उमर जी देश में दो पीएम नहीं हो सकते, प्रधानमंत्री तो एक ही रहेगा
   दिनांक 02-अप्रैल-2019
जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का इरादा है कि जम्मू-कश्मीर में सदर ए रियासत और प्रधानमंत्री पदों की बहाली की जाएगी. उन्होंने बांदीपोरा में एक चुनावी सभा में इसका ऐलान किया.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उमर अब्दुल्ला को जवाब दिया कि मेरे रहते भारत का बंटवारा संभव नहीं है.

जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को जिस विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, उसमें कोई शर्त नहीं थी. यह वैसा ही विलय पत्र था, जैसा बाकी रियासतों ने भारतीय संघ में शामिल होने के लिए मंजूर किया था. अब सवाल ये पैदा होता है कि अगर विलय बिना किसी शर्त था, तो जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा क्यों.
जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का इरादा है कि जम्मू-कश्मीर में सदर ए रियासत और प्रधानमंत्री पदों की बहाली की जाएगी. उन्होंने बांदीपोरा में एक चुनावी सभा में इसका ऐलान किया. उमर ने कहा कि विलय के समय बाकी रियासतों ने कोई शर्त नहीं रखी थी. लेकिन हम मुफ्त में नहीं आए. हमने शर्त रखी थी. लेकिन उमर अब्दुल्ला तथ्यात्मक रूप से गलत हैं. जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को जिस विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, उसमें कोई शर्त नहीं थी. यह वैसा ही विलय पत्र था, जैसा बाकी रियासतों ने भारतीय संघ में शामिल होने के लिए मंजूर किया था. अब सवाल ये पैदा होता है कि अगर विलय बिना किसी शर्त था, तो जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा क्यों. धारा 370 और अनुच्छेद 35 ए जैसे अलगाववादी इंतजाम संविधान में क्यों किए गए. शेख अब्दुल्ला (उमर अब्दुल्ला के दादा) की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ये विषबेल बोई, जिससे कश्मीर एक नासूर बन गया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उमर अब्दुल्ला को जवाब दिया. उन्होंने कहा कि मेरे रहते भारत का बंटवारा संभव नहीं है. उमर अब्दुल्ला अब ट्वीट करके प्रधानमंत्री को से कह रहे हैं कि ये हमारी मांग नहीं है. यह तो वह शर्त है, जिसे भारत में विलय के समय तत्कालीन सरकार (नेहरू सरकार) ने स्वीकार किया था. यह भारत के संविधान में है. हम तो जो संविधान में लिखा है, वही मांग रहे हैं. उमर को ये हिम्मत धारा 370 और अनुच्छेद 35 ए के कारण मिल रही है.
बांदीपोरा की जनसभा में उमर ने कहा कि जम्मू कश्मीर का मामला बाकी रियासतों अलग है. विलय के समय बाकी रियासतों ने कोई शर्त नहीं रखी थी. लेकिन हम मुफ्त में नहीं आए. हमने शर्त रखी थी. हमने कहा कि हमारी पहचान अपनी होगी, संविधान अपना होगा, झंडा अपना होगा. हमने उस वक्त 'सदर-ए-रियासत' और 'प्रधानमंत्री' भी अपना रखा था. जिसे इन्होंने काटा. इंशा अल्लाह उसको भी वापस ले आएंगे.
शेख अब्दुल्ला के पोते और फारूक अब्दुल्ला के बेटे उमर धमकियां देने से भी बाज नहीं आए. अलगाववादी सुर में कहा कि विलय के समय ऐसा कुछ तय नहीं हुआ था कि विशेष दर्जा 10 साल, 20 साल या फिर 70 साल के लिए है. हमें यह कहा गया था कि जब तक जम्मू कश्मीर इस मुल्क का हिस्सा बना रहेगा तब तक उसे यह विशेष दर्जा हासिल होगा. जिस दिन इस विशेष दर्जे को हटा दिया जाता है तो हमारा इस मुल्क के साथ रिश्ता क्या रह जाता है. उमर ने कहा कि इसी बुनियाद पर ही तो रिश्ता है और अगर यह हटाया जाता है तो फिर विलय पर भी बात करनी होगी.
 
कश्मीर का विलय पत्र 
बिना किसी शर्त था कश्मीर का विलय
पाकिस्तानी हमले के बाद 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेंटन को को जो विलय संबंधित सहमति भेजी थी, उसमें विलय पत्र (इंस्ट्रूमेंट आफ एक्सेशन) दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे. इंस्ट्रूमेंट आफ एक्सेशन 1935 का बना हुआ कानून था. इसका इस्तेमाल 1947 में भारत और पाकिस्तान में रियासतों के विलय के समय किया गया. भारत में 565 रियासतें थीं. ये ब्रिटिश आधिपत्य में तो थीं, लेकिन इनकी अलग पहचान थी. 1935 में यह कानून इन्हें भारतीय संघ में शामिल होने का रास्ता देने के लिए बनाया गया था. मायने ये कि महाराजा हरि सिंह ने उसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे, जिस पर अन्य रियासतों ने किए. यह विलय बिना किसी शर्त था. जिस विलय संधि के आधार पर जम्मू कश्मीर भारत का हिस्सा बना गई, उसमें महज दो पेज थे. इसे खासतौर पर तैयार नहीं किया गया था.
कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी सैनिकों से घिरे महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी थी. उस समय माउंटबेटन ने सलाह दी थी कि विलय पत्र पर पहले साइन करा लिए जाएं. 26 अक्टूबर को जिस विलय पत्र पर हरि सिंह ने साइन किए, वह वैसा ही था, जैसा बाकी रियासतों का. विलय संधि के बाद बाकी रियासतों से इंस्ट्रूमेंट आफ मर्जर पर साइन कराए गए, लेकिन हरि सिंह से इस पर रहस्यमयी कारणों से हस्ताक्षर नहीं कराए गए. असल में उस समय तक शेख अब्दुल्ला प्रधानमंत्री नियुक्त हो चुके थे. नेहरू और अब्दुल्ला की महत्वाकांक्षा ही कुछ और थी. शेख अबदुल्ला ने नेहरू को समझाया कि लद्दाख और जम्मू की हिंदू आबादी भारत में विलय चाहती ही है. उनकी नेशनल कान्फ्रेंस भारत के साथ है. ऐसे में यदि नेहरू जनमत संग्रह की घोषणा करते हैं, तो यह भारत के पक्ष में जाएगा. अंतरराष्ट्रीय छवि के भूखे नेहरू ने आल इंडिया रेडियो पर ये घोषणा की और इसी के साथ कश्मीर समस्या के बीज बो दिए गए. आज तमाम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान इसी जनमत संग्रह की बात को लेकर चिल्लाता है.
क्यों है इतनी बौखलाहट
इतनी बौखलाहट क्यों है. इसलिए कि भाजपा ने अपने दूसरे कार्यकाल के लिए प्राथमिकताएं साफ कर दी हैं. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह एक इंटरव्यू में साफ कर चुके हैं कि 2020 तक हम जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 35-ए हटा देंगे. वित्त मंत्री अरुण जेटली भी बड़ी साफगोई से चुनाव से पहले ही ये इरादा जाहिर कर चुके हैं कि दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार धारा 370 और अनुच्छेद 35 ए को हटाने का काम करेगी. देश की आजादी से आज तक का घटनाक्रम ये साबित करता है कि धारा 370 और अनुच्छेद 35 ए ने कश्मीर को देश का नासूर बना दिया है.