कांग्रेस ने हमेशा वोट बटोरने के लिए बाबासाहेब के नाम का प्रयोग किया है
   दिनांक 14-अप्रैल-2019
“हृदय से घृणा का भाव निकल जाना चाहिए। सब भगवत्स्वरूप हैं ऐसा अगर साक्षात्कार हुआ, तो हृदय में घृणा का भाव नहीं रहता। —माधव स. गोलवलकर (श्रीगुरुजी समग्र दर्शन,खण्ड 6, पृ. 23)”

 
आज बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती है। देश में चुनाव का माहौल है। एक दूसरे पर आरोपों और प्रत्यारोपों दौर जारी है। किन्तु खतरे की बात यह है कि आज बाबासाहेब के नाम को आगे रखकर कुछ स्वार्थी राजनैतिक गुट और उनके गुर्गे नफरत के अलाव सुलगाए बैठे हैं। आज देश में जिस तरह की परिस्थितियां हैं उस लिहाज से आज बाबासाहेब को जानना और उनके दृष्टिकोण से परिस्थितियों को समझना ज्यादा जरूरी हो जाता है। आपको याद होगा पिछले साल अप्रैल में राहुल गांधी भाजपा की नीतियों को अनुसूचित जाति—जनजाति विरोधी होने का आरोप लगाकर राजघाट पर अनशन पर बैठे थे। ये अलग बात है कि वह दोपहर एक बजे उपवास पर पहुंचे थे। उपवास पर उनके साथ बैठने वाले कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उपवास पर बैठने के लिए राजघाट पर पहुंचने से कुछ देर पहले की एक फोटो वायरल हुई। इस फोटो में राजघाट पहुंचने से पहले कांग्रेसी नेता चटकारे लेकर छोले— भठूरे खा रहे थे। तब कांग्रेसी नेताओं की तरफ से सफाई दी गई थी कि यह कोई अनिश्चित भूख हड़ताल नहीं थी बल्कि 10:30 से 4:30 बजे तक रखे जाने वाला सांकेतिक उपवास था।
दरसअल अनुसूचित जाति-जनजाति लोगों के बीच अफवाहें फैलाकर उनके वोट लेने के लिए बैचेन राहुल और कांग्रेस हमेशा ऐसा करती आई है।
मुस्लिम तुष्टीकरण में डूबने के बाद उन्माद को पोसने की हद तक बढ़ी सेकुलर राजनीति 'सबका साथ, सबका विकास' के सामने हलकान है।
अनुसूचित जातियों का नाम लेकर अपना घर भरने वाले नेता-नेत्रियों का तेज 'अंत्योदय और उज्ज्वला' के सूर्य के सामने जुगनू साबित हो रहा है।
हर तरकीब आजमाकर भी बुजुर्ग पार्टी के अधेड़ युवराज राजनीति के हाशिए पर ही पड़े हैं क्योंकि कुनबा राजनीति की विफलता और अकथ घोटालों की लंबी फेहरिस्त पहले से उनके नाम लोकतंत्र की बही में दर्ज है।
ऐसे में सामाजिक सौहार्द के शिकारियों ने'बाबासाहेब' के नाम को औजार बनाने की ठानी है। समाज हित में इस चाल को समझना जरूरी है। यह समझ बाबासाहेब की कसौटियों पर,उनके नजरिए से परिस्थितियों की परख करते हुए ही हो सकती है। सो, कुछ सवाल बनते हैं :
— देश को पीछे रखने और अपने हित की बात पहले सोचने वाली राजनीति के बारे में बाबासाहेब क्या सोचते थे?
— आज 'भीम' की डफली बजाते कॉमरेडों का छल तब बाबासाहेब ने किस तरह पकड़ा था!
— आज बाबासाहेब का नाम भुनाने को बेचैन कांग्रेस का तब कांग्रेसी होने के बावजूद बाबासाहेब के साथ व्यवहार कैसा था? इन सब सवालों के जवाब उस विराट जीवन में बिना झांके, उनके वैचारिक आधार को बिना समझे तलाशना असंभव है।