ज्ञान और गुण जिनके भीतर "महासागर" की भांति विद्यमान हैं वही हनुमान हैं
   दिनांक 19-अप्रैल-2019
  
 
गोस्वामी तुलसीदासजी ने जब हनुमान चालीसा की रचना की तो बजरंग बलि का वर्णन "ज्ञान गुन सागर" कहकर किया। ज्ञान और गुण जिनके भीतर "महासागर" की भांति विद्यमान है वही "महावीर हनुमान" हैं। गोस्वामीजी ने आखिर ज्ञान और गुणों का महासागर हनुमानजी को ही क्यों कहा, हम इस पर ही विचार करेंगे।
महासागर के सात लक्षण हैं। सागर गहन है, विशाल है, गंभीर है, उसमें खारा जल है, वह सदैव मर्यादा में रहता है। सागर में बहुमूल्य रत्न होते हैं और सबसे बड़ी बात, भगवान नारायण समुद्र में अपने शेषशैया पर सदा विराजमान रहते हैं। महासागर के ये सातों लक्षण बजरंगबलि में देखे जा सकते हैं।
1) गहनता : गहन अर्थात गहराई, घना। महासागर में गहन जलराशि है, उसकी गहराई को कोई माप नहीं सकता। इसी तरह वीर हनुमान की कर्तव्यनिष्ठा गहन है। श्रीराम का कार्य ही उनके जीवन का उद्देश्य है। सीता की खोज हो या हिमालय से संजीवनी लाने का कार्य, नागपाश से राम-लखन को बंधनमुक्त करना हो या फिर पाताल लोक में जाकर अहिरावण को मारकर राम-लक्ष्मण को सुरक्षित वापस लाना। कठिन से कठिन, विशाल और असम्भव कार्य को सम्भव बनाना हनुमानजी की विशेषता है। प्रत्येक चुनौती का समाधान करने के लिए वे सदैव तत्पर रहते हैं। प्रत्येक कार्य को निपुणता से पूर्ण करने के लिए वे गहनता से विचार करते हैं।
2) विशालता : विशालता अर्थात व्यापकता,विस्तार। महासागर इतना विशाल होता है कि संसार की सारी नदियां उसमें आकर समा जाती हैं। महासागर तो एक ही है, उसकी सीमा की थाह पाना असम्भव है, इसलिए वह असीम है! अनेक देशों की सीमाएं सागर से लगकर है। महासागर तो एक ही है पर विभिन्न देशों में फैले उसके विस्तार को भिन्न-भिन्न नाम दे दिए गए। जैसे अपने यहां दक्षिण में हिन्द (हिन्दू) महासागर, पश्चिम में सिंधु (अरब) सागर और पूर्व में गंगा (बंगाल की खाड़ी) सागर। इसी तरह कहीं प्रशान्त महासागर (Pacific Ocean), अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean), दक्षिणध्रुवीय महासागर (Southern Ocean) तथा उत्तरध्रुवीय महासागर (Arctic Ocean) आदि।
हनुमानजी भी विशाल हैं। जब सीताजी की खोज के लिए श्रीरामजी की वानर सेना निकल पड़ी तो वे दक्षिण में सागर तट पर पहुंचे। सागर के उस पार लंका जाना है। हनुमानजी भी चुपचाप बैठे थे। तब जाम्बवन्त ने कहा,
“कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥”
जाम्बवन्त के इस कथन के कहते ही हनुमानजी का आकार विशालकाय हो गया। इतना ही नहीं तो वे परवातों के राजा की तरह दिख रहे थे और वे गरजकर कहते हैं कि मैं इस खारे समुद्र को खेल-खेल में लांघ सकता हूं।
कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहु अपर गिरिन्ह कर राजा।।
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहीं नाषउँ जलनिधि खारा।।
हनुमानजी का हृदय भी विशाल है। वे सुग्रीव की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे। अंगद का कल्याण चाहते थे। यहां तक कि विभीषण जो शत्रुदल से आए हैं। श्रीराम पूछते हैं कि क्या किया जाए हनुमान? हनुमानजी कहते हैं कि विभीषण को अपना लीजिए। हनुमानजी के कथन पर श्रीरामजी ने विभीषण को अपना मित्र बनाया। बजरंगबलि की व्यापकता और उनपर जनमानस की श्रद्धा को रेखांकित करते हुए हनुमान चालीसा में तुलसीदासजी बहुत सुंदर वर्णन करते हैं। “और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेई सर्ब सुख करई।।” अर्थात हे हनुमानजी! आपकी वंदना करने से सब प्रकार के सुख मिलते हैं। फिर किसी देवता की पूजा करने की आवश्यकता नहीं रहती।
 
3) गम्भीरता : गम्भीरता यानी गाम्भीर्य (सीरियस), शान्त, धीर। महासागर का यह तीसरा लक्षण है। वैज्ञानिक मानते हैं कि पृथ्वी का 71 प्रतिशत भाग समुद्र से घिरा है जिसमें खारा पानी और बर्फ की चट्टानें हैं, शेष 29 प्रतिशत हिस्सा भूभाग है। इसके बावजूद समुद्र गहन होने के साथ ही गम्भीर है। यदि वह गंभीर नहीं होता तो शेष भूभाग को अपने तेज थपेड़ों से बर्बाद कर देता। शक्ति होने पर भी वह उसे प्रगट नहीं करता। हनुमानजी भी कार्य को लेकर गम्भीर रहते हैं। कहीं भी लड़कपन, हंसी-मजाक या फूहड़ता उनमें नहीं है। वे श्रीराम की आज्ञा का पालन यथावत करते हैं। श्रीसीता के मिलने पर उन्हें या अंगूठी देने की बात श्रीराम ने हनुमानजी से कही थी। हनुमानजी लंका गए, लंका-दहन कर लौट आए। और जब श्रीराम के समीप आए तब उन्होंने लंका में अपने द्वारा किए गए पराक्रम का वर्णन नहीं किया। वे चिंतन करने लगे कि श्रीराम को माता जानकी का सन्देश किन शब्दों में देना चाहिए। लंका दहन का प्रसंग पहले कहूं या माँ सीता का धैर्य का वर्णन? पर ‘बुद्धिमतां वरिष्ठं’ महावीर ने वाणी के संयम और तप का महान आदर्श प्रस्तुत किया। हनुमान ने श्रीराम से कहा, “दृष्टवा-देखि”, यानी मैंने माता सीता के दर्शन किए। हनुमान के मुख से निकले इस पहले वाक्य को सुनते ही श्रीराम की विरह वेदना समाप्त हो गई, उनके अंतःकरण में मची खलबली समाप्त हो गई। यह हनुमानजी के गाम्भीर्य का एक उदाहरण है।
4) खारा जल : सागर खारे जल से भरा है। हनुमानजी का भला खारे जल से क्या सम्बन्ध? ऐसा प्रश्न हमारे मन में उठ सकता है। आँसू खारा ही होता है। माता जानकी को अशोक वाटिका में व्याकुल देखकर हनुमानजी की आँखों से आँसू आते हैं, वे श्रीराम के सीता-वियोग की पीड़ा को समझते हैं। सदा रामभक्ति में लीन होकर वे अश्रुपूरित अंखियों से श्रीराम का भजन करते हैं।
5) मर्यादा : समुद्र की लहरें बहुत तेज होती हैं। पर सागर तबाही नहीं मचाता। उसकी लहरें आती हैं और किनारे से होकर लौट जाती हैं। “मर्यादा” समुद्र का पांचवा लक्षण है। मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के परमभक्त हनुमानजी का चरित्र श्रेष्ठतम है। वे अपने इन्द्रियों के स्वामी हैं। सदैव “मर्यादा” का पालन करते हैं। रामकथा में अनेक स्थानों पर रामकाज में सर्वाधिक अग्रेसर हनुमानजी ही हैं। श्रीराम की विजयगाथा में हनुमानजी के पराक्रम और सुझबुझ का अद्वितीय स्थान है। पर हनुमानजी में तनिक भी अहंकार नहीं है, वे सदा ही विनम्रता से श्रीराम के चरणों में बैठते हैं। संसार में जहां भी श्रीराम का मंदिर देखेंगे तो वहां पाएंगे कि महावीर हनुमान की मूर्ति श्रीराम के चरणों के समीप है।
स्वामी विवेकानन्द की महान शिष्या भगिनी निवेदिता अपनी पुस्तक “रिलिजन एंड धर्म” में लिखती हैं कि, “सीता की खोज, लंका-दहन, द्रोणगिरि के लाने आदि जितने भी कठिन कार्य आए, हनुमान सबसे आगे रहे, पर राज्याभिषेक के पश्चात् राज्यसभा में जब प्रभु रामचन्द्र सबको पारितोषिक वितरण करने लगे तो वे एक ओर रामनाम स्मरण में तल्लीन थे। ऐसे पवनसुत हनुमान सेवकों के आदर्श हैं।...यही स्वयंसेवक वृत्ति प्रत्येक कार्यकर्ता में होनी चाहिए।”
6) बहुमूल्य रत्न : सागर का छठा लक्षण है “बहुमूल्य रत्न”। हिन्दू पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन से ही संसार को रत्न मिले हैं तथापि समुद्र रत्नों की खान है। समुद्र तल में मोती आदि बहुमूल्य रत्न पाए जाते हैं। हनुमानजी की दृष्टि में सांसारिक धन व्यर्थ है। वे “रामरतन” धन से परिपूर्ण हैं। हनुमान की पहचान यह रामधन ही है। रामभक्ति ऐसी कि जिनकी वे पूजा करते हैं वे स्वयं श्रीराम उनको अपने हृदय से लगाते हैं।
7) नारायण का वास : पुराणों के अनुसार, क्षीरसागर में भगवान नारायण लक्ष्मीजी के साथ शेषनाग पर विराजित हैं। इसका तात्पर्य है कि भगवान विष्णु समुद्र में विराजमान हैं। हनुमानजी के हृदय में सदैव भगवान श्रीराम विराजमान रहते हैं। अयोध्या में श्रीराम-जानकी के सम्मुख हनुमानजी ने अपना हृदय चीरकर भरी सभा में “सीता सहित राम-लखन” का दर्शन करवाया। इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है।
 
सचमुच महावीर हनुमान ज्ञान-गुण सागर हैं। उन्हें ज्ञान है कि वे कौन हैं? वे जानते हैं कि उनके जीवन का क्या उद्देश्य है? श्रीराम चरणों में सदा समर्पित, श्रीराम के आदेश का पालन करना यही उनका जीवन है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि महावीर को आदर्श मानो। 
स्वामीजी कहते हैं :
 , “तुम्हें महावीर के चरित्र को आदर्श के रूप में अपने सामने रखना होगा। देखो, किस प्रकार से रामचंद्र की आज्ञा पर समुद्र को लांघ गए। उन्होंने अपने जीवन या मृत्यु की तनिक चिंता नहीं की। वे अपनी इंद्रियों के पूर्ण स्वामी थे और अदभुत प्रज्ञा से संपन्न थे। तुम्हें व्यक्तिगत सेवा के इस महान् आदर्श के नमूने पर अपने जीवन का निर्माण करना होगा। उसके द्वारा अन्य समस्त आदर्श भी जीवन में स्वतः धीरे-धीरे प्रकट होंगे। गुरु की आज्ञा का आँख मूंद कर पालन करो। ब्रह्मचर्य का निष्ठापूर्वक आचरण ही सफलता का मूल मंत्र है। हनुमान जहां एक ओर सेवा के आदर्श के प्रतीक हैं, वहीं दूसरी ओर वे समस्त संसार को आतंकित कर देने वाले सिंहवत् साहस के भी प्रतीक हैं। राम के हित के लिए उन्हें अपने प्राणों का बलिदान करने में तनिक भी संकोच नहीं है। राम के सेवा के अतिरिक्त प्रत्येक चीज की ओर से विरक्त हैं। यहां तक कि विश्व के महान् देवता ब्रह्मा अथवा विष्णु के स्थान को प्राप्त करने की लालसा भी नहीं है। उनके जीवन का एक ही व्रत है- राम की प्रत्येक इच्छा को क्रियान्वित करना। ऐसी ही पूर्ण-समर्पणकारी भक्ति चाहिए।”
 
हनुमानजी भक्ति, सेवा, बल, बुद्धि, विवेक, मर्यादा, संगीत और ज्ञान-गुण के प्रतीक हैं। आज संसार में फैले आसुरी शक्ति और अनैतिकता से लड़ने के लिए हनुमत शक्ति की आवश्यकता है। स्वामी विवेकानन्दजी के विचारों के अनुसार “महावीर हनुमान का आदर्श” हमें अपनाना ही होगा। श्रीराम मंदिर निर्माण की प्रतीक्षा देशभर श्रीराम भक्त कर रहे हैं। आइए, रामकाज के लिए हनुमानजी के आदर्श को अंगीकृत करें।