चौकीदार के लिए चोर जैसे शब्दों का इस्तेमाल ठीक और सजायाफ्ता लालू प्रसाद को 'ललुआ' बोल दिया तो पत्रकार को धमकाया
   दिनांक 15-अप्रैल-2019
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद फ्रॉड करके जेल में हैं। करोड़ों रूपए उन्होंने खा लिए जिससे देश के गरीब, दलित, वंचित समाज का भला हो सकता था। टीवी एंकर अनुराग मुस्कान पिछले कुछ दिनों से बिहार में रिपोर्टिंग कर रहे हैं। अपने एक लाइव डिबेट के दौरान उन्होंने लालू प्रसाद के लिए 'ललुआ' संबोधन का प्रयोग किया। इस पर राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकर्ता और राजद समर्थक पत्रकारों ने आपत्ति जताई। अनुराग ने आपत्ति की गम्भीरता को समझते हुए, लिखा— '' कई दिनों से बिहार में हूं और यहां लोगों के मुंह से लालू जी के लिए लाड़ और प्यार से अक्सर ये संबोधन सुना। मैंने लाइव डिबेट में इस संबोधन पर आपत्ति जताए जाने के बाद अपने स्पष्टीकरण में भी यही कहा लेकिन फिर भी अगर इस शब्द से किसी की भावनाओं को ठेस पंहुची हो तो मुझे बेहद खेद है।''
अनुराग के खेद प्रकट करने के बाद राष्ट्रीय जनता दल का पक्ष भी सामने आया— ''अनुराग मुस्कान जी, ये लाड़-प्यार उच्च वर्गों का कटाक्ष है। दलितों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों, अल्पसंख्यकों और अगड़ों में जो ग़रीब है, उनके लिए लालू जी मसीहा की तरह हैं जो आप नहीं समझ सकते। क्या आपने लालू जी को अपनी गोद में खिलाया है जो ऐसी बेशर्मी से उन्हें संबोधित कर रहे थे?''
राजद ने प्रतिक्रिया देते हुए अतिश्योक्ति में यह जरूर लिखा कि लालूजी मसीहा की तरह हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि जबसे गरीबों का पैसा उन्होंने फ्रॉड करके डकार लिया है जनता का लालू प्रसाद को देखने का नजरिया बदला गया है। ऐसा नहीं होता तो राष्ट्रीय जनता दल आज बिहार के अंदर सरकार में होती। वास्तव में लालू प्रसाद के साथ कमजोर नहीं बिहार के ताकतवर लोग खड़े हैं। लेकिन जिन लोगों के विकास का पैसा लालू प्रसाद ने खाया और बिहार को नर्क की आग में पन्द्रह साल तक जलाया, उनकी बददुआ कहिए या आह, लालू प्रसाद का कभी पीछा नहीं छोड़ेंगी।
राजद के समर्थक पत्रकार और राजद की तरफ से आई प्रतिक्रिया में लालू प्रसाद की जाति को लेकर विक्टिकार्ड खेलने की कोशिश की गई है। वास्तव में राजद के पत्रकारों का जाति वाला आरोप टिकेगा नहीं क्योंकि सब जानते हैं, लालू ने जिस गढ्ढे में बिहार को डाला था, उससे बाहर निकाल कर लाने का जो प्रयास नीतीश कुमार लगातार कर रहे हैं, वह किसी से छिपा नहीं है। नीतीश भी ओबीसी समाज से आते हैं, क्या किसी को आज तक नीतीश को नीतीशवा कहते सुना है? नहीं सुना होगा।
10 मार्च 1990 को बिहार की गद्दी पर लालू प्रसाद यादव का शपथ ग्रहण हुआ। वे बिहार के मुख्यमंत्री नियुक्त हुए। उनका यह टर्म 28 मार्च 1995 तक चला। आज देश में विकास की बहुत बात हो रही है, लालू प्रसाद के काल मेें सिर्फ 'माई' समीकरण की बात होती थी। माई का मतलब था, मुसलमान और यादव। इस जोड़ी के दम पर कथित तौर पर बिहार में लालू और राबड़ी देवी की जोड़ी ने पन्द्रह साल राज किया। इस राज को उस जमाने में 'जंगलराज' की संज्ञा मिली थी। जिसमें अपहरण को बिहार सरकार में अनाधिकारिक तौर पर उद्योग का दर्जा मिला हुआ था।
लालू प्रसाद के 1990—95 वाले शासन काल में बिहार का विकास दर शून्य था। बिहार में 80 फीसदी लोग उस दौरान खेती पर निर्भर थे। खेती का बिहार की जीडीपी में 40 फीसदी का योगदान था। खेती में विकास उस दौरान एक फीसदी से भी कम रहा। बिहारियों के पलायन को लेकर कई राज्यों में समय—समय पर चिन्ता प्रकट की जाती रही है। यह पलायन लालू प्रसाद की देन है। बिहार में लालू राज के अंदर न रोजगार बचा, न बची शिक्षा। यही था, बिहार के सत्यानाश का लालू मॉडल।
वर्ष 2000—2005 के बीच बिहार की मुख्यमंत्री राबड़ी देवी थीं। इस दौर में बिहार ने अपना सबसे खराब समय देखा। उस समय सबसे अधिक कर्ज बिहार के ऊपर था। राजकोषिय घाटा और व्यय के असंतुलन ने बिहार को कहीं का नहीं छोड़ा था। लालू और राबड़ी के शासन में गुंडागर्दी चरम पर थी और कारोबार चौपट होता गया।
आज ईवीएम पर सवाल उठाए जा रहे हैं लेकिन लालू प्रसाद के राज में जब सारे सर्वेक्षण उनकी हार की घोषणा कर रहे होते। उस समय टेलीविजन पर आकर लालू प्रसाद पूरे दावे से बताते थे कि बैलेट बॉक्स से जिन्न निकलेगा और राजद के लुटेरे बूथ लूटकर लालू प्रसाद की जुबान रख लेते थे। इसीलिए आज फिर लालू के गुट में शामिल नेता ईवीएम पर विश्वास नहीं करते और बैलेट वापसी की मांग करते नहीं थकते। लालू प्रसाद के उन्हीं समर्थकों की ताकत है कि टेलीविजन का एक एंकर अनुराग मुस्कान बिना देर किए माफी मांग लेने में अपनी भलाई समझता है। वर्ना खबरिया चैनलों पर माफी मांगने का रिवाज अब कहां बचा है?
इस पूरे आलेख का आशय सिर्फ इतना है कि देश में एक तरफ विकास के लिए जहां गुजरात मॉडल प्रसिद्ध था, वहीं दूसरी तरफ बर्बादी का लालू मॉडल था। बिहार की तरक्की न हो फिर यह कैसे संभव था कि राज्य में यादव, कुर्मी, पासी, माझी या अन्य पिछड़ी जाति का समाज तरक्की कर जाता? इसी का परिणाम था कि 1990 से 2005 के कालखंड में बिहारी होना पूरे देश में गाली बन गई। बिहारी होने को गाली बनाने में राबड़ी और लालू का अमूल्य योगदान है। जिसे बिहारीजन नहीं भूला सकते।
उसके बाद भी राजद के जो पत्रकार और कार्यकर्ता लालू प्रसाद को ललूआ कहने पर उत्तेजित हो रहे हैं, उन्हें एक बार अपनी उत्तेजना पर पुनर्विचार करना चाहिए। बतौर राजद के पत्रकार या कार्यकर्ता के नाते नहीं बल्कि एक आम बिहारीजन के नाते। एक बार जरूर विचार कीजिएगा।