देश की सुरक्षा चुनावी मुद्दा होना चाहिए या फिर प्रियंका की शक्ल इंदिरा गांधी से कितनी मिलती है
   दिनांक 07-मार्च-2019
देश की सुरक्षा चुनाव का मुद्दा होना चाहिए या नहीं? ये सवाल भले ही बहुत आसान हो, पर इसका जवाब उलझाने में विपक्षी दलों की रुचि सब से ज्यादा रही है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की रुचि इस बात में ज्यादा है कि चुनावी मुद्दा उनके नेता की शक्ल होनी चाहिए। कांग्रेस चाहती है कि जनता का ध्यान इस बात पर उलझा दिया जाए कि प्रियंका गांधी की शक्ल इंदिरा गांधी से मिलती जुलती है या नहीं?
उत्तर प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन किया तो कांग्रेस को 80 में से सिर्फ दो सीटें देकर उसकी वास्तविक स्थिति का अहसास करा दिया। कांग्रेस को यह बहुत अपमानजनक लगा और उसने गठबंधन से बाहर रहते हुए सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ये भी घोषणा की कि उनके पास उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े सूबे के लिए विशेष प्लान है। बाद में प्रियंका गांधी को राष्ट्रीय महासचिव बनाकर उनको पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया गया। यही था कांग्रेस का ‘विशेष प्लान’। प्रियंका गांधी लखनऊ आकर कई दिनों तक दिन-रात कार्यकर्ताओं से सलाह मशविरा करती रहीं। इसका नतीजा कुल मिलाकर ये सामने आया कि कांग्रेसियों ने जोर-शोर से माहौल बनाना शुरू किया कि प्रियंका का चेहरा उनकी दादी इंदिरा गांधी से मिलता जुलता है। वह बिल्कुल इंदिरा गांधी पर गई हैं। इसलिए पार्टी और देश की कमान संभालने की काबिलियत उनमें जन्मजात मानी जानी चाहिए। प्रियंका गांधी ने अब तक न तो कोई खास विचार दिये न ही देश के ज्वलंत मुद्दों पर कोई राय जताई, पर कांग्रेसियों को विश्वास है कि उनकी शक्ल इंदिरा गांधी से मिलती है इसलिए उत्तर प्रदेश में सपा बसपा जैसी प्रमुख विपक्षी पार्टी को बहुत पीछे छोड़ती हुई कांग्रेस मुख्य विरोधी दल की भूमिका में आ गयी है। प्रियंका की बदौलत राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी को ऐतिहासिक विजय मिलने का विश्वास है कांग्रेसियों में।
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी सवाल उठाती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा आखिर चुनावी मुद्दा क्यों नहीं होना चाहिए ? जरूर होना चाहिए। राष्ट्र की सुरक्षा के प्रति कौन सी पार्टी ज्यादा जागरूक है और किसकी सरकार के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये गये, इन मुद्दों पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए। कांग्रेस की सरकार के दौरान बोफोर्स तोप की दलाली का मुद्दा तीन दशक पहले व्यापक स्तर पर विपक्ष ने उठाया था। उस पर जनता में भारी प्रतिक्रिया हुई थी और “मिस्टर क्लीन” कहे जाने वाले राजीव गांधी की छवि जनता में धूल धूसरित हो गयी थी। तब 1989 में हुए आमचुनाव में रक्षा सौदे में दलाली ही प्रमुख मुद्दा बना और कांग्रेस को सत्ता से बाहर जाना पड़ा। उस समय एक तरह से “जनता की अदालत” में परोक्ष रूप से यह साबित हुआ कि रक्षा सौदे में दलाली खायी गयी, जिसे जनता ने पसंद नहीं किया और कांग्रेस सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया।
 
कांग्रेस को भी इस बात का अहसास भलीभांति हो गया कि विरोधी दल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता के दिमाग में यह बात बैठाने में कामयाब रहे कि कांग्रेस सरकार ने रक्षा सौदों में दलाली खाकर देश की सुरक्षा को कमजोर करने का काम किया। उसके बाद जब भी कांग्रेस सत्ता में आयी, रक्षा सौदों से कतराती रही। लड़ाकू विमान और अन्य रक्षा उपकरणों की खरीद न होने से सेना के साजोसामान लगातार कम होते गये। इस ओर से सरकारें लगातार लापरवाह बनी रहीं। लड़ाकू विमान राफेल की भी सेना ने बहुत पहले जरूरत बतायी थी। मनमोहन सिंह सरकार के दौरान राफेल सौदे के लिए शुरुआती प्रक्रिया चली भी, पर महज खानापूरी ही साबित होती रही। उसे अंजाम तक पहुंचाने की चिंता यूपीए सरकार के दौरान किसी ने नहीं की। 2009 में 1 लाख 86 हजार बुलेटप्रूफ जैकेट की मांग सेना ने तब की यूपीए सरकार से की थी। परंतु 2009-14 तक एक भी जैकेट मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान नहीं खरीदी गयी। एनडीए की मोदी सरकार आने के बाद 2014-19 के बीच 2 लाख 30 हजार से अधिक बुलेटप्रूफ जैकेट खरीद कर सेना को सौंपी गयी। आखिर क्यों सैनिकों को आतंकवादियों व नक्सलियों की गोली का शिकार होने के लिए कांग्रेस ने छोड़ दिया था ?
पिछले दिनों पाकिस्तान के तीन एफ-16 विमान भारतीय रक्षा संस्थानों पर हमले के लिए भारतीय सीमा में घुस आये थे। ये तो हमारे बहादुर पायलट अभनंदन की जांबाजी थी कि मिग-21 जैसे पुराने फाइटर से पीछा करते हुए उन्होंने कुछ अन्य साथियों के साथ न सिर्फ तीनों पाकिस्तानी एफ-16 को टारगेट तक पहुंचने से रोक दिया बल्कि एक को दौड़ाकर मार गिराने का आश्चर्यजनक कारनामा भी कर दिखाया। उस दिन भारतीय सेना ने राफेल की कमी शिद्दत से महसूस की। भारतीय पायलटों के पास यदि राफेल जैसा आधुनिक लड़ाकू विमान रहा होता तो पाकिस्तान के तीनों एफ-16 सही सलामत नहीं लौट पाते। ऐसी ही परिस्थितियों के लिए सेना ने बहुत पहले ही सरकार से राफेल लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना में जोड़े जाने की गुजारिश की थी पर मनमोहन सिंह की सरकार दस साल तक इस विमान का सौदा नहीं कर पायी। एनडीए सरकार ने देश की सुरक्षा के लिए राफेल को अत्यंत जरूरी मानते हुए इस सौदे को अंजाम तक पहुंचाया तो कांग्रेस इस सौदे में रोड़े अटकाने की लगातार कोशिश में जुटी है। राफेल सौदे को लेकर कांग्रेस के तमाम अधिवक्ताओं ने सुप्रीमकोर्ट में भी अपील की। सुप्रीमकोर्ट ने इस सौदे को नियमानुसार पाया और याचिकाकर्ताओं की सारी दलीलों को खारिज कर दिया। इसके बावजूद राफेल सौदे को रुकवाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। कांग्रेस की नीतियां जहां एक ओर ऐसे जरूरी रक्षा सौदों को रुकवाने वाली प्रतीत होती हैं वहीं दूसरी ओर देश की सुरक्षा जैसे गंभीर मसले से ध्यान हटाकर मतदाताओं को यह समझाने की कोशिश की जाती है कि उनकी नेता की शक्ल-सूरत पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलती है इस नाते देश को नेतृत्व देने में वो ज्यादा समर्थ हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)