गौरांग प्रभु का विलक्षण कृष्ण प्रेम
   दिनांक 01-अप्रैल-2019
  - पूनम नेगी                                    
चैतन्य महाप्रभु श्रीकृष्ण प्रेम के साक्षात् विग्रह हैं। वे मूर्तिमान सौन्दर्य हैं। उनकी तीन शक्तियां हैं- परमब्रह्म, माया और विलास शक्ति। लेकिन प्रेम उनकी मूल शक्ति है और राधा भाव कृष्ण प्रेम का सर्वोच्च आलम्बन
 हरि भक्तों के साथ हरिनाम संकीर्तन करते हुए चैतन्य महाप्रभु
मध्यकालीन भारत के सांस्कृतिक इतिहास में भक्ति आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भक्ति आंदोलन के क्रांतिधर्मी संतों की सुदीर्घ शृंखला का एक चमकता रत्न थे- चैतन्य महाप्रभु। मानवमात्र के हित के लिए किए गए महाप्रभु के महान कार्यों को अगर एक शब्द में व्यक्त करना हो तो वह शब्द है- प्रेम! महाप्रभु का समूचा जीवन कृष्णमय रहा। वे श्रीकृष्ण के ‘प्रेमावतार’ माने जाते थे।
15वीं सदी में फाल्गुन शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को पश्चिम बंगाल के नवद्वीप गांव (अब मायापुर) में जन्मे चैतन्य महाप्रभु ने हरिनाम संकीर्तन की रसधार बहा कर उस युग की पीड़ित व क्षुधित मानवता को प्रभु प्रेम की जो संजीवनी सुधा पिलाई, वैष्णव कृष्ण भक्तों के हृदय में उसकी गमक आज भी है। ऐसे अंधकार युग में जब हिन्दू समाज अस्पृश्यता, आडम्बर जैसी सामाजिक कुरीतियों में उलझा हुआ था चैतन्य महाप्रभु देवदूत की तरह अवतरित हुए। राजनीतिक व सामाजिक अस्थिरता के उस युग में उन्होंने हरि संकीर्तन की अनूठी शैली से समाज में एकता व सद्भावना का संचार किया। इस आंदोलन का मूल लक्ष्य था ‘सर्व-धर्म समभाव, प्रेम, शांति व अहिंसा’ की भावना को जन-जन के हृदय में संचारित कर उनका हृदय परिवर्तन करना। माना जाता है कि चैतन्य महाप्रभु ने द्वापर युगीन विलुप्त वृन्दावन को फिर से आबाद किया। वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय के संस्थापक महाप्रभु ने अपने छह प्रमुख अनुयायियों (गोपालभट्ट गोस्वामी, रघुनाथभट्ट गोस्वामी, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी और रघुनाथदास गोस्वामी) को वृंदावन भेजकर सप्त देवालयों की नींव रखवाई। ये अनुयायी षड्गोस्वामियों के नाम से विख्यात हैं और गौड़ीय संप्रदाय की स्थापना में इनकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। इन्होंने वृंदावन में सात वैष्णव मंदिरों यथा गोविंददेव मंदिर, गोपीनाथ मंदिर, मदनमोहन मंदिर, राधारमण मंदिर, राधा दामोदर मंदिर, राधा श्यामसुंदर मंदिर और गोकुलानंद मंदिर की स्थापना की।
‘प्रेम’ को सर्वोत्तम पुरुषार्थ घोषित करने वाले इस महान कृष्ण भक्त का बचपन विलक्षणताओं से भरा था। वे माता शचीदेवी के गर्भ में तेरह मास रहे। कहा जाता है कि शैशवावस्था में एक दिन महाप्रभु खटोले में जोर-जोर से रो रहे थे। जैसे ही उनकी माता ने ‘हरि बोल, हरि बोल, मुकुन्द माधव गोविन्द बोल’ पद गाकर उन्हें थपकी दी, वे सो गए। वे जब भी रोते, माता यही पद गाकर उन्हें चुप करा देतीं। महाप्रभु का जन्म नीम के पेड़ के नीचे हुआ था, इसलिए इनका नाम निमाई भी पड़ा। इसी तरह, गौर वर्ण होने के कारण वे गौरांग, गौर हरि, गौर सुंदर भी कहलाए।
बचपन की एक और घटना से उनकी अलौकिकता का पता चलता है। एक दिन उनके घर एक ब्राह्मण अतिथि आया। जब अतिथि भोजन करने से पहले अपने इष्ट का ध्यान कर रहे थे तो बालक निमाई ने झट से आकर भोजन का एक निवाला उठाकर खा लिया। यह देखकर माता-पिता ने गुस्से में उन्हें घर से बाहर कर दिया और अतिथि को दोबारा भोजन परोसा, पर निमाई ने इस बार भी वही किया। अंत में उन्होंने माता-पिता और अतिथि को गोपाल रूप का दर्शन कराया। जब वे 15 साल के हुए तो उन्होंने न्यायशास्त्र पर एक ग्रंथ लिखा। इसे देखकर उनके एक मित्र को ईर्ष्या हुई। उन्हें डर था कि इस ग्रंथ के आने के बाद उनके द्वारा लिखित ग्रंथ का आदर कम हो जाएगा। निमाई को जब यह बात पता चली तो उन्होंने अपना ग्रंथ गंगा में बहा दिया। निमाई 16 वर्ष के हुए तो उनका विवाह लक्ष्मी देवी के साथ हुआ, लेकिन कुछ ही समय बाद ही सर्पदंश से पत्नी की अकाल मृत्यु हो गई। निमाई का दूसरा विवाह नवद्वीप के राज पंडित सनातन की पुत्री विष्णुप्रिया के साथ हुआ। 24 साल की आयु में निमाई ने जब घर छोड़ा तो वह क्षण बंगभूमि के लिए ऐतिहासिक बन गया। कहते हैं कि युवा निमाई पिता का श्राद्ध करने गया तीर्थ गए। वहीं उनकी भेंट ईश्वरपुरी नामक वैष्णव संत से हुई। उन्होंने निमाई के कान में कृष्ण भक्ति का मंत्र फूंक दिया और उनका पूरा जीवन ही बदल गया। बाद में उन्होंने वैष्णव संत केशव भारती से संन्यास की दीक्षा ली और चैतन्य महाप्रभु बन गए।
संन्यास लेने के बाद महाप्रभु पहली बार जब जगन्नाथ मंदिर पहुंचे तो भगवान की प्रतिमा देखकर भाव-विभोर होकर नृत्य करते-करते मूर्च्छित हो गए। प्रकांड पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभु की भक्ति से प्रभावित होकर उन्हें अपने घर ले गए। घर पर शास्त्र-चर्चा आरंभ हुई और सार्वभौम अपनी विद्वता का प्रदर्शन करने लगे तो महाप्रभु ने भकित का महत्त्व ज्ञान से ऊपर बताते हुए उन्हें अपने षड्भुजरूप का दर्शन कराया। महाप्रभु का वह दिव्य रूप देख सार्वभौम नतमस्तक हो उनके चरणों में गिर पड़े। महाप्रभु के शिष्य बन वह आखिरी समय तक उनके साथ रहे। पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य ने चैतन्य महाप्रभु की शत-श्लोकी स्तुति की रचना की, जिसे चैतन्य शतक नाम से जाना जाता है। ओडिशा के सूर्यवंशी सम्राट गजपति महाराज प्रताप रुद्र्रदेव भी महाप्रभु के अनन्य भक्त थे। चैतन्य देव ने देश के कोने-कोने की पदयात्रा कर में हरिनाम की महत्ता का प्रचार किया। पुरी के अलावा वे दक्षिण भारत के श्रीरंग क्षेत्र व सेतुबंध आदि स्थानों पर भी रहे। 
जब जगन्नाथजी के श्रीविग्रह में लीन हुए महाप्रभु
वृन्दावन से लौटने के बाद जीवन के अंतिम 18 वर्ष तक चैतन्य महाप्रभु पुरी के नीलांचल धाम में ही रहे। इस दौरान उनका श्रीकृष्ण प्रेम पराकाष्ठा पर था। वे श्रीजगन्नाथ मंदिर के गरुड़ स्तंभ के सहारे खड़े-खड़े घंटों प्रभु को निहारा करते थे। उनके नेत्रों से अश्रुधाराएं बहती रहती थीं। एक दिन उड़ीसा की एक वृद्धा आरती के दौरान गरुड़ स्तंभ पर चढ़ गई और महाप्रभु के कंधे पर पैर रखकर जगन्नाथजी का दर्शन करने लगी। यह देखकर महाप्रभु के भक्त गोविन्द ने वृद्धा को डांटा तो वे हंसते हुए बोले, ‘‘इसके दर्शनसुख में विघ्न मत डालो, यह आदि शक्ति महामाया है।’’ यह सुनते ही वृद्धा उनके चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगी। प्रभु बोले, ‘‘मातेश्वरी! तुम्हारे अंदर जगन्नाथजी के दर्शन की जैसी विकलता है, वैसी मुझमें नहीं है। तुम्हारी एकाग्रता को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम!’’ इतना कह कर महाप्रभु जोर-जोर से रोने लगे।
एक दिन महाप्रभु रोज की तरह गरुड़ स्तंभ के पास रुकने की बजाय सीधे मंदिर के गर्भगृह में पहुंच गए। अचानक ही मंदिर के सारे कपाट बंद हो गए। कहते हैं कि गुंजाभवन में पूजा कर रहे एक पुजारी ने उनकी अंतिम लीला देखी। पुजारी के अनुसार, जगन्नाथ स्वामी के सम्मुख हाथ जोड़े महाप्रभु प्रार्थना कर रहे थे, ‘‘हे दीन वत्सल प्रभो! आप जीवों पर ऐसी दया कीजिए कि वे निरंतर आपके सुमधुर नामों का सदा कीर्तन करते रहें। घोर कलियुग में जीवों के लिए आपके चरणों के सिवा दूसरा आश्रय नहीं। इन अनाश्रित जीवों पर कृपा कर अपने चरणकमलों का आश्रय दीजिए। कहते हैं, इसके बाद उन्होंने श्रीजगन्नाथजी के श्रीविग्रह को आलिंगन किया और 48 वर्ष की अल्पायु में उन्हीं में विलीन हो गए।