क्योंकि मुस्लिम वोट सेक्युलर हैं..
   दिनांक 13-अप्रैल-2019
राहुल गांधी केरल के वायनाड से नामांकन भरते हैं, तो उनके जुलूस में मुस्लिम लीग के इतने झंडे लहराते हैं, कि भ्रम हो जाए कि राहुल गांधी पाकिस्तान से चुनाव लड़ रहे हैं. केरल की मुस्लिम लीग मुहम्मद अली जिन्ना की उसी मुस्लिम लीग से जन्मी है, जिसने पाकिस्तान पैदा किया 
हम सेक्युलर पार्टी हैं. हमें मुस्लिम वोटों को बंटने नहीं देना है. सब मुसलमान हमें वोट करें..” खुद को सेक्युलर कहने वाले नेता और उनकी पार्टियां जब ये कहती हैं तो उनका वास्तविक आशय होता है, कि हिंदू वोट को इकट्ठा नहीं होने देना है, और मुस्लिम वोट को विभाजित नहीं होने देना है. अर्थात, हिंदू जातियों में विभाजित होकर वोट करे, और मुस्लिम इस्लाम के नाम पर वोट करे. तथाकथित सेक्युलरिज्म की ये निर्लज्जता चुनावों के समय अपनी पूरी नग्नता के साथ उभर आती है. बसपा प्रमुख मायावती का इस आशय का बयान फिलहाल चर्चा में है. कुछ ही माह पूर्व मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ का वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वो कह रहे थे कि कांग्रेस पार्टी को 90 प्रतिशत मुस्लिम वोट हासिल करने का लक्ष्य रखकर काम करना है.
मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी इसमें कुछ गलत नहीं देखता. अन्यथा उसने डॉ मनमोहन सिंह से सवाल पूछा होता कि प्रधानमन्त्री रहते हुए उन्होंने ये बयान कैसे दिया था कि “देश के संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है”..? ‘सेक्युलरिज्म’ की इसी नौटंकी के चलते सारी दुनिया में अपनी कट्टरता के लिए मशहूर जमात ए इस्लामी उत्तरप्रदेश के मुसलमानों से ‘सेक्युलर’ पार्टियों को वोट देने की अपील करती है, और कोई सवाल नहीं उठता.
तथाकथित सेक्युलरिज्म के इस चरित्र को गहराई से समझने के लिए जमात ए इस्लामी की विचारधारा और उद्देश्य क्या हैं , ये सभी को जानना चाहिए| जमात ए इस्लामी जीवन के हर पहलू, याने निजी जीवन, शिक्षा, प्रशासन और सरकार में इस्लामी क़ानून लागू करवाने के लिए काम करती है. जमात की विचारधारा के अनुसार कुरआन और सुन्नत हर दुनिया के सवाल का जवाब हैं. संसार के हर मनुष्य को इन्हें अपनाना होगा, तभी दुनिया में ‘वास्तविक शांति’ कायम हो सकती है. जमात के संस्थापक मौलाना मौदूदी ने इसी बात को घुमा-घुमाकर, हजारों पृष्ठों में उतारा है. जमात के मूल सिद्धांतों में से एक ये भी है कि लोकतंत्र गैर इस्लामी व्यवस्था है, और इस्लाम के सिद्धांतों के बिना चलने वाली कोई भी सरकार या व्यवस्था हराम है| पाकिस्तान और बंग्लादेश में भी जमात ए इस्लामी की शाखाएं हैं. पाकिस्तान में अनेक आतंकी संगठनों को खाद पानी देने का काम जमात ए इस्लामी पाकिस्तान करती आ रही है. पाकिस्तान के शियाओं, अहमदियों-हिंदुओं-ईसाईयों के लिए जमात, खौफ का दूसरा नाम है. बंगलादेश में भी जमात ए इस्लामी आतंक का पर्याय है. 1971 के बंग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय जमात ए इस्लामी के हथियारबंद गिरोहों ने पाकिस्तान फौज के साथ मिलकर कत्लेआम मचाया था. विशेष रूप से बंगलादेशी हिंदुओं का. तब जमात द्वारा गठित अलबद्र और रजाकारों ने हत्याओं और बलात्कारों की हैवानियत से दुनिया को थर्रा दिया था. आज बंगलादेश में जमात के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, और 1971 में की गई नृशंसताओं के जुर्म में इसके अनेक नेताओं को फांसी की सज़ा हुई है.
भारत में कश्मीर की जमात इकाई के जिहादी आतंकियों से जुड़े होने के सबूत मिले हैं. भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में जमात पर प्रतिबंध लगाया है| वही जमात चुनाव में ‘सेक्युलर पार्टियों’ को वोट देने की अपील कर रही है, और कट्टरपंथी जमात के इस आशीर्वाद को तथाकथित ‘सेक्युलर’ नेता/दल/गठबंधन चुपचाप सर झुकाकर स्वीकार कर रहे हैं.
एक और दृश्य सारे देश ने देखा कि राहुल गांधी केरल के वायनाड से नामांकन भरते हैं, तो उनके जुलूस में मुस्लिम लीग के इतने झंडे लहराते हैं, कि भ्रम हो जाए कि राहुल गांधी पाकिस्तान से चुनाव लड़ रहे हैं. केरल की मुस्लिम लीग मुहम्मद अली जिन्ना की उसी मुस्लिम लीग से जन्मी है, जिसने पाकिस्तान पैदा किया. मुस्लिम लीग की स्पष्ट घोषणा है कि वो मुस्लिमों के लिए काम करती है| ख़ास बात ये है कि केरल में कांग्रेस का मुस्लिम लीग से पुराना गठबंधन है.

कश्मीरमें चल रही इस्लामी कट्टरपंथ की धारा को पूरी तरह नज़रंदाज़ कर दिया जाता है, जो अलगाववाद की असली वजह है और सेक्युलरिज्म के नाम पर कांग्रेस की कश्मीर इकाई के नेता देश विरोधी बयान देते रहते हैं. याद करें पिछले साल का कांग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज़ का बयान कि “कश्मीरियों की पहली मांग आज़ादी है.” सोज़ मनमोहन सरकार में मंत्री, कश्मीर के कांग्रेस अध्यक्ष और कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सदस्य रह चुके हैं. अक्टूबर 2017 में डॉ मनमोहन सिंह की अगुआई में कांग्रेस का एक दल कश्मीर गया था. वहां जाकर सोनिया गांधी के ख़ास और कांग्रेस की सरकार में केन्द्रीय गृह मंत्री और वित्तमंत्री जैसे पदों पर रह चुके पी. चिदंबरम ने कश्मीर को और अधिक स्वायत्तता देने की बात कही. अलगाववादी हुर्रियत के नेताओं पर खूब प्यार उंडेला. फिर आश्चर्य ही क्या, कि कांग्रेस पार्टी अपने घोषणापत्र में कश्मीर से आफ्सपा हटाने का वादा कर डाला.
सोशल मीडिया में वेब पृष्ठों के लिंक साझा हो रहे हैं जिनमें यह समझाया गया है कि भाजपा को हराने के लिए मुस्लिमों को देश के किस इलाके में किस पार्टी को वोट देना चाहिए. इसी कड़ी में देवबंदी फिरके की जमीयत उलेमा ए हिंद चुनाव में कांग्रेस को अपना समर्थन देती है. ममता बनर्जी इमामों और मुअज्जिनों को जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा बांटती है. अखिलेश-मुलायम खुलेआम ‘माय’गठजोड़ ( मुस्लिम -यादव) की बिसात बिछाते हैं| कांग्रेस सरकार बहुसंख्यक वर्ग को प्रताड़ित करने वाला कम्युनल वायलेंस बिल तैयार करती है. पोटा, टाडा, देशद्रोह और आफ्सपा जैसे कानूनों में भी अल्पसंख्यक –बहुसंख्यक का भेद करती है. दिग्विजय सिंह जाकिर नाइक (अब भगोड़े) के साथ मंच साझा करते हैं. सिमी आतंकियों के एनकाउंटर पर पुलिस पर ही सवाल उठाते हैं. 26/11 के आतंकी हमले में पाकिस्तान को क्लीनचिट देने वाली और भारत की सुरक्षा एजेंसियों तथा आरएसएस पर इस हमले का दोष मढने वाली किताब का विमोचन दिग्विजय सिंह करते हैं, और इस झूठ के पुलिंदे को इखने वाले लेखक अज़ीज़ बर्नी को कांग्रेस के मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल अपने मंत्रालय का ‘अल्पसंख्यक मामलों का सलाहकार’ बना देते हैं. कांग्रेस ‘हिंदुओं को देख लेने’ की धमकी देने वाले अकबरुद्दीन ओवैसी के साथ गलबहियां डाले रहती है.
प्रायः कोई हलचल नहीं होती. ज्यादातर बौद्धिक जगत से भी कोई चूं-चपाट नहीं होती, क्योंकि ये सब ‘सेक्युलर’ लोग हैं. संविधान की मूल भावना से खिलवाड़ करती ये सारी हरकतें ‘सेक्युलरिज्म’ हैं. इन नेताओं ने स्थापित किया है कि मुस्लिम वोट सेक्युलर होता है, और गट्ठा मुस्लिम वोट उससे भी ज्यादा सेक्युलर होता है. ये लोग खुलेआम बयान देते हैं, इशारे करते हैं कि मुसलमान, मुसलमान के नाते वोट करे, क्योंकि ये ‘धर्मनिरपेक्षता’ है और हिंदू, हिंदू के नाते वोट न करे, क्योंकि ऐसा करना सांप्रदायिकता है.