जिन्हें एयर स्ट्राइक पर सबूत चाहिए, वह 1962 में चीन से हुए युद्ध में नेहरू की नाकामी के चलते हुई हार के सबूत जरूर पढ़ें
   दिनांक 08-मार्च-2019
आज देश खतरे में है. हम दुश्मन पर हमला करते हैं, तो हमारे ही देश में बैठे नेता सेना से सबूत मांगते हैं. आज हम इन्हें सबूत देते हैं कांग्रेस और जवाहरलाल नेहरू की राजनीतिक विफलता का. क्यूं हम चीन से हारे. 1962 में हमारी सेना, हमारे जवानों के साथ धोखा किया था.आज देश की अखंडता और सुरक्षा पर राजनीति करने वालों के लिए वो दौर एक सबक है. मुद्दा आज भी ज्वलंत है
चीन सीमा पर जंग के बादल मंडरा रहे थे. आर्मी चीफ जनरल करियप्पा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को बताया कि चीन भारत पर हमले की तैयारी कर रहा है. नेहरू फट पड़े-कमांडर इन चीफ का ये काम नहीं है कि वह प्रधानमंत्री को बताए कि कौन पर हम पर कहां से हमला करने वाला है. चीन तो नेफा सीमा पर हमारी हिफाजत करेगा. तुम कश्मीर और पाकिस्तान पर ध्यान दो. ये नेहरू जी का जुमला 1962 की जंग में चीन से हमारी हार की हकीकत बयान करता है. आत्ममुग्ध नेहरू ने भारतीय फौज को चीनी सेना के हाथ मरने के लिए छोड़ दिया. बिना गोला-बारूद हमारे जवान संगीनों और खुखरियों से आखिरी सांस तक लड़े. सबूत मांगने वालों को आज हम सबूत देंगे कि भारत की सुरक्षा के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ नेहरू ने किया था. ऐसा अपराध, जिसे इतिहास कभी माफ नहीं करेगा.
20 अक्टूबर, 1962 को जब चीन ने भारत पर हमला किया, तो नेहरू की स्थिति ठीक वैसी थी, जैसे कबूतर बिल्ली को देखकर आंख बंद कर ले. जब चीन ने तिब्बत को हड़पना शुरू किया था, नेहरू ने इस बिल्ली को लेकर तभी से आंख बंद कर ली थी. चीन जब हमारी छाती पर आ चढ़ा था, उस समय नेहरू दिल्ली में बैठकर माओ के साथ दोस्ती के सपने सजा रहे थे. नतीजा पता है आपको. इस जंग में चीन के अस्सी हजार सैनिकों और तोपखाने के मुकाबले भारत के दस हजार जवान थे. जिनके पास न तो रसद की सप्लाई थी, न गोला-बारूद की. एक महीने के बाद 21 नवंबर को चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की. देश की सुरक्षा की हालत ऐसी थी कि चीन युद्धविराम की घोषणा न करता, तो आराम से दिल्ली को जीत सकता था.
नेहरू की खुशफहमी देखिए. कहते थे-हमें किसी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की क्या जरूरत. हमारा सिद्धांत तो अहिंसा है. हमें सेना की जरूरत नहीं . सेना को खत्म कर देना चाहिए. और उधर, चीन अपनी विस्तारवादी नीति पर था. माओ का कहना था कि तिब्बत हथेली है और लद्दाख, सिक्किम, नेपाल, भूटान और नेफा उसकी पांच उंगलियां हैं. माओ के मुताबिक ये सब चीन के हिस्से थे, जिन्हें उसका तुरंत आजाद कराने का इरादा था. जब पड़ोस में एक कम्युनिस्ट तानाशाह ऐसे इरादे जाहिर कर रहा हो, तो कोई अदूरदर्शी व्यक्ति ही शांति और पंचशील का राग अलाप सकता है.
“चीन पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ा हुआ था. नेहरू ही थे, जो गुट निरपेक्ष आंदोलन की आड़ में दुनिया हर मंच पर चीन की वकालत करते थे. जापान की शांति संधि में भारत सिर्फ इसलिए शामिल नहीं हुआ था क्योंकि उसमें चीन को निमंत्रित नहीं किया गया था.”
 
चीन से जंग में हार के कारणों की जांच के लिए मार्च 1963 में लेफ्टिनेंट जनरल हेंडरसन ब्रुक्स और ब्रिगेडियर पी. एस. भगत की कमेटी बनाई गई थी. इस कमेटी ने चार महीने में अपनी रिपोर्ट सौंप दी. मई 1963 में ये रिपोर्ट आ गई, लेकिन 51 साल तक ये रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई. भला हो एक पत्रकार निवेल मैक्सवेल का. उनके हाथ ब्रुक्स परिवार के जरिये इसकी कॉपी लग गई और उन्होंने इसे सार्वजनिक कर दिया. ये रिपोर्ट असल में नेहरू की अदूरदर्शिता, राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर खिलवाड़, गलतफहमी और सैन्य विफलता का पुलिंदा है. यह रिपोर्ट साफ दर्शाती है कि 1962 की हार सेना की नहीं, बल्कि नेहरू और उनके नाकाम लेकिन दुलारे रक्षा मंत्री कृष्णन मेनन की राजनीतिक हार थी.
आज राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे अहम मुद्दा है. आज हम डोकलाम में चीन की आंख में आंख डालकर बात करते हैं. लेकिन कांग्रेस का चीन प्रेम कैसे हार की ओर ले गया, जरा जांच रिपोर्ट के बिंदुओं को देखिए.
 तिब्बत की सरकार मदद मांगती रहीं. तमाम ताकतवर देश भारत को आगाह करते रहे. लेकिन 1950 में जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा करना शुरू किया, नेहरू ने कोई मदद करने से इंकार कर दिया. जिस समय चीन तिब्बत पर कब्जा कर रहा था, नेहरू संयुक्त राष्ट्र में चीन को प्रवेश दिलाने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा रहे थे.
हम चीन के हिमायती तो थे, लेकिन कूटनीतिक तौर पर हम चीन के साथ किसी मसले को सुलझाने में विफल रहे. 1954 में चीन ने जो नक्शे प्रकाशित किए, उसमें अक्साई चीन को चीन के हिस्से के रूप में दर्शाया गया. तब जाकर नई दिल्ली को थोड़ी दिक्कत हुई. लेकिन तभी आमने-सामने बैठकर इस मसले का समाधान करने के बजाय नेहरू ने चुप्पी साध ली. उसी समय दोनों देशों के बीच सीमा को लेकर जिन स्थानों को लेकर विवाद था, कूटनीतिक तरीके से बातचीत करके सुलझाया जा सकता था.
 
जब चीन हमारी छाती पर चढ़ आया, तो बौखलाहट में नेहरू सरकार ने फारवर्ड पॉलिसी अपनाई. इसके तहत विवादित इलाकों में सैन्य चौकियां स्थापित की गई. इन चौकियों तक हथियार, रसद कैसे पहुंचेगी, इसकी कोई योजना नहीं बनाई गई. सबसे बड़ी बात, विवादित इलाकों में अपने पसंद से अपनी सीमा चुनकर चौकियां बनाना कूटनीतिक चूक थी. जब तक नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा), अरुणाचल प्रदेश को तब इसी नाम से जाना जाता था, पर चीन ने हमला नहीं कर दिया, नेहरू इसी गलतफहमी में जीते रहे कि चीन हमला नहीं कर सकता.
जल्दबाजी में तैयार की गई चौथी कोर की कमान लेफ्टिनेंट जनरल बी.एम. कौल को दी गई, जो नेहरू के खास थे. कौल को चीन को खदेड़ने की जिम्मेदारी दी गई, जिसमें कौल पूरी तरह से फिसड्डी साबित हुए.
नेहरू ने ये जांच समिति सिर्फ स्वयं को बचाने के लिए बनाई थी. इस समिति को कहा गया था कि वह सैन्य से इतर बिंदुओं और उच्च स्तर के नीतिगत निर्णयों की जांच नहीं कर सकती. फिर भी इसकी रिपोर्ट उनकी नाकामी का चिट्ठा खोलने के लिए काफी है. रिपोर्ट में लेफ्टिनेंट जनरल कौल की काबिलियत पर सवालिया निशान लगाया गया है. साथ ही 4 अक्टूबर 1962 में तेजपुर में गठित की गई चौथी कोर को गोस्ट कोर का नाम दिया. सेना की पूर्वी कमान को बाईपास करके जिस तरीके से इस कोर का गठन किया गया, वह सैन्य आपदा साबित हुई.
- चीन आक्साई चीन पर कब्जा कर चुका था.
- भारत घुटने टेककर चीन के साथ बातचीत के लिए मजबूर था.
- युद्ध में भारत के 14 सौ जवानों ने बलिदान दिया. 16 सौ ज्यादा जवान लापता हो गए.
- सीमा के निर्धारण में चीन की कोई रूचि नहीं है, वह इस विवाद को जिंदा रखना चाहता है.