीर पुलिस के साथ कुछ अन्य स्थानीय एजेंसियां हैं जो साथ मिलकर काम करती हैं। एक साथ कई एजेंसियों का मिलकर काम करना कठिन होता है, लेकिन फिर भी सब एक लक्ष्य लेकर काम करते हैं। इसलिए मैं इन सबकी सराहना करते हुए इनका धन्यवाद करना चाहती हूं कि इस बार की अमरनाथ यात्रा में जो काफी लंबी चली, इन्हीं सुरक्षाबलों और एजेंसियों ने पूरी मुस्तैदी से काम किया और एक भी दुर्घटना नहीं होने दी। पर दुख है कि हम इन एजेंसियों के काम को बड़ी ही जल्दी भूल जाते हैं और उन पर सवाल उठाना शुरू कर देते हैं।

 
पुलवामा और शोपियां आतंकवाद के क्षेत्र में नई चुनौती के रूप में हमारे सामने हैं। पाकिस्तानी एजेंसी आईएसपीआर यहां के युवाओं और घाटी के लोगों को साथ लेकर प्रोपेगेंडा फैलाने का काम करती है। एक अध्ययन के मुताबिक घाटी में चल रहे व्हाट्सएप समूहों में हर तीसरे समूह का ‘एडमिन’ पाकिस्तान का है। आईएसपीआर की साजिश और घाटी में सोशल मीडिया के दुरुपयोग को आप कैसे देखती हैं और इसे रोकने के लिए क्या कुछ करेंगी ?
आप जो कह रहे है उसमें सचाई है इसलिए हमारी एजेंसियां इस पर काम कर रही हैं। इसके लिए हम सीमावर्ती क्षेत्रों और आतंक प्रभावित क्षेत्रों में विभिन्न माध्यमों से वहां के रहने वालों को जागरूक कर रहे हैं कि किसी भी तरह की सूचना पर आंख बंद कर के विश्वास मत करिए। किसी भी संदेश, तस्वीर और वीडियो को एकदम सच मत मानिए और सोशल मीडिया का बहुत संभलकर प्रयोग करिए। ऐसा बार-बार इन इलाकों के रहने वालों को हम बोल रहे हैं। क्योंकि हमें जानकारी है कि बहुत सारे ‘हैंडल्स’ से, जो भारतीय नहीं हैं, इनके द्वारा दुष्प्रचार कर घाटी को अशांत करने का काम किया जाता है। ऐसे में हम अपने तंत्र से बड़ी ही सजगता से इसकी निगरानी रख रहे हैं और लोगों को जागरूक कर रहे हैं कि सोशल मीडिया पर इस तरह के किसी चक्कर में न फंसें।
हमारा रक्षा क्षेत्र लंबे समय तक उपेक्षित रहा। हथियारों की खरीदारी से लेकर अत्याधुनिक तकनीक को दरकिनार किया गया, जिसके कारण समय—समय पर कई चिंताएं जाहिर की गईं, लेकिन फिर भी इसे ठंडे बस्ते में डाला गया। आज रक्षा क्षेत्र की स्थिति क्या है?
साल 2014 में जब हमारी सरकार बनी तो उस समय जो भी मुद्दे आम चर्चा में आए उनमें से दो-तीन मुददें में एक विषय यह भी था कि अगर युद्ध जैसे हालात होते हैं तो हमारे पास दस दिन के लिए भी गोला-बारूद नहीं है। इस पर उस समय चर्चा हुई। रही बात बुलेट पू्रफ जैकेट की तो जवानों को वह भी नहीं उपलब्ध करायी गयी। बजट में रक्षा मंत्रालय के लिए काफी पैसा दिया जाता रहा, फिर भी जवानों को पर्याप्त मात्रा में बुलेट पू्रफ जैकेट तक नहीं दी गई । इसके अलावा विषय आया कि हमारे जंगी जहाज कम होते जा रहे हैं, जबकि पड़ोसी देशों के लिए कहा जाता था कि उसने इतनी शक्ति बढ़ा ली...आदि आदि। पर हमारी सरकार आने के बाद सभी विषयों को बड़ी गंभीरता के साथ लिया गया। यह मैं कह रही हूं सिर्फ इसलिए इस पर विश्वास मत करिए। इसके पूरे आंकड़े हैं, उन्हें देखिए। हमारी सरकार आने के बाद हमने वायु सेना को स्पष्ट कहा कि आपकी जो भी जरूरतें हैं, उन्हें पूरा करिए। जहां से जो भी खरीदना है, खरीदिए। इसके लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध कराया गया और यह क्रम लगातार चलता चला आ रहा है। बुलेटप्रुफ जैकेट भी हमने जवानों को उपलब्ध कराई और लाखों की खरीददारी चल रही है। इस सरकार ने रक्षा से संबंधित और जवानों की प्रत्येक जरूरत को ध्यान में रखते हुए हर संभव प्रयास किए और उन्हें अंतिम परिणति तक लेकर आए हैं। पहले की तरह ऐसा नहीं कि कागजी कार्रवाई करके खानापूर्ति की और पता चला कि वह चीज आई ही नहीं। हमारी सरकार आने से पहले हाल यह था कि अगर युद्ध होता है तो बंदूक है तो गोली नहीं, टैंक हैं तो गोला-बारूद नहीं, जवान हैं तो पर्याप्त मात्रा में बुलेटप्रुफ जैकेट नहीं। ऐसी परिस्थिति को हमारी सरकार ने देखा और रक्षा से संबंधित सभी जरूरतों को पूरा किया है और यह क्रम लगातार जारी है।
 
कई बार देखने में आता है कि सुरक्षाबलों के बीच कई तरह से विभाजनकारी रेखा खींचने का काम किया जाता है। सोशल मीडिया से लेकर कुछ राजनीतिक दल तक जवानों एवं अधिकारियों के बीच खाई खोदने का काम करते हैं। यह कितना चिंताजनक है? इस पर आप क्या कहेंगी?
बिल्कुल, यह चिंताजनक है कि इस तरह की बातें की जाती हैं और सुरक्षाबलों के बीच खाई खोदने का काम किया जाता है। मुझे बड़ा दुख है कि पुलवामा हमले में वीर बलिदानी जवानों की जातियों को बताने का काम एक पत्रिका द्वारा किया गया। जबकि सेना और अर्द्ध सैनिक बलों में जाति-मजहब जैसी कोई चीज होती ही नहीं। मैं इस पर इतना ही कहना चाहूंगी कि मीडिया को इस तरह की घटनाओं की गंभीरता समझनी चाहिए और ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे जनभावना आहत हों।
आंतरिक सुरक्षा की जब बात आती है तो अक्सर देखने में आता है कि लद्दाख जैसे क्षेत्र में जो चरवाहे घुसपैठ या किसी अन्य गतिविधि की सूचना हमें सबसे पहले देते थे, वे अब सीमा छोड़ने का काम कर रहे हैं। इसके अलावा ऐसे संवेदनशील इलाकों का जनसांख्यिक परिवर्तन भी किया गया है। इस पर आप क्या कहेंगी?
जो आप कह रहे हैं, उसकी सूचना हमारे पास है। मैं इस सवाल पर इतना ही कहना चाहती हूं कि हमारी सेना की खुफिया एजेंसी द्वारा ऐसी किसी भी गतिविधि की सूचना हमें मिलती है तो हम उस पर काम करते हैं और उसे निराकरण के स्तर तक ले जाते हैं।