जलियांवाला नरसंहार पर ब्रिटिश पीएम ने दुःख तो जताया पर नहीं मांगी माफी
   दिनांक 13-अप्रैल-2019
“इस नरसंहार के बाद रवींद्रनाथ टैगोर ने लौटा दी थी अंग्रेजों की दी नाइटहुड उपाधि”
 
 - रवि कुमार     
ब्रिटिश प्रधानमंत्री टेरीजा ने गत 10 अप्रैल को अब से 100 साल पहले 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार को भारतीय इतिहास के ब्रिटिश काल का ‘शर्मनाक दाग’ बताया है लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर संसद में पहले हुई बहसों में सांसदों के एक वर्ग की मांग के अनुरूप औपचारिक रूप से माफी नहीं मांगी। महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने भी 1997 में जलियांवाला बाग जाने से पहले दिए बयान में कहा था कि यह भारत के साथ हमारे इतिहास का दुःखद उदाहरण है। इस बयान के उत्तर में विपक्षी लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन ने मांग की है कि जो कुछ भी हुआ उसके लिए इस नरसंहार में जान गंवाने वालों से ‘पूरी, साफ-साफ और स्पष्ट शब्दों में माफी’ मांगी जानी चाहिए। भारतीय मूल के लेबर सांसदों प्रीत कौर गिल और वीरेंद्र शर्मा चाहते थे कि यूनाइटेड किंगडम की प्रधानमंत्री इस बारे में सार्वजनिक रूप से क्षमायाचना करें।
13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग नरसंहार में लगभग 1600 शांत और निहत्थे पंजाबियों की उस समय सामूहिक हत्या कर दी गई थी जब अमृतसर के इस बाग में बैसाखी मनाने एकत्रित हुए नागरिकों पर कर्नल रेजिनाल्ड डायर के नेतृतव में अंग्रेजी सेना ने राइफलों से गोलियां चला दी थीं। बैसाखी सिखों का नववर्ष होने के साथ खालसा पंथ का स्थापना दिवस भी है। गुरु गोविंद सिंह ने 1699 में इसी दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी। इस त्योहार का संबंध खरीफ की फसल की कटाई के उत्सव से भी है। बताया जाता है कि इन सारी बातों के अलावा 1919 में जलियांवाला बाग में एकत्रित हुए लोगों का उद्देश्य राष्ट्रीय नेता सत्यपाल की गिरफ्तारी और उन्हें कालापानी भेजे जाने के विरुद्ध शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना भी था।
जलियांवाला बाग छह-सात एकड़ (2.8 हे.) का सार्वजनिक बाग है जिसके चारों ओर दीवारें थीं और पांच द्वार थे। डायर ने वहां पहुंच कर भीड़ को हटने की चेतावनी दिए बिना इसके मुख्यद्वारों को बंद करा दिया। इसके बाद उसने सिपाहियों को भीड़ पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। गोलीबारी बंद करने का आदेश उसने गोलियां लगभग खत्म हो जाने पर दिया। इस दौरान 1650 चक्र गोलियां चलीं। इस नरसंहार के बाद कर्फ्यू लगा दिए जाने के कारण इस घटना के घायल जहां भी गिरे उन्हें वहां से उठाया भी नहीं जा सका और रात भर वहीं पड़े रहने से बहुत से घायलों की भी मौत हो गई थी।
“इस घटना से कवि रवींद्रनाथ टैगोर इतने आहत थे कि अपनी उपाधि वापस करते हुए उन्होंने कहा कि “ऐसी सामूहिक हत्या करने वाले इस लायक नहीं हैं कि वे किसी को कोई पदवी दें।””
 
उल्लेखनीय है कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले एशियाई थे। उन्हें यह पुरस्कार 1913 में काव्य कृति ‘गीतांजलि’ के लिए मिला था। इसके बाद 1915 में सम्राट जॉर्ज पंचम ने उन्हें नाइटहुड प्रदान करते हुए सर की उपाधि प्रदान की थी, लेकिन 1919 में जलियावालां बाग नरसंहार के बाद उन्होंने यह उपाधि वापस कर दी थी।
उपाधि वापस करते हुए उन्होंने भारत के तत्कालीन ब्रिटिश वाइसरॉय लॉर्ड चेम्सफोर्ड को लिखे पत्र में कहा, “इस बात के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त हुआ जा सकता है कि दुर्भाग्यशाली लोगों को दिए गए दंड और उसे लागू करने में दिखाई गई असामान्य क्रूरता का सभ्य समाजों के शासकीय इतिहास में कोई दूसरा उदाहरण नहीं है.... और अपनी ओर से मैं सभी तरह के विशेष अलंकरणों से मुक्त होकर अपने देशवासियों के साथ साथ खड़ा होना चाहता हूं”
अमृतसर की घटना में खुद घायल होकर पूरी घटनाक्रम के प्रत्यक्षदर्शी रहे स्वतंत्रता सेनानी उधम सिंह ने घटना के समय पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर रहे माइकल ओ’डायर की 13 मार्च, 1940 को लंदन के कैक्स
माइकल
टन हॉल में गोली मारकर हत्या कर दी थी। ओ’डायर ने कर्नल डायर की कार्रवाई को मंजूरी दी थी और माना जाता था कि वह ही इस कांड का मुख्य योजनाकार था। ओ’डायर की हत्या के मामले में अदालती जिरह में उधम सिंह ने कहा था: वही असली अपराधी था। वह हमारे देश के लोगों की भावनाओं को कुचलना चाहता था, इसलिए मैंने उसे कुचल दिया। पूरे 21 वर्षों से मैं प्रतिशोध लेने की कोशिश कर रहा था। मुझे खुशी है कि मैंने अपना काम कर दिया। मैं मौत से नहीं डरता। मैं अपने देश के लिए मर रहा हूं। मैंने अपने देशवासियों को ब्रिटिश शासन के अधीन भारत में भूख से मरते देखा है। मैंने इसका विरोध किया है और यह मेरा कर्तव्य था। अपनी मातृभूमि की खातिर मृत्यु से बड़ा सम्मान क्या हो सकता है? 1952 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा, "मैं शहीद-ए-आजम उधम सिंह को सलाम करता हूं, जिन्होंने फांसी के फंदों को इसलिए चूमा था कि हम आजाद हो सकें।"
महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने 13 अक्टूबर 1997 को भारत में एक राजकीय भोज के दौरान जलियांवाला नरसंहार के बारे में कहा कि, “यह कोई रहस्य नहीं है कि हमारे अतीत में कुछ अप्रिय घटनाएं रही हैं – जलियांवाला बाग, जहां मैं कल जाऊंगी, एक दुखद उदाहरण है। लेकिन, हम कितना ही चाहें फिर भी इतिहास को नए सिरे से नहीं लिखा जा सकता। इसमें दुख के क्षणों के साथ ही प्रसन्नता के क्षण भी होते हैं। हमें दुःख से सीखना चाहिए और खुशी के क्षणों का सृजन करना चाहिए”। 14 अक्टूबर 1997 को, महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने जलियांवालाबाग का दौरा किया और 30 सेकेंड का मौन रख कर मृतात्माओं के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त की थी। यात्रा के दौरान उन्होंने केसरिया पोशाक पहनी थी, जो सिखों के लिए धार्मिक महत्व की थी। स्मारक पर जाते समय उन्होंने अपने जूते निकाले और स्मारक पर माल्यार्पण किया।
उल्लेखनीय है कि राजस्थान और गुजरात में भी जलियांवाला बाग हैं। जलियांवाला बाग नरसंहार से कोई छह साल पहले 17 नवंबर, 1913 को अंग्रेजों ने राजस्थान और गुजरात की सीमा पर स्थित मानगढ़ पहाड़ी पर 1,500 से अधिक भीलों (कुछ स्रोतों के अनुसार लगभग 4,000) को भून डाला था।
गोविंद गिरि, जिन्हें अब गोविंद गुरु के रूप में श्रद्धापूर्वक संबोधित किया जाता है, राजस्थान के डूंगरपुर में एक बंजारा परिवार में पैदा हुए थे। गोविंद गुरु ने 1908 में भगत आंदोलन की शुरुआत की। उन्होंने भीलों के बीच शराब और जुए से दूर होकर शाकाहारी बनने का प्रचार किया। उन्होंने भीलों को बंधुआ मजदूरी को अस्वीकार करने, श्रम का उचित मूल्य मांगने तथा अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया। गोविंदगिरि और उनके अनुयायियों ने अक्टूबर, 1913 में मानगढ़ में इकट्ठा होना शुरू कर दिया। कार्तिक महीने में एक धार्मिक मेले में एक 'हवन' का आयोजन करके इस बारे में शपथ ली जानी थी। इस समारोह में भाग लेने के लिए डेढ़ लाख से अधिक भील मानगढ़ में इकट्ठे हुए थे।
 
कर्नल शेरटन ने इस आयोजन को रोकने के लिए मेजर बेली और कैप्टन स्टेली की मदद से मानगढ़ को चारों ओर से घेर लिया और भीलों को वहां से निकल जाने को कहा। जब 'हवन ’करने वाले भीलों ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, तो उन पर मशीनगन और तोपखाने से हमला किया गया। हमले में खच्चरों की पीठ पर लदी स्वचालित मशीन गनों का भी इस्तेमाल किया गया था। 17 नवंबर, 1913 को इस बर्बर हमले में डेढ़ हजार से अधिक शांतिपूर्ण प्रतिरोध कर रहे लोग मारे गए। गुजरात और राजस्थान सरकारों ने गुरु गोविंद गिरि के योगदान को स्वीकार किया है। राजस्थान ने 2012 में बांसवाड़ा में गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना की और गुजरात ने 2015 में श्री गोविंद गुरु विश्वविद्यालय, गोधरा की स्थापना की।
विदुर-अश्वथ को "दक्षिण के जलियांवालाबाग" के रूप में जाना जाता है। यह भारत के कर्नाटक राज्य में चिक्काबल्लापुर जिले के गौरीबिदनूर तालुक में स्थित एक छोटा सा गाँव है। कर्नाटक-आंध्र प्रदेश सीमा के पास स्थित, इसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक प्रमुख भूमिका निभाई। 25 अप्रैल 1938 को यहां ग्रामीणों का एक समूह सत्याग्रह आयोजित करने के लिए एकत्रित हुआ था। जलियांवालाबाग में जो हुआ, उसी के समान पुलिस ने यहां भी समूह पर अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 35 लोग मारे गए। इस स्थान पर एक स्मारक बनाया गया है, जिसमें इस घटना में जान गंवाने वालों के नाम हैं।
सर सुब्रमण्या अय्यर ने भी नाइटहुड लौटाया था
सर सुब्रमण्या अय्यर केसीआईई (1842-1924) एक भारतीय वकील, न्यायविद और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने एनी बेसेंट के साथ मिलकर होम रूल मूवमेंट की स्थापना की। उन्हें लोकप्रिय रूप से "दक्षिण भारत के ग्रैंड ओल्ड मैन" के रूप में जाना जाता था। उन्होंने 1907 में सेवानिवृत्त होने से पहले मद्रास उच्च न्यायालय के पहले भारतीय मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य किया। हाउस ऑफ कॉमन्स और हाउस ऑफ लॉर्ड्स में गृह मंत्री एडविन मोंटेग्यू और वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड की तीखी आलोचना हुई थी। इसके बाद 1918 में जब अय्यर मद्रास में उनसे मिले तो प्रस्तावित राजनीतिक सुधारों पर उनके विरोध के कारण दोनों ने अय्यर से दुर्व्यवहार किया था। इसके कुछ दिनों बाद सर सुब्रमण्या अय्यर ने नाइटहुड को त्याग दिया था।