जिस विश्वविद्यालय को बख्तियार खिलजी ने जलाया आज वहां बताया जा रहा है इस्लाम शांतिप्रिय महजब है
   दिनांक 01-अप्रैल-2019
         - रवि शंकर                                        
यह बात किसी से छुपी नहीं है कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को मजहबी उन्मादी बख्तियार खिलजी ने आग के हवाले कर दिया था, लेकिन आज उसी विश्वविद्यालय में यह बताने की कोशिश हो रही है कि इस्लाम शांतिप्रिय मजहब है। आज के नालंदा विश्वविद्यालय में वह नालंदा ही नहीं है, जो ज्ञान का दीपक जलाता था
 प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष 
प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के पुनरोद्धार के बाद इसे अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की मान्यता प्रदान की गई है। इसके लिए 2013 में आठवें पूर्वी एशिया सम्मेलन में विभिन्न देशों की सरकारों के साथ एक करार किया गया था। इस करार में अभी तक विएतनाम, लाओस, थाईलैंड, श्रीलंका, चीन, इंडोनेशिया, पुर्तगाल, न्यूजीलैंड, म्यांमार, दक्षिण कोरिया, बांग्लादेश, आस्ट्रेलिया आदि कुल 13 देश शामिल हो चुके हैं। वर्तमान में यहां स्नातकोत्तर और उससे ऊपर के अनेक पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इनके संचालन के लिए सात विद्यालयों की स्थापना की गई है- स्कूल आॅफ इकोलोजी एंड इन्वायरनमेंटल स्टडीज, स्कूल आॅफ हिस्टोरिकल स्डटीज, स्कूल आॅफ बुद्धिस्ट स्टडीज, फिलॉसफी एंड कॅम्पेरेटिव रिलिजियन्स, स्कूल आॅफ लेंग्वेजेज एंड लिट्रेचर/ह्युमेनिटिज, स्कूल आॅफ इंटरनेशनल रिलेशन्स एंड पीस स्टडीज, स्कूल आॅफ बिजनेस मैनेजमेंट इन रिलेशन टू पब्लिक पॅलिसी एंड डेवलेपमेंट स्टडीज।
इन विद्यालयों के तहत विभिन्न पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इनमें इस्लाम और सूफी जैसे विषय भी शामिल हैं। हैरत की बात यह है कि अभी तक जो भी शोधपरक कार्य विश्वविद्यालय में किए गए हैं, उनमें इस्लाम और सूफीवाद ही प्रमुख है। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध और सनातन दर्शनों का अध्ययन प्रमुखता से हुआ करता था। आज इन दोनों का ही वहां अभाव-सा दिख रहा है। बौद्ध दर्शन का एक विभाग अवश्य रखा गया है, परंतु प्रकाशित शोध कार्यों में उसका प्रतिनिधित्व ही नहीं दिखता है। आज जबकि हमें यह ज्ञात है कि इस्लामी जिहादी आक्रमण ने ही नालंदा का विनाश किया था, उसी विश्वविद्यालय में इस्लाम को ‘शांतिप्रिय’ घोषित करने का प्रयास करना एक प्रकार का बौद्धिक छल ही कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त नालंदा विश्वविद्यालय में विज्ञान का विषय नहीं रखा गया है, जबकि प्राचीन विश्वविद्यालय में रसायन आयुर्वेद आदि विज्ञान के विषय प्रमुखता से पढ़ाए जाते थे। कुल मिलाकर नालंदा विश्वविद्यालय के वर्तमान प्रारूप में केवल नाम ही नालंदा का प्रयोग किया गया है, उसमें कहीं से भी न तो नालंदा दिखता है और न ही भारत। जबकि पहले नालंदा के केंद्र में केवल भारत और भारतीयता थी।
उन दिनों भारत वह देश था, जहां पूरी पृथ्वी से लोग अपने-अपने चरित्र की शिक्षा ग्रहण करने आया करते थे। हमें यह बात आज स्वप्न जैसी प्रतीत हो सकती है। आज ज्यादातर भारतीय विद्यार्थियों का स्वप्न विदेश जाकर पढ़ने का होता है। आॅक्सफोर्ड, कैंब्रिज, हार्वर्ड आदि विश्वविद्यालयों के नाम बड़े ही गर्व से लिए जाते हैं कि ये विश्व के सर्वश्रेष्ठ शिक्षाकेंद्र हैं। विश्वभर से विद्यार्थी वहां पढ़ने के लिए जाते हैं। परंतु एक समय इसका ठीक उलटा हुआ करता था। पूरे विश्व से लोग शिक्षा ग्रहण करने या फिर अपने अध्ययन तथा विद्वता को प्रमाणित करवाने के लिए भारत आया करते थे। यह बहुत पुरानी बात नहीं है। 12वीं शताब्दी तक भारत विश्व का सर्वोत्कृष्ट शिक्षाकेंद्र था। उस समय पूरे यूरोप में अंधकार युग चल रहा था, शिक्षा चर्च के अंदर सिमटी हुई थी, परंतु शेष पूरा विश्व शिक्षा के लिए भारत की ओर देखता था। सुदूर उत्तर में मंगोलिया से लेकर पूरब में चीन और जापान तक और पश्चिम में पूरे मध्य-पूर्व तथा अफ्रीका तक भारत के शिक्षा केंद्र्रों की ख्याति फैली हुई थी। भारत में वैसे तो ढेर सारे विश्वविद्यालय रहे हैं, परंतु यहां नालंदा विश्वविद्यालय का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
नालंदा और तक्षशिला, विश्व के शिक्षा जगत में काफी सुपरिचित नाम हैं। ये दोनों ही काफी प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध विश्वविद्यालय रहे हैं। दुर्भाग्य से तक्षशिला आज पाकिस्तान में पड़ता है और इसलिए निकट भविष्य में उसके उद्धार की संभावना नहीं दिखाई देती है, परंतु नालंदा का उद्धार भारत सरकार ने सितंबर, 2014 में कर दिया है। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने 2007 में ही इसके पुनरोद्धार का विचार देश के सामने रखा था, परंतु यह सपना साकार हुआ नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद। प्रश्न उठता है कि क्या इस पुनरोद्धार के बाद नालंदा विश्वविद्यालय फिर से अपनी उसी प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और गरिमा को प्राप्त कर पाएगा? क्या वह फिर से पूरे विश्व के लिए मान्य और आकर्षण का केंद्र विश्वविद्यालय बन पाएगा?
नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास लगभग 3,500 वर्ष पुराना है। नालंदा वह स्थान है जहां भगवान बुद्ध ने भी कुछ समय निवास किया था। हालांकि यूरोपीय इतिहासकारों तथा उनका अनुसरण करने वाले भारतीय इतिहासकारों के मत में बुद्ध का काल केवल 2,500 वर्ष पहले का है, परंतु भारतीय ग्रंथों, विशेषकर पुराणों की कालगणना के अनुसार बुद्ध लगभग 3,500 वर्ष पहले हुए थे। नालंदा का इतिहास भगवान बुद्ध से जुड़ा है और इसलिए वह भी 3,500 वर्ष पुराना है। माना जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय लगभग 1300-1400 वर्ष तक कार्यरत अवस्था में रहा था। पश्चिमी इतिहासकारों के अनुसार भी वह लगभग 700-800 वर्ष तक कार्यरत था। इतनी लंबी अवधि तक किसी विश्वविद्यालय का कार्यरत रहना और पूरे विश्व में प्रतिष्ठित रहना एक प्रकार का विश्व कीर्तिमान ही है। हालांकि कुछेक शिलालेखों के आधार पर यह अनुमान किया जाता है कि गुप्त राजवंश के काल में नालंदा को विश्वविद्यालय का स्तर प्राप्त हुआ और पाश्चात्य इतिहासकारों के मत में गुप्त राजवंश का काल पांचवीं शताब्दी का है, परंतु भारतीय पुराणों के कालक्रम के अनुसार गुप्त राजवंश का काल भी ईसा पूर्व सातवीं-आठवीं शताब्दी का है। यदि हम इस कालगणना के पचड़े में न पड़ें तो इतिहास के दो तथ्य हमारे समक्ष आते हैं। पहला यह कि कई सौ वर्षों से एक विशाल विश्वविद्यालय विश्व में प्रतिष्ठित था और दूसरा यह कि बारहवीं शताब्दी में इस विश्वविख्यात विश्वविद्यालय को एक मुस्लिम आक्रांता बख्तियार खिलजी ने नष्ट कर दिया था।
भवन और परिसर की भव्यता
नालंदा विश्वविद्यालय लगभग 14 हेक्टेयर के इलाके में फैला हुआ था। इसके परिसर में 10 मंदिर और छह बौद्ध मठ थे। यह पूरी तरह आवासीय था और यहां 10,000 से अधिक छात्रों तथा 2,000 से अधिक शिक्षकों के रहने की व्यवस्था थी। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार उसने इतने छात्र और शिक्षक तो रहते देखे थे। ये आवासीय भवन कई-कई मंजिलों के हुआ करते थे। ह्वेनसांग वर्णन करता है कि इन भवनों के शिखर पहाड़ों जितने ऊंचे थे और उन पर चढ़ने से बादलों के भी ऊपर जाया जा सकता था। पुजारियों के भवन भी चारमंजिला थे जिसके स्तंभ लाल मोती के रंग के थे और छत को ऐसी टाइलों से सजाया गया था जिनसे प्रकाश कई रंगों में प्रतिबिंबित हुआ करता था। पूरे परिसर में आम के ढेर सारे बाग थे। पुरातात्त्विक खुदाई में तीन मठ और एक मंदिर निकला था। इन भवनों की बनावट को देखने से हम अंदाजा लगा सकते हैं कि उस वक्त कैसे शानदार भवन रहे होंगे। इन भवनों की दीवारें छह फीट, छह र्इंच से लेकर सात फीट, छह र्इंच तक मोटी हैं। इनमें लगी ईटें अति उच्च गुणवत्ता की हैं और इन्हें इस प्रकार से लगाया गया है कि उनके बीच का अंतर नहीं दिखता। हरेक कमरे में दो आले बने हुए थे। मुख्य महाविद्यालय में सात सभागार थे और 300 कक्षाएं थीं। मुख्य महाविद्यालय ही लगभग 1.6 किलोमीटर लंबे और 0.8 किलोमीटर चौड़े क्षेत्र में बना हुआ था।
शिक्षण और शैक्षणिक वातावरण
नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ाई कक्षा एक से लेकर परास्नातक तक की होती थी। आधुनिक विश्वविद्यालयों की भांति वहां केवल उच्च शिक्षा ही नहीं दी जाती थी। वहां प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक की व्यवस्था थी। प्राथमिक कक्षा के लिए छह वर्ष की आयु में प्रवेश दिया जाता था और उच्च शिक्षा के लिए लगभग बीस वर्ष की आयु में। प्राथमिक कक्षा में किसी को भी प्रवेश मिल जाता था, जबकि उच्च शिक्षा के लिए प्रवेश पाने के लिए अभ्यर्थी को कठिन परीक्षाओं से गुजरना होता था। नालंदा और आधुनिक विश्वविद्यालयों में यह एक महत्त्वपूर्ण अंतर है। आज के विश्वविद्यालय विद्यालयीन शिक्षा से कटे होने के कारण उस अनुशासन और शैक्षणिक वातावरण से वंचित हो जाते हैं। साथ ही विद्यालयों में भी विश्वविद्यालयों का वातावरण नहीं मिलता। नालंदा विश्वविद्यालय अपने छात्रों को प्राथमिक से लेकर उच्चतम शिक्षा तक एक श्रेष्ठ शैक्षणिक वातावरण और विद्वानों का साहचर्य उपलब्ध कराता था। भारत की प्राचीन गुरुकुल प्रणाली के विपरीत यहां विभिन्न विद्यालय अलग-अलग संचालित नहीं होते थे, बल्कि सभी विद्यालयों और महाविद्यालयों का संघ बना हुआ था जो सभी स्तर के शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए नियमों का निर्धारण किया करता था। सभी संस्थान कुछ सीमा तक स्वाधीन भी होते थे और कुछ सीमा तक एक-दूसरे से संबद्ध भी होते थे। इस सीमारेखा का निर्धारण संघ ही किया करता था।
नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के लिए तिब्बत, मंगोलिया, चीन, कोरिया, जापान, ग्रीस, फारस और मिस्र तक से विद्यार्थी आते थे। ह्वेनसांग के वर्णनों से पता चलता है कि प्रवेश के लिए आने वाले विद्यार्थियों की इतनी कठिन परीक्षा ली जाती थी कि केवल बीस प्रतिशत अभ्यर्थी ही उत्तीर्ण हो पाते थे। विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने वाले सभी विद्यार्थियों के लिए नैतिकता उच्चतम मापदंड स्थापित किया जाता था और उनसे वैसे ही व्यवहार का पालन करने की अपेक्षा की जाती थी। शिक्षा उनके लिए तपस्या का विषय था, राजनीति का नहीं। इसलिए पूरे विश्व में नालंदा विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की धाक केवल विद्वता के लिए ही नहीं, बल्कि नैतिक व्यवहार के लिए भी जानी जाती थी। नालंदा विश्वविद्यालय के इतने लंबे इतिहास में एक भी विद्रोह, धरना, प्रदर्शन, हड़ताल आदि की घटनाओं का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।
यह विश्वविद्यालय प्रारंभ में बौद्ध मत का केंद्र था परंतु बाद में वहां वैदिक मत को भी उतनी ही प्रतिष्ठा दी जाने लगी थी। ह्वेनसांग के अनुसार यहां पढ़ाए जाने वाले विषय काफी विस्तृत थे। महायान, हीनयान सहित बौद्धों की सभी शाखाओं की शिक्षा यहां दी जाती थी, परंतु महायानों का शून्यवाद और विज्ञानवाद अनिवार्य विषय थे, जिन्हें हरेक विद्यार्थी को पढ़ना ही होता था। इसके अलावा चारों वेद, उसके छह अंगों की भी शिक्षा दी जाती थी। योग, सांख्य, संस्कृत व्याकरण, न्याय और दर्शन की भी पूरी शिक्षा यहां उपलब्ध थी। खगोलशास्त्र और ज्योतिष भी प्रमुख विषयों में था। इसके लिए वहां विशेष वेधशालाएं और जलघड़ी भी बनाई गई थी। यहां से जो समय बताया जाता था, पूरे मगध साम्राज्य में वही समय मान्य होता था। तंत्र भी नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ाए जाने वाले विषयों में एक प्रमुख विषय था। तंत्र आज की भांति केवल कर्मकांडी क्रियाएं भर नहीं हुआ करता था। तंत्र में रसायनविद्या, यंत्रविद्या आदि सभी शामिल थे। बौद्ध और वैदिक सभी छात्रों के लिए संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य था। इनके अलावा क्षत्रियों को धनुर्विद्या की भी शिक्षा दी जाती थी। वैशेषिक का परमाणुवाद और आयुर्वेद भी प्रमुखता के साथ पढ़ाए जाते थे। इस प्रकार नालंदा विश्वविद्यालय ज्ञान-विज्ञान, धर्म-दर्शन के साथ-साथ प्रायोगिक विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान और रसायन तथा यंत्र विज्ञान का भी प्रमुख शिक्षाकेंद्र था।
नालंदा का पुस्तकालय विश्वप्रसिद्ध था। कहते हैं कि जब इसे मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा जलाया गया तो कई महीनों तक आग जलती रही थी। कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय में पुस्तकालय के लिए तीन विशाल भवन बने हुए थे। इनके नाम थे-रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक। एक मोटे अनुमान के अनुसार इन पुस्तकालयों में एक करोड़ से अधिक पुस्तकें थीं।
आर्थिक स्वावलंबन
नालंदा विश्वविद्यालय प्रारंभ में समाज की सहायता पर ही चलता था। परंतु बाद के काल में विशेषकर गुप्त राजाओं के समय इसे पर्याप्त राजकीय सहायता भी मिलती रही। कहा जाता है कि नालंदा का नाम नालंदा पड़ा ही इसी कारण कि यहां अगाध धनराशि दान में मिला करती थी। हालांकि भारतीय गुरुकुल प्रणाली के अनुसार नालंदा के विद्यार्थी भी भिक्षावृत्ति से ही निर्वाह करते थे, परंतु वे भिक्षावृत्ति केवल निर्वाह के लिए नहीं हुआ करती थी। विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के लिए संयुक्त भोजनालय की व्यवस्था हुआ करती थी। इसलिए भिक्षावृत्ति केवल शिक्षा के लिए ही हुआ करती थी ताकि विद्यार्थी विनम्र बनें और अहंकार से दूर रहें। विश्वविद्यालय का व्यय राज्य और समाज द्वारा दिए गए दान से ही चलता था।
भारतीय राजाओं के अलावा, जावा, सुमित्रा, श्रीलंका, तिब्बत, वर्तमान भूटान आदि देशों के राजा भी इसे दान दिया करते थे। दान के कारण ही इस विश्वविद्यालय को कभी भी वित्तीय संकट का सामना नहीं करना पड़ा। विश्वविद्यालय में कभी शासकीय हस्तक्षेप नहीं रहा। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जिनमें वहां राजाओं के बेटे जाकर सामान्य विद्यार्थी की तरह रह कर ही विद्याध्ययन किया करते थे। कई प्रसंगों में राज्य के उत्तराधिकारी राजकुमारों ने यहां शिक्षा ग्रहण करने के बाद राज्य त्याग दिया और विश्वविद्यालय में ही अध्यापन कार्य स्वीकार कर लिया। ऐसे कुछेक राजकुमार यहां कुलपति भी बने।
नालंदा विश्वविद्यालय को 1194 में बख्तियार खिलजी ने नष्ट कर दिया। एक फारसी इतिहासकार मिन्हाज इ सिराज ने उसके इस विध्वंसक कार्य का उल्लेख अपनी पुस्तक ‘तबाकत-ए-नासिरी’ में किया है। वे लिखते हैं, ‘‘मुहम्मद बख्तियार ने उस विशाल भवन पर आक्रमण किया, उस पर कब्जा किया और वहां बड़ी मात्रा में लूट मचाई। वहां बड़ी संख्या में ब्राह्मण रहते थे, जिन्हें निर्ममतापूर्वक कत्ल कर दिया गया। लूट मचाने और कत्लेआम करने के बाद उसका ध्यान पुस्तकालयों की ओर गया। उसने उन पुस्तकों के बारे में जानना चाहा, परंतु उनके बारे में जानने वाले सभी लोग कत्ल किए जा चुके थे।’’ सिराज लिखते हैं कि इसके बाद उन पुस्तकों को जला दिया गया। जो हजारों बौद्ध भिक्षु पकड़े गए, उन्हें भी उन पुस्तकों के साथ ही जिंदा जला दिया गया। एक अन्य ऐतिहासिक वर्णन बताता है कि नालंदा के एक आयुर्वेदाचार्य राहुल श्रीभद्र ने बख्तियार खिलजी की चिकित्सा करके उसे स्वस्थ कर दिया था, जबकि उसके सभी हकीमों ने हाथ खड़े कर दिए थे। खिलजी को इस बात पर क्रोध आ गया कि उसका इलाज एक भारतीय चिकित्सक से हुआ, उसके अपने हकीम नहीं कर पाए। इस क्रोध में उसने इस विश्वविद्यालय को नष्ट करने का प्रण कर लिया।
यह दुर्भाग्यजनक ही है कि ऐसे मूर्ख आक्रांता के नाम पर उसी बिहार में एक शहर और रेलवे स्टेशन बख्तियारपुर भी है। नालंदा विश्वविद्यालय का पुनरोद्धार करके नरेंद्र मोदी सरकार ने एक ऐतिहासिक काम किया है। परंतु यदि नालंदा के पुराने गौरव को वापस लाना है तो हमें उसके कार्य करने के तरीके को उचित राह पर लाना होगा।
 
(लेखक सभ्यता अध्ययन केंद्र, नई दिल्ली के निदेशक और भारतीय धरोहर पत्रिका के कार्यकारी संपादक हैं)