बलूचिस्तान ऐसी जगह जहां कहां कितने लोग दफन हैं कोई नहीं जानता
   दिनांक 16-अप्रैल-2019
- तुरबत से अकबर बलोच                 
बलूचिस्तान में मानवाधिकारों का जितना उल्लंघन होता है, उतना शायद कहीं नहीं होता। आधी सदी से भी अधिक समय से दुनिया का कोई कोना अगर लापता होते लोगों, सड़क किनारे मिलती लाशों और ऐसी कब्रों से जाना जाए जिसमें ढेर बनाकर लोग दफनाए गए हों, तो मानवाधिकार के हिमायती लोगों, संगठनों और देशों को अपने गिरेबान में झांकना तो पड़ेगा।
दक्षिण बलूचिस्तान का एक बड़ा शहर है तुरबत। पोर्ट सिटी ग्वादर से करीब 80 मील दूर। कभी यह मकरान सूबे की राजधानी और व्यापार का बड़ा केंद्र था। आज भी यह दक्षिण बलूचिस्तान का सबसे बड़ा शहर है। व्यापारिक गतिविधियां आज भी खूब होती हैं। यहां अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा भी है। लेकिन शहर से निकलते ही एक तस्वीर साफ-साफ दिखने लगती है जो बलूचिस्तान की असली कहानी बयां करती है। पाकिस्तानी सेना और उसकी बदनाम एजेंसी फ्रंटियर कॉर्प्स द्वारा लोगों को उठा लेना, ज्यादातर का कोई पता नहीं चलना, आए दिन सड़ी-गली लाशें मिलना जिनकी शिनाख्त भी मुश्किल हो। ऐसे वाकये यहां अक्सर देखने को मिलते हैं। ताजा मामला है तेजाबान से एक दर्जन से ज्यादा लोगों को उठाने का।
गुलाब रफीक और बहोत जैसे अनगिनत लोग सालों से गायब हैं 
वैसे तो लापता होते लोग पूरे बलूचिस्तान का मसला है, पर ऐसे वाकयों से तुरबत का तारीखी रिश्ता रहा है। 3 अप्रैल, 2009 को बलूचिस्तान नेशनल मूवमेंट (बीएनएम) के अध्यक्ष गुलाम मोहम्मद बलोच, इसी पार्टी के लाला मुनीर व अन्य सियासी पार्टी बलोच रिपब्लिकन पार्टी के शेर मोहम्मद बलोच को तुरबत में एडवोकेट काचकोल अली के चैंबर से जबरदस्ती उठा लिया गया था। बाद में उनकी लाशें तुरबत से करीब 40 किमी दूर पड़ाड़ियों में मिली थीं। तीनों के सिर में गोली मारी गई थी। गुलाम मोहम्मद बलोच सियासी तरीके से बलूचिस्तान को आजाद कराना चाहते थे। पाकिस्तान के दूसरे इलाकों की तरह सड़क के किनारे सड़ी-गली लाशों का मिलना तो जैसे यहां के लिए रोजमर्रा की बात है। ज्यादातर लाशें इतनी बुरी हालत में होती हैं जिनकी शिनाख्त भी नहीं होती। इस इलाके में बड़ी संख्या में ऐसी लाशें भी मिलीं, जिन्हें एक के ऊपर एक रखकर दफनाया गया था। एक बदनाम व अफसोसजनक तारीख के हवाले से इस खबरनवीस ने मौके पर जाकर ब्योरा जुटाने का फैसला किया।
ग्वादर को चीन के काशगर इलाके से जोड़ने वाली सीपीईसी (चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) पर तुरबत से आधे घंटे का सफर कर हम तेजाबान पहुंचे। जहां से लोग उठाए गए थे, वहां तक जाने के लिए सड़क छोड़कर कुछ दूर का फासला तय करना पड़ता है। रास्ते में मेरी मुलाकात एक सियासी पार्टी के कार्यकर्ता अजमल से हो गई। वे इस इलाके के कुछ लोगों को जानते थे। इसलिए साथ चलने को तैयार हो गए। पथरीली जमीन बता रही थी कि यहां के लोगों की जिंदगी मुश्किल है। दूर से ही बेतरतीब बनी छोटी-छोटी झोपड़ियां दिख रही थीं। हम लोगों से मिले। उनसे बातचीत की और जानने की कोशिश की कि कब, क्या हुआ। अजमल की सलाह थी कि मैं अपनी रिपोर्ट में इन लोगों के नाम न डालूं, क्योंकि एक तो वैसे ही लापता लोगों के लौट आने की तादाद न के बराबर होती है। दूसरे, किसी ने मीडिया से बात की, यह पता चलते ही फ्रंटियर कॉर्प्स वाले उन्हें उठा लेंगे और अगर उन्हें इसका अंदाजा हो गया कि इन लोगों के हवाले से भारत की पत्रिका में खबर आई है, तो उनका बचना नामुमकिन होगा। खैर, मैं तो वैसे भी उनके नाम का खुलासा रिपोर्ट में नहीं करता। आम लोगों की क्या कहें, मैंने अपने कितने हमपेशा साथियों को कत्ल होते देखा है।
बहरहाल, तेजाबान की घटना 31 मार्च और 1 अप्रैल के बीच की है। कई गाड़ियों में लोग आए थे। कुछ फौजी थे और कुछ साधारण लिबास में। इन्होंने अलग-अलग समय पर अलग-अलग शख्स को उठाया। तेजाबान के संगाबाद इलाके से फौजियों ने दस लोगों को उठाया। वे थे- रफीक पुत्र अहमद, तवल पुत्र जबाद, अमीर बख्श पुत्र जबाद), मूसा पुत्र बुजैर, वहाग पुत्र मूसा, बहोत पुत्र मेया इत्यादि। काबिलेगौर है कि फौज ने 24 घंटे के भीतर केज और पंजगुर के इलाकों से कुल 14 लोगों को उठाया। यह जानना जरूरी है कि ये लोग कौन थे। बहोत के बारे में एक शख्स ने कहा, ‘‘वह पढ़ना चाहता था। कुछ बड़ा करने का सपना देखता था। जीवन में कुछ हासिल करने के बाद वह अपने परिजनों को तुरबत ले जाकर बेहत जिंदगी जीना चाहता था।’’ रफीक के बारे में पता चला कि वह भेड़ पाल कर रोटी कमाता था। जिंदगी मुश्किल तो थी, लेकिन उसे कुछ ज्यादा शिकायत नहीं थी। वह चाहता था कि जो तकलीफें उसने उठाईं, उसकी औलाद को न उठानी पड़े। हमेशा बेटे को तालीम दिलाने के लिए फिक्रमंद रहता। ऐसी ही कहानी अमूमन सब की थी। मूसा भी बेहतर जिंदगी के लिए तुरबत जाने की सोच रहा था। वहां उसकी किसी से बात भी हुई थी, लेकिन इससे पहले कि कोई फैसला ले पाता, वे लोग उसे उठा ले गए। इन लोगों से जो जानकारी मिली, उसका काफी-कुछ अंदाजा मुझे पहले से था। तुरबत के इलाकों में फौज ने कई बार जमीनी और आसमानी, दोनों तरफ से आॅपरेशन किए। अब तक कई बार बड़ी तादाद में दफनाई गई लाशें मिल चुकी हैं। सीपीईसी से लगते इस इलाके में ज्यादातर बलूचों की रिहाइश है। यहां के लोगों ने फौजी दहशतगर्दी को करीब से देखा है। लौटते वक्त मैंने अजमल से पूछा कि उन्हें क्या महसूस होता है, जुल्म का ये दौर कभी खत्म होगा या नहीं। अजमल ने कहा, ‘‘इसमें शक नहीं कि सीपीईसी की वजह से हमें दो-दो जालिम मुल्कों से मुकाबला करना पड़ रहा है। चीन को पाकिस्तान से नहीं, यहां के संसाधनों से मतलब है। हमारे लिए मुसीबत बढ़ गई है। पहले हम पर एक काबिज था, अब दो हैं। एक आजाद मुल्क का नाम-ओ-निशान मिटते कैसे देख सकते हैं? आपको भी बखूबी पता है कि बलूचिस्तान का बच्चा-बच्चा पाकिस्तानी फौज के मंसूबों से वाकिफ है। वह सब देख और महसूस कर रहा है। कौम जानती है कि पाकिस्तान और बलूचों में मालिक प गुलाम का रिश्ता है। दहशतगर्दी को हर मर्ज की दवा मानने वाले पाकिस्तान को लगता है कि वह बलूचों का नरसंहार आजाद बलूचिस्तान की आवाज को दबा सकता है तो वह जाहिल है। बलूच बेशक अमनपसंद हैं, लेकिन इरादे के पक्के हैं। मुझे नहीं लगता कि इस तरह लोगों को शहीद कर देने से उनके हौसले में कमी आएगी।’’
मैंने सवाल किया- ‘‘क्या आपको नहीं लगता कि बलूच बेसब्र हो रहे हैं। डेढ़ माह पहले ही पंजगुर और तुरबत के बीच पाकिस्तानी फौज पर तंजीम ब्रास ने फिदायीन हमला किया था जिसमें नौ फौजी मारे गए थे।’’ अजमल ने कहा, ‘‘एक मंजिल पर पहुंचने के तमाम रास्ते होते हैं। कौन, किसे पसंद करता है, उसका फैसला है। इसमें कोई शक नहीं कि हम आजाद मुल्क थे। कौमी आजादी हमारा हक है, हमारी मंजिल है। लेकिन यह काबिलेगौर है कि ज्यादातर लोग अब भी हथियार उठाना नहीं चाहते। वे सियासी तरीके से मामले का निपटारा चाहते हैं।’’ दुनिया में मानवाधिकार की जो भी बातें होती हों, बलूचों के साथ जैसा व्यवहार होता है, उसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है, क्योंकि 90 प्रतिशत खबरें दबा दी जाती हैं। दुनिया यहां के हालात को कुछ-कुछ समझने लगी है, तो वह केवल उन दस प्रतिशत खबरों की वजह से, जो बीच-बीच में सामने आ जाती हैं। यहां का हर शख्स रोज किसी न किसी को लापता होते देख रहा है। वह इतना कह सकता है कि ऐसे वाकये अक्सर होते हैं, लेकिन तादाद बताना उनके लिए मुमकिन नहीं। यहां की जमीन में कौन, कहां दबा है, कोई नहीं जानता।