पाकिस्तान की नस नस में दगा मुकरना उसकी फितरत
   दिनांक 06-मार्च-2019
दुनिया में कोई पाकिस्तान पर भरोसा नहीं करता, और पाकिस्तान को सबसे ज्यादा भरोसा अपने झूठों पर है| उसने दशकों से आतंकी पाले हैं, लेकिन कभी इकबाल ए जुर्म नहीं किया| अब वो ये कैसे मान ले कि उसकी पनाह में दुबके जिहादियों के एक बड़े गिरोह को भारत की वायुसेना ने ढेर कर दिया है| पाकिस्तान के झूठों का सिलसिला पाकिस्तान जितना ही पुराना है| भारत को पाकिस्तानी जिहादियों और उनके आकाओं से भी निपटना है और उनके “प्रोपेगैंडा वॉर” से भी।
वो अमरीका के साथ मिलकर ओसामा को ढूंढ रहा था,और ओसामा एबटाबाद में फौजी निगरानी में सुरक्षित रह रहा था। वो अफगान तालिबान के मुखिया मुल्ला उमर को मारने में नाटो सेनाओं की मदद कर रहा था, लेकिन मुल्ला उमर कराची के अस्पताल में इलाज करवा रहा था। मुल्ला उमर 2013 में मर गया, लेकिन उसके मरने की खबर को 2015 तक दबाकर रखा गया और उसको ढूंढने के नाम पर डॉलर और हथियार वसूले जाते रहे. जब अमरीकी नौसेना के सील कमांडो ने रात के अंधेरे में चुपचाप जाकर ओसामा को मार गिराया तो पाक फ़ौज भोली बन गई। पाक संसद भी फ़ौज जितनी ही अचकचाई हुई थी. उधर मीडिया में फ़ौज के पिट्ठुओं और आईएसआई के पूर्व प्रमुख हामिद गुल जैसे लोगों ने हल्ला मचाया कि वास्तव में अमरीकी झूठ बोल रहे हैं, और एबटाबाद में ओसामा को मारने गए अमरीकी खाली हाथ लौटे हैं। ये पाकिस्तान की फितरत है। पाकिस्तान रंगे हाथ पकड़ा जाए तो भी मुकर जाता है।
26 फरवरी को भारत के जांबाज़ लड़ाकू पायलटों ने पाकिस्तान की सरहद पार करके, आईएसआई की पनाहों में गहरे में छिपे जिहादियों पर आग बरसाई। एनटीआरओ काफी पहले से इस आतंकी शिविर की निगरानी कर रहा था। 2004 में अटल सरकार द्वारा स्थापित एनटीआरओ (नेशनल टेक्निकल रिसर्च आर्गेनाइजेशन, राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन ) भारत की तकनीकी खुफिया एजेंसी है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के अंतर्गत काम करती है। एनटीआरओ के पास बालकोट के इस आतंकी शिविर में मौजूद 300 आतंकियों के मोबाइल नंबर थे, जिनकी निगरानी की जा रही थी| हमले में, कई पके हुए दुर्दांत आतंकी कमांडर, बडी संख्या में आतंकी अपने प्रशिक्षकों समेत मारे गए। ये जैश के लिए एक कमरतोड़ एयर स्ट्राइक थी। कुछ भ्रमित लोगों और वोटबैंक के ठेकेदारों को छोड़, सारे भारत ने इस एयर स्ट्राइक का जश्न मनाया। पाकिस्तान ने एक बार फिर इनकार कर दिया। कहा कि भारतीय विमानों की बमबारी में कुछ पेड़ों को नुक्सान पहुंचा है बस।
 
कारगिल युद्ध : मारे गए पाकिस्तानी सैनिको के शवों को पहचानने से पाक ने इनकार कर दिया था
दशकों पुराना है दस्तूर
पाकिस्तान की ये फितरत दशकों पुरानी है। मार खाना और फिर मुकर जाना। पाकिस्तान ने कारगिल में अपने फौजियों को घुसाया और उन्हें “कश्मीरी मुजाहिदीन” बतलाया। इसमें पाकिस्तान स्पेशल सर्विस ग्रुप के कमांडो और सात बटालियन (पांच हजार से ऊपर कुल संख्या) थीं। जब भारत की सेनाओं ने दुर्गम पहाड़ियों की चोटियों पर जमे बैठे उसके फौजियों को मार गिराया तो पाकिस्तान ने उन्हें अपना सैनिक मानने से इनकार कर दिया और उनके शव तक नहीं लिए। तब भारत की सेना ने मारे गए पाकिस्तानी सैनिकों को पॉइंट 4857 पर इस्लामी तरीके से दफनाया था।
71 के युद्ध में पाकिस्तान की सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में 40 लाख हत्याएं और लाखों बलात्कार किए और आज तक अपने इस कुकृत्य को न स्वीकारा न माफ़ी मांगी। इसी युद्ध में पाकिस्तान के पास अमरीका से मिली एक पनडुब्बी थी, जिसका नाम रखा गया था गाजी। पाकिस्तान गाज़ी पर बहुत इतराया करता था। गाजी हमारे विमान वाहक युद्धपोत आईएनएस विक्रांत पर घात लगाने के फेर में भारतीय नौसैनिकों द्वारा 4 दिसंबर 1971 को विशाखापटनम के पास नष्ट कर दी गई। पाकिस्तान लम्बे समय तक मानने से इनकार करता रहा कि गाजी डूब गई है।
65 की तथाकथित "फतह" -
1965 में पाकिस्तान ने कश्मीर को हड़पने के लिए मुजाहिदीन के भेस में अपनी फ़ौज को कश्मीर में दाखिल करवाया। युद्ध भड़का। लाहौर और सियालकोट भारतीय सेना की मार से तपने लगे। पाकिस्तान “जंगबंदी” के लिए अमरीका और रूस की चिरौरी करने लगा। आखिरकार युद्धविराम हुआ। रावलपिंडी की जान में जान आई। ताशकंद समझौते के बाद पाकिस्तान वापिस लौटकर तानाशाह अयूब खान और उनके विदेशमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने घोषणा कर दी कि “अल्लाह के करम से जंग में पाकिस्तान की फतह हुई है। हिंदुस्तान को सबक सिखा दिया गया है|” तब से पाकिस्तान 6 सितंबर को विजय दिवस (दिन ए दिफ़ा , डिफेंस डे) के रूप में मनाता है। पीढ़ियों को ये झूठ घुट्टी में पिलाया जा चुका है।
आज से सालों पहले, जब फेसबुक का जन्म नहीं हुआ था, ऑरकुट का ज़माना था, और ऑरकुट पर भारत और पाकिस्तान के युवकों की ज़ोरदार भिडंत चला करती थी। उसी समय, इस प्लेटफार्म पर एक पाकिस्तानी युवक से सामना हुआ जो कुछ भारतीय युवकों से बहस में उलझा था और पाकिस्तान की दरियादिली की तारीफ़ में ज़मीन आसमान एक कर रहा था कि हिंदुस्तान को पाकिस्तान का एहसान मानना चाहिए क्योंकि 1965 की जंग में पाकिस्तान ने भारत की आधी जमीन जीतने के बाद लौटा दी थी। उसने यही पढ़ा-सीखा था| उसने सुन रखा था कि 1971 की जंग में पाकिस्तान की नौसेना ने द्वारका का “किला” (आशय द्वारकाधीश मंदिर से था) ध्वस्त कर दिया था।
पाकिस्तान के एक तमाशेबाज स्वघोषित रक्षा विशेषज्ञ और तथाकथित थिंक टैंक का विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच दिया गया एक भाषण (अंश) शब्दशः प्रस्तुत है "1965 की जंग पाकिस्तान की तारीख का वो मकाम है, जब सारी मुसलमान कौम सीसा पिलाई दीवार बन कर हिन्दुस्तान की फ़ौज के सामने खड़ी हो गयी थी । जब लाहौर और सियालकोट की गलियों में हमलावर हिन्दुस्तानी सैनिकों को पाकिस्तानी शहरी हॉकी, डंडे और घरेलू किस्म के हथियार ले कर खदेड़ रहे थे। जब अल्लाहो अकबर के नारे के साथ पाकिस्तानी फ़ौज तोपें दागतीं तो गोले तोप की क्षमता से कई किलोमीटर आगे जा कर गिरते।"
वक्ता आगे बताता है कि हिन्दुस्तान ने बड़ी तैयारी के साथ हमला किया था, पाकिस्तान पर भारी खतरा था। ऐसे समय पाकिस्तान के किसी शायर किस्म के “पीर” ने सपना देखा कि पैगम्बर मुहम्मद जंगी लिबास में बेचैन हो कर टहल रहे हैं और कह रहे हैं कि पाकिस्तान पर हमला हुआ है, पाकिस्तान का दिफ़ा (रक्षा)करनी है। वक्ता के अनुसार "ऐसे समय अल्लाह की तरफ से मदद आई। जब दुश्मनों की फौजें आगे बढ़ रही थीं तब अल्लाह ने धुंध भेज दी। पकड़े गए एक हिन्दुस्तानी फाइटर पायलट ने बताया कि उसे रावी नदी पर बने पुल को तोड़ने के लिए भेजा गया था। लेकिन जब उसका प्लेन रावी तक पहुंचा तो उसे एक की जगह कई पुल दिखाई देने लगे। " हांक यहीं पर खत्म नहीं होती। इस्लाम के किले पाकिस्तान की तरफ से मुहम्मद खुद युद्ध के मैदान में उतर आये थे, ये जतलाते हुए कहा जाता है कि -
"हिन्दुस्तान के पकड़े गए सैनिक पाक फ़ौज के अफसरों से पूछते थे कि आपकी वो वाली फ़ौज कौन सी थी जो घोड़ों पर सवार थी और जिनकी तलवारों में से शोले निकलते थे?" वक्ता अपनी बात को सत्य सिद्ध करने के लिए पाकिस्तान में प्रसिद्ध साहित्यकार और सितारा-ए-इम्तियाज़ से पुरस्कृत मुमताज़ मुफ़्ती की रचनाओं - 'अलखनगरी' और 'तलाश' की मिसाल देता है और कहता है कि “हम ये बातें अपने मन से नहीं बतला रहे हैं, हमारे बड़ों की बतलाई हुई हैं।” हमें ये हास्यास्पद और अविश्वसनीय लग सकता है, लेकिन पाकिस्तान में इतिहास इसी तरह प्रस्तुत किया गया है। यहाँ एक आर्मी टीवी भी है जो युद्ध में पाकिस्तानियों की बहादुरी की डींगें हांकने के लिए बहुरूपियों को बुलाता है।
 पाकिस्तान की असली सरकार और जिहादी आतंकियों की अभिभावक पाक फ़ौज 
पाकिस्तान वो देश है जो दूसरों के साथ अपने लोगों से भी झूठ बोलता है। अतीत के बदनाम बलात्कारी और लुटेरे यहां राष्ट्रीय नायक हैं। जिन्होंने लाहौर को रौंदा,बलात्कार किए, लोगों के सिरों की मीनारें बनवाईं वो आज यहां वंदित हैं। भीख में मिलीं मिसाइलों के नाम इन आताताइयों के नाम पर रखे गए हैं। उनके कारनामों को नए-नए मुलम्मे लगाकर पेश किया जाता है। जैसे “मुहम्मद बिन कासिम ने किसी लड़की की पुकार पर सिंध पर हमला किया था|” और महमूद गजनवी ने सोमनाथ का “किला” (मंदिर) तोड़ा था क्योंकि वहां से काफिर मुसलमानों पर हमले किया करते थे।
पाकिस्तान ने चिनाब नदी के किनारे सिकंदर का बुत बनाया क्योंकि उसने हिंदुस्तान पर हमला किया था, और बहुसंख्य पाकिस्तानी ये समझते आए हैं कि वो मुसलमान था। भले ही उसका जन्म मुहम्मद से हज़ार साल पहले हुआ था और उसने इसी इलाके में मारकाट और पैशाचिक कृत्य किए थे जहां आज पाकिस्तान है। वर्तमान भारत की सीमाओं में घुसने की उसकी हिम्मत ही नहीं हुई थी।
झूठ के इस कारखाने से सच निकलने की कोई उम्मीद करना बेकार है। अफगानिस्तान में जिहादियों के खिलाफ अमरीका के नेतृत्व में लड़ रही नाटो सेना ने सालों पहले से अपने पाकिस्तानी सहयोगियों को युद्ध के राज़ और खुफिया सूचनाएं बतलाना बंद कर दिया है| ऐसा उन्होंने तब किया जब अल कायदा के प्रमुख अल जवाहिरी को पाकिस्तानियों ने कार्रवाई के पहले ही सूचित करके भगा दिया था। दुनिया में कोई उस पर भरोसा नहीं करता और पाकिस्तान सबसे ज्यादा भरोसा अपने झूठों पर करता है।
भारत पाकिस्तान के पाले हुए आतंकियों के खिलाफ युद्ध लड़ रहा है, और बिलबिलाई हुई पाकिस्तानी फ़ौज भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार की जंग लड़ रही है। इमरान खान हों या उनके विदेश मंत्री। सब पाकिस्तान फ़ौज के हाथ के मोहरे हैं। इनके प्रस्ताव इनके भाषण सब फ़ौज मुख्यालय से छपकर आते हैं, जिनमें सिवाय फरेब के और कुछ नहीं है। लड़ाई अभी लंबी चलने वाली है| भारत को पाकिस्तानी जिहादियों और उनके आकाओं से भी निपटना है और उनके “प्रोपेगैंडा वॉर” से भी.