''दुनिया में बढ़ रहा भारत का कद''
   दिनांक 16-अप्रैल-2019
विदेशों में भारत का प्रभाव बढ़ रहा है। आने वाली शताब्दी या सहस्राब्दी भारत की होगी। दुर्भाग्य से, भारतीय लोग ही भारत की संस्कृति को विस्मृत किए हुए हैं।' यह कहना है अमेरिका के ओकलाहोमा विश्वविद्यालय में रीजेन्ट प्रोफेसर भारतविद् पद्मश्री सुभाष काक का। आईआईटी दिल्ली से कम्प्यूटर इंजीनिरिंग में स्नातक प्रो. काक ने दुनिया के प्रमुख विश्वविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया है। उन्होंने करीब 20 पुस्तकें लिखी हैं और 'विज्ञान का इतिहास' विषय के अग्रणी विशेषज्ञों में से एक हैं। भारतीय ज्ञान और दुनिया में भारत के बढ़ते कदमों पर पाञ्चजन्य के सहयोगी सम्पादक आलोक गोस्वामी ने उनसे विस्तार से बातचीत की, जिसके प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं:-
हमारे ज्ञान के भंडार, प्राचीन ज्ञान अधिकांशत: देववाणी संस्कृत में हैं। चाहे हम साहित्य की, विज्ञान की, गणित या कला क्षेत्र की बात करें, ये सब मूलत: संस्कृत के ग्रंथों में समाहित है। लेकिन आज भी कुछ लोग कहते हैं कि भारत के पास अपना कुछ नहीं है, हमने सारा कुछ विदेशों से लिया है। पश्चिम की तुलना में हमारे यहां इतने विद्वान नहीं हुए हैं। इस तरह विडंबनापूर्ण स्थिति क्यों है?
इसके पीछे मूल समस्या यह है कि जब पश्चिम वालों ने, अंग्रेजों ने यहां आकर राज करना शुरू किया तो पहले तो उनका विचार यह था कि भारत बहुत पिछड़ा हुआ है, जैसे मैकॉले के बारे में आपने पढ़ा ही होगा। लेकिन धीरे-धीरे जब यहां पर और विद्वानों ने काम करना शुरू किया तो उन्हें मालूम हुआ कि भारत में इतना शानदार साहित्य है, दर्शन है, ज्योतिष है, विज्ञान है। यूरोप के अभिजात्यों ने इसे माना और वे आपस में सलाह करके यह तय करते हुए आगे बढ़े कि ठीक है, भारत में धर्म था, संगीत था, पर वह यूरोप के संगीत की तरह समृद्ध नहीं था। लेकिन भारत में उनके हिसाब से दो चीजें नहीं थीं, एक तो गणतंत्र और दूसरा विज्ञान। वे भारत को विज्ञान का ज्ञान नहीं देना चाहते थे, क्योंकि यूरोप की यह धारणा है कि लोकतंत्र और विज्ञान, एक यूरोपीय चमत्कार है। इसलिए जब यूरोप वाले यहां से गए तब यहां पर जो यूरोपीय विचारधारा से जुड़े लोग बचे वे यही मानकर खुश हैं कि लिए उनके यहां होने से कोई तो है जो यह कहने की हिम्मत कर सकता है कि भारत में भी विज्ञान के क्षेत्र में काम होता है। प्राचीन काल से ही भारत में विज्ञान पर आधारित शास्त्र थे, जैसे, वैशेषिक भौतिकीशास्त्र हुआ, न्याय तर्कशास्त्र हुआ, सांख्य खगोलशास्त्र हुआ, वेदांत में ये सब चीजें जुड़ीं और उनका समुच्चय सामने आया। आज धीरे-धीरे ये बातें सामने आती जा रही हैं और लोग मानने लगे हैं कि उस काल में भारत ज्ञान का भंडार था और यह 200-300 साल पहले तक अन्य देशों से बहुत आगे था। लेकिन जो सामान्य चेतना है, पश्चिम की और उससे ज्यादा भारत की, उसमें सोच यहां तक नहीं पहंुची है। इसलिए वे यह मानने में अपमानित महसूस करते हैं कि भारत प्राचीन काल से ज्ञान का भंडार रहा है। भारत में कुछ लोग हैं जो अपने देश की उपलब्धियों से नफरत करते हैं, पर ज्यादातर को इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।
आखिर ऐसा क्या हुआ या सोच-समझकर ऐसा क्या किया गया कि भारत के लोगों को अपने गौरव का भान नहीं रहा?
देखिए, इस समय पश्चिम में बहुत से लोगों को भारत के बारे में सही जानकारी पता चल रही है कि यहां बहुत कुछ है। आज विदेशों के बड़े विश्वविद्यालयों में ऐसे पाठ्यक्रम हैं, जिन्हें भारतीय प्रोफेसर पढ़ाते हैं। उनमें दक्षिण भारत के लोग ज्यादा हैं, उन्हें काफी ज्ञान है क्योंकि वे अपनी परंपराओं से नजदीक से जुड़े रहे हैं। पश्चिम में दक्षिण भारतीयों के इतने सफल होने का यह भी एक कारण हो सकता है। उन्होंने अपनी परंपराओं को संजोये रखा है और वे अपने बच्चों को भी विष्णु सहस्रनाम आदि पढ़ाते हैं, पर्व-त्योहार मनाते हैं। भारत में सबसे बड़ी समस्या, मेरे हिसाब से, तमस की है। भारत में अनुसंधानकर्ताओं, विद्वानों, अध्यापकों को जितनी मेहनत करके ये विषय आगे बढ़ाने चाहिए, वह काम नहीं हुआ है। विदेशी विश्वविद्यालय में जब भारत से जुड़े किसी पाठ्यक्रम को रखने की बात आती है तो बजाय शोध करके नई चीज लाने के, लोग किसी और विदेशी विश्वविद्यालय में पहले से चल रहे पाठ्यक्रम को ही थोड़ा बदलकर काम चला लेते हैं। हो सकता है, कुछ लोग ऐतिहासिक कारणों से ऐसा करते हों, पर ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा नहीं है। असली समस्या हमारा आलस्य है। यदि ये सब जानकारियां बाहर आ जाएं तो और अच्छा होगा। वैसे आज यह काम सरल है। सोशल मीडिया है, जानकारी के तमाम अन्य साधन उपल्ब्ध हैं।
शून्य का आविष्कार भारत में हुआ। वैमानिकी भारत में जन्मी, सामुद्रिक शास्त्र पहले भारत में रचा गया। खगोलशास्त्र के क्षेत्र में हमारे यहां पहले अनुसंधान हुए। कौटिल्य अर्थशास्त्र हमारे यहां रचा गया। इसके बावजूद काफी लोग हैं जो कहते हैं कि 'ऐसा नहीं है, सब पश्चिम की देन है'। यह क्या जानकारी का अभाव है?
भारत में स्कूल-कॉलेजों में एक विषय तो पढ़ाया ही जाना चाहिए-भारतीय विज्ञान का इतिहास। और यदि इसको ध्यान से बनाया जाए तो फिर इस समय इस विषय पर जो अज्ञानता है, भारत के इतिहास के बारे में, वह हट जाएगी। तो इस समस्या को दूर करना कठिन नहीं है। जैसे, अगर लोगों को मालूम हो कि हमारे यहां सुश्रुत संहिता है जिसमें शल्य क्रिया के बारे में बहुत पहले जानकारी दी जा चुकी है, तो इस बात पर आगे प्रश्न नहीं उठाया जाएगा। एक बार लोगों को जानकारी हो जाए तो ऐसी गलतफहमी नहीं रहेगी। इस तरफ आवश्यकतानुसार कोशिश शुरू होनी चाहिए। बस, एक विषय ही तो जोड़ना होगा पाठ्यक्रम में। मेरा ख्याल है, ऐसा करना कम्युनिस्टों के लिए भी तकलीफदेह नहीं होना चाहिए।
लेकिन जैसे ही इस तरह की बात की जाएगी तो सेकुलर मीडिया, जिसमें कम्युनिस्ट तत्वों की भरमार है, वह एकदम से कहेगा कि 'यह तो शिक्षा का भगवाकरण किया जा रहा है'। जैसे, यदि आप संस्कृत पढ़ाने की बात करें तो ये लोग शुरू हो जाते हैं कि 'छात्रों को पुराने जमाने में ले जाया जा रहा है। जमाना टेक्नोलॉजी और कम्प्यूटर का है और ये संस्कृत की बात कर रहे हैं'। इस रवैए पर आप क्या कहेंगे?
पश्चिम जगत में जो दक्षिण भारत के लोग हैं वे अपने घरों में बच्चों को संस्कृत पढ़ाते हैं, वेद पढ़ाते हैं। मुझे लगता है, संस्कृत पढ़ना एक अनुशासन है, योग है, जिससे हमारी क्षमता बढ़ती है। लेकिन, इस समय इसे राजनीति का मुद्दा बनाया जाता है। तो कोई बात नहीं, इसे वैकल्पिक विषय की तरह रखा जा सकता है, जिसे सीखना होगा, सीखेगा। लेकिन कम से कम, हमारे प्राचीन इतिहास में क्या-क्या चीजें थीं, इसकी जानकारी तो होनी ही चाहिए। जानकारी होने पर अगर छात्र उत्सुकतावश और बातें जानने के लिए मूल ग्रंथ पढ़ना चाहे तो जरूर पढ़े, जो संस्कृत में हैं और जिसके लिए संस्कृत सीखना जरूरी है।
हमारे देश में तक्षशिला विश्वविद्यालय था, नालंदा था। दुनिया भर से छात्र इनमें पढ़ने आते थे। इनमें इतने ग्रंथ थे कि कहते हैं, जब मतान्ध मुगलों ने पुस्तकालय को जलाया था तो छह महीने तक आग जलती रही थी। आज अपने ही देश में इतिहास को लेकर जानकारी का अकाल जैसा बना हुआ है। अजीब नहीं लगती ऐसी स्थिति?
यही तो हमारे लिए एक चुनौती है, जिसके लिए आप और हम जैसे लोग यानी पत्रकार, लेखक, वक्ता इत्यादि जितना हो सके, इस दिशा में काम करें। तो धीरे-धीरे स्थिति सुधरेगी। देवों और दानवों के बीच, प्रकाश और अंधेरे के बीच हमेशा संग्राम होता रहा है। इसलिए हम यह तो नहीं कह सकते हैं कि ऐसा क्यों है। यह तो इतिहास का एक हिस्सा है कि ऐसा हुआ। अब तो हम चीजों को सुधारने के लिए जितना कर सकते हैं उतना प्रयत्न करना चाहिए।
एक झूठ और फैलाया जाता है कि 'आर्य बाहर से यहां आए'। इस झूठे सिद्धांत को फैलाने वालों को क्या कहेंगे?
देखिए, सच कहूं तो यह बर्दाश्त से बाहर की बात है। 2000 ई.पू. में दुनिया की 70-80 प्रतिशत जनसंख्या एशिया में, भारत में निवास करती थी। प्राचीन दुनिया में भारत सबसे घनी आबादी वाला क्षेत्र था। यूरोप की जनसंख्या बहुत कम थी। इसके आकलन हैं, आंकड़े हैं जो गूगल करके देखे जा सकते हैं। तो लड़ाई केवल इस बात की है कि जो वेदों का ज्ञान है वह मूलत: भारतीय है या बाहर से आया है। यूरोप अपने इतिहास के लिए लड़ रहा है। इसलिए वह यह बताना चाहता है कि 'भारत में जो अच्छी चीजें थीं वे यूरोप से आईं, क्योंकि उसकी नजर में उस समय भारत पिछड़ा था। बाद में हमने (यूरोप ने) उन्हें खो दिया।' देखिए, वेद में जो खगोलशास्त्र के आंकड़े हैं वे करीब 3000 ई.पू. तक जाते हैं। और झूठ फैलाने वाले कहते हैं कि आर्य 1500 ई.पू. में भारत में आये। चलो मान लेते हैं ऐसा हुआ, मगर जहां से उन्हें आया हुआ बताया जाता है यानी मध्य एशिया, तो वहां जनसंख्या को संभालने की क्षमता बहुत कम थी। मान लीजिए, वहां से 5 प्रतिशत लोग आए तो उन्होंने कैसे अपनी भाषा सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्र पर लाद दी? यह तो संभव ही नहीं है। इसलिए आर्यों के संदर्भ में जो भी झूठ फैलाया जाता है वह हास्यास्पद है।
इसी संदर्भ में वे कहते हैं, आर्यों और द्रविड़ों में संघर्ष हुआ?
अपने इतिहास को बेहतर साबित करने के लिए ऐसी चीजें फैलाना यूरोप का दिमागी रोग है, क्योंकि उनका कोई इतिहास था ही नहीं। जैसे, जर्मन लोग 1500-2000 एडी तक रणनीतिकार थे। इसके पहले रोमन का इतिहास जाता है 300 ई.पू. तक। ग्रीक का इतिहास 500 ई.पू. तक जाता है। ऐसे में कितना भी संकुचित होकर देखें तो भी भारत का इतिहास 1500 से 2500 ई.पू. तक जाता है। तो क्या यह हास्यास्पद नहीं है कि जो लोग 2000 साल बाद आए वे कहें कि जो प्राचीन है वह हमारा है। हाल में बहुत दिलचस्प घटनाक्रम हुए हैं। पुरातात्विक स्थलों से मिलीं पुरानी अस्थियों की डीएनए जांच की गई है जिससे मालूम हुआ है कि यूरोप की भाषाएं वहां 2000 ई.पू. में ही आई हैं, उससे पहले वहां कुछ और लोग रहते थे। तो इससे मुझे लगता है कि और पुष्टि हो रही है कि संस्कृत और अन्य भाषाएं, जैसे स्लाविक, रूसी, जर्मनी भाषाएं आदि ये मध्य एशिया के रास्ते भारत से यूरोप गईं। इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि भारतीय लोग वहां गए। उदाहरण के लिए जैसे आज योग पूरे विश्व में जा रहा है। उसकी शब्दावली भी जा रही है। तो कुछ ऐसी ही प्रक्रिया तब रही थी। देखिए, रूस, यूक्रेन, पोलैंड में प्राचीन पंथ को मानने वाले परजन्य (इन्द्र) की, रुद्र की पूजा करते थे। ईसाइयत के आने से पहले तक वैदिक सभ्यता बहुत विकसित हो चुकी थी।
आज भी कई देशों में वहां के प्राचीन वासी सूर्य-चन्द्रमा, प्रकृति, पेड़ों की पूजा करते हैं। यह प्रवृत्ति सनातन धर्म से मेल खाती है।
जहां तक वेद के धर्म यानी सनातन धर्म की बात है तो कई यूरोपीय भाषाएं संस्कृत से जुड़ी हुई हैं। उनमें संस्कृत से बहुत ज्यादा संबंध दिखता है, क्योंकि अगर वे परजन्य की उपासना करते थे यानी इन्द्र की उपासना करते हैं जो उनका सबसे बड़ा देवता था तो इसका मतलब है कि वे सब एक ही परंपरा, एक ही धारा से जुड़े थे। 
हम अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने उसे मान्यता दी है। आज भारत की एक प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में, राजनीतिक शक्ति के रूप में पहचान बनी है। भारत के वैज्ञानिकों ने 'नासा' में भी अपना प्रभाव दिखाया है। क्या आपको लगता है कि आने वाले समय में भारत विश्व में अपनी मेधा का परचम लहराएगा?
बिल्कुल। प्रमुख अर्थशास्त्रियों का कहना है कि आने वाले दस वर्ष में भारत की अर्थव्यवस्था अमेरिका को पीछे छोड़कर विश्व में नंबर दो पर आ जाएगी। अभी क्रय शक्ति के हिसाब से भारत की अर्थव्यवस्था तीसरे नंबर पर है। पहली चीन है, दूसरी अमेरिका और तीसरी भारत। लेकिन सामान्य डॉलर के संदर्भ में भी अगले 10 साल में क्रम चीन, भारत और अमेरिका होगा। पूरे पश्चिमी जगत को पता है कि भारत आगे बढ़ रहा है और अब इसे रोका नहीं जा सकता। सबसे समृद्ध देश अमेरिका में स्कूलों में विज्ञान प्रतिभा खोज प्रतियोगिता होती है, जिसमें बच्चे भाग लेते हैं। इस साल जो 40 प्रतियोगी सफल हुए उनमें 17 भारतीय थे। सोचकर देखिए, अमेरिका में भारतीयों की संख्या मात्र एक प्रतिशत है तो 17 भारतीय बच्चों का चुना जाना 42 प्रतिशत सफलता होता है। पिछले साल भी 17 भारतीय बच्चे सफल रहे थे। फिर, माइक्रासॉफ्ट के सीईओ, गूगल के सीईओ, अडोबी के सीईओ, ये सब भारतीय ही हैं। राजनीति में देंखे तो भारतीय मूल की कमला हैरिस के डेमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार बनने के पूरे आसार हैं। उनके अलावा तुलसी गबार्ड हैं वहां। इस तरह विदेशों में भारत का प्रभाव बढ़ रहा है। भारत का कद बढ़ रहा है, और अब यह रुकेगा नहीं। आने वाली शताब्दी या सहस्राब्दी भारत की होगी। सारा विश्व भारत की ओर आकर्षित होगा। अगर आप पूछें कि ऐसा अभी तक क्यों नहीं हुआ, तो मैं कहूंगा कि भारतीय लोग ही भारत की संस्कृति को विस्मृत किए हुए हैं। यदि भारतवासी यह जान लें कि उनकी संस्कृति असल में क्या है तो पूरा विश्व उनके सामने झुक जाएगा।
आप चेतन और अवचेतन मन का अध्ययन भी करते हैं। सरल भाषा में, चेतन और अवचेतन में फर्क क्या है?
अवचेतन हुआ चेतना को पहुंचना यानी मन तक पहुंचना। चेतना को ऐसा समझें, जैसे प्रकाश। चेतना के द्वारा ही हम आसपास के वातावरण को देखते, समझते हैं। लेकिन जो मन है, जो अंत:करण है वह जिन-जिन चीजों पर प्रकाश पड़ता है उसके बारे में उस समय हमें जानकारी देता है। इन सब के पीछे जो शक्ति है यह चीज हमें वहां तक नहीं ले जा सकती। वही शक्ति है आत्मा या आत्मविद्या। वही वेद का सबसे गहरा विज्ञान है। वेद आत्मज्ञान है, आत्म विद्या है। वह चेतना के बारे में विज्ञान है। यही विज्ञान की चरम सीमा है। यह भी एक कारण है कि पूरा विश्व अब भारत की ओर आएगा क्योंकि विज्ञान ने बाहर का सब जान लिया है, अब तो जानने को बस एक रहस्य बचा है कि आत्मा क्या है, और वेद केवल इसी रहस्य की चर्चा करते हैं।