हर वह शख्स जिसकी मां भारती में आस्था है, वह चौकीदार है
   दिनांक 01-अप्रैल-2019
चौकीदार असल में एक शब्द या नारा नहीं है. ये अवधारणा है. ये प्रेरणा है, जो कश्मीर में कबाइलियों का रास्ता रोक लेने का जज्बा देती है. जो केरल की बाढ़ में घर-घर पहुंचने का हौसला देती है. जो हैदराबाद के निजाम से टक्कर लेने की कुव्वत देती है. हर वह शख्स जिसकी मां भारती में आस्था है, वह चौकीदार है.

आज सड़क पर निकलिए. कुछ ही कदम पर आपको कोई गाड़ी नजर आएगी, जिस पर स्टीकर चस्पा होगा... चौकीदार. कहीं कोई बाइक पर जाता नौजवान नजर आएगा, जिसकी टीशर्ट होगी... मैं भी चौकीदार. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों में चौकीदार-चौकीदार गूंज रहा है. ये नारा कांग्रेस को सुहाता नहीं है. राहुल गांधी को चौकीदार शब्द से नफरत ही हो गई है. चौकीदार असल में एक शब्द या नारा नहीं है. ये अवधारणा है. ये प्रेरणा है, जो कश्मीर में कबाइलियों का रास्ता रोक लेने का जजबा देती है. जो केरल की बाढ़ में घर-घर पहुंचने का हौसला देती है. जो हैदराबाद के निजाम से टक्कर लेने की कुव्वत देती है. हर वह शख्स जिसकी अखंड भारत और मां भारती में आस्था है, वह चौकीदार है. और जिसकी मां भारती में आस्था है वह कांग्रेस को कैसे सुहा सकता है.
चौकीदार से डरता कौन है...
31 मार्च को संवाद कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा- कुछ लोगों के मानसिक विकास की मर्यादा है. इसलिए उनके लिए चौकीदार शब्द का मतलब है, टोपी लगाए, मुंह में सीटी दबाए, डंडा ठोकता कोई शख्स. जी नहीं, चौकीदार का मतलब बस इतना भर नहीं है. महात्मा गांधी का देश में हर व्यक्ति की हिस्सेदारी (ट्रस्टीशिप) का जो सपना था, वही चौकीदार का मतलब है. कांग्रेस, तृणमूल, तेलगू देशम, टीआरएस, बसपा, सपा जैसी प्राइवेट लिमिटेड पार्टियों की बौखलाहट को समझिए. जिनका रेशा-रेशा भ्रष्टाचार में डूबा है, जांच एजेंसियां जिनके पीछे घूम रही हैं. जिन्हें सपने में जेल नजर आती है. उनका मुकाबला किस शख्स है. उस व्यक्ति से, जिसके इतने लंबे सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार का एक छींटा नहीं है. अस्तित्व की लड़ाई लड़ते-लड़ते आपस में ही लड़ रहे इन दलों को पता है कि चौकीदार की अवधारणा जितनी मजबूत होगी, इनकी स्थिति उतनी ही कमजोर होगी. इन्हें पता है कि हर देशवासी चौकीदार के भाव से अगर इन्हें टोकने लगा, सवाल पूछने लगा, तो पिछले सत्तर साल की कारगुजारियों का जवाब ये कैसे देंगे. लेकिन भारत के प्रवाह पर अब इनका वश नहीं है. ये नया भारत है. चौकीदार का भाव जाग रहा है. सोशल मीडिया पर तमाम ऐसे वीडियो हैं, जिसमें कांग्रेस या किसी विपक्षी दल की प्रचार पार्टी को देखकर युवा चौकीदार-चौकीदार के नारे लगाते हैं. प्रत्याशित नतीजे भी मिलते हैं. ये प्रचार पार्टियां या तो भाग खड़ी होती हैं, या लड़ने पर उतारू हो जाती हैं. चौकीदार को देखकर कौन भागता है, कौन लड़ता है, ये आप बखूबी समझ सकते हैं.

 
विपक्ष को चौकीदार शब्द से नफरत क्यों
विपक्षी दलों को चौकीदार शब्द से इतनी नफरत क्यों हो गई है. असल में जब ये आंख बंद करते हैं, तो चौकीदार के रूप में इन्हें एक स्वयंसेवक नजर आता है. जो सेवा कार्य करते हुए चाय की दुकान से प्रधान सेवक की कुर्सी तक पहुंच सकता है.
कैसे-कैसे चौकीदार
-विभाजन के बाद लगी सांप्रदायिक आग में सब कुछ लुटाकर आने वाले शरणार्थियों के लिए नेहरू की सरकार के पास कुछ नहीं था. तब ये चौकीदार ही थे, जो 3000 से ज्यादा राहत शिविर लगाकर तन-मन-धन से सेवा कार्य में लगे थे.
-विभाजन के बाद 1947 में पाकिस्तान सीमा पर चौकीदारी भी स्वयंसेवक ही कर रहे थे. अक्टूबर 1947 में कबाइलियों के भेष में पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ का मुकाबला न तो नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न कश्मीर के महाराजा. उन पाकिस्तानी टुक़ड़ियों को श्रीनगर पर कब्जा करने अगर किसी ने रोका, तो वे चौकीदार ही थे. इसी चौकीदारी में कइयों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया.
- 1962 की जंग को कैसे भूल सकते हैं. नेहरू की सरकार सीमा पर लड़ रहे जवानों को गोला-बारूद और रसद तक नहीं दे पा रही थी. देशभर से स्वयंसेवक इकट्ठा होकर जान की बाजी लगाते हुए सीमा पर चौकीदारी के लिए जा पहुंचे. रसद पहुंचाने का काम हो या खाली इलाकों में चौकसी, चौकीदार पूरी वीरता से अपनी सेना के साथ डटे रहे नेहरू जैसा संघ विरोधी आदमी भी इस चौकीदारी के सामने घुटने के बल आ गया. 26 जनवरी 1963 की परेड में शामिल होने के लिए संघ को निमंत्रण दिया. दो दिन के नोटिस पर तीन हजार से ज्यादा स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित थे. यह होता है चौकीदार.
-1965 में जनरल अय्यूब खान के नेतृत्व में पाकिस्तान ने भारत पर धावा बोला. पाकिस्तान के हमले का फोकस कश्मीर था. हमले के लिए सर्दी का मौसम जानबूझकर चुना गया था. हवाई पट्टियों पर बर्फ जमी थी. इसे हटाने का काम स्वयंसेवकों ने संभाला. इस जंग में भी सरकार को संघ याद आया। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आग्रह किया कि दिल्ली में यातायात की व्यवस्था स्वयंसेवक संभाले. पुलिस को सेना की मदद के लिए फ्री किया जा सके. ये काम इन चौकीदारों ने बखूबी अंजाम दिया. घायल जवानों के लिए रक्तदान के लिए सबसे पहले स्वयंसेवक ही पहुंचे.
- दादरा नगर हवेली आजादी के बाद भी पुर्तगाल का उपनिवेश था. 2 अगस्त 1954 को स्वयंसेवकों ने ही तिरंगा फहराकर आजादी का ऐलान किया. इसके बाद इसका नियंत्रण भारत सरकार को सौंप दिया. गोवा मुक्ति संग्राम तो पूरी तरह चौकीदारों का ही अभियान था. जगन्नाथ राव जोशी समेत संघ के कई कार्यकर्ताओं को दस साल की सजा सुनाई गई. हालात बिगड़ गए. सशस्त्र हस्तक्षेप से बचते रहे नेहरू को आखिरकार सैनिक भेजने पड़े. 1961 में गोवा की आजादी में इन चौकीदारों का ही करिश्मा है.
-आजादी के बाद भी हैदराबाद ने भारत में विलय नहीं किया. निजाम हैदराबाद को स्वतंत्र देश घोषित करना चाहता था. जब रजाकार हिंदुओं पर जुल्म ढा रहे थे, तो उनका प्रतिरोध स्वयंसेवकों ने ही किया. हैदराबाद की एक-एक सूचना दिल्ली पहुंचाने का काम भी इन्हीं चौकीदारों ने किया. आखिरकार आपरेशन पोलो हुआ. 17 सितंबर 1948 को सैन्य अभियान पूरा हुआ. हैदराबाद के पास भारत में शामिल होने के अलावा कोई चारा नहीं था.

- जब 1975 में आपातकाल लगाकर तत्कालीन इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र की हत्या करनी चाही, तो वो स्वयंसेवक चौकीदार ही थे, जो इसके खिलाफ संघर्ष को खड़े हुए. दो साल स्वयंसेवकों ने जुल्म सहे, जेल में रहे. बाद में एकजुट विपक्ष के साथ इंदिरा गांधी को चुनौती देने और हरा देने का करिश्मा भी चौकीदारों का ही कारनामा था. संघ के विशाल संगठन के कारण ही तमाम सख्तियों के बावजूद ये आंदोलन कामयाब हुआ.
-मजदूरों के नाम पर राजनीति सब करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा मजदूर संगठन भारतीय मजदूर संघ है. यह मजदूर हितों की चौकीदारी करता है। विद्या भारती 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाती है. यह शिक्षा के हितों की चौकीदारी है. बनवासी कल्याण आश्रम हमारे वनवासी भाइयों के हितों की रक्षा करता है. 35 हजार एकल विद्यालयों में चौकीदार ही हैं, जो सुदूर इलाकों में दस लाख बच्चों का जीवन संवार रहे हैं.
- भोपाल गैस त्रासदी हो या गुजरात भूकंप. सुनामी हो या उत्तराखंड की बाढ़. केरल की बाढ़ हो या ओडिशा में आया चक्रवात. मदद का जो हाथ सबसे पहले बढ़ता है, वह चौकीदार का ही हाथ होता है। आप-हम सब चौकीदार हैं. जिन्हें राष्ट्रीय गौरव की फिक्र है, जिन्हें सरहदों की सुरक्षा की चिंता है. हर शख्स चौकीदार है. हां, चौकीदार बनना कांग्रेसी,सपाई या बसपाई होने के मुकाबले मुश्किल है. क्योंकि ये सेवा भाव मांगता है, यह बलिदान मांगता है. हम समझ सकते हैं कि कांग्रेस और उस जैसी तमाम पार्टियों को चौकीदार शब्द से इतनी नफरत क्यों है.