सोशल मीडिया पर कांग्रेस की ओछी राजनीति
   दिनांक 02-अप्रैल-2019
फेसबुक ने करीब 687 पेजों को अपने सिस्टम से हटा दिया। फेसबुक के अनुसार ये पेज भाजपा के खिलाफ स्थानीय स्तर पर ऐसे समाचारों को बढ़ावा दे रहे थे, जो हकीकत से दूर रहे हैं। सभी फर्जी आईडी से संचालित हो रहे थे
चुनावों की जब भी चर्चा होती है, राजनीतिक मामलों के जानकार उसे लोकतंत्र का महापर्व बताते नहीं थकते। दुनिया की सभी संस्कृतियों में पर्व, त्योहार या महापर्व का रिश्ता ऐसे उत्साह से रहा है, जिसमें उदात्त परंपराएं होती हैं, संस्कृति के प्रति निष्ठा होती है और सामाजिक समभाव का संदेश होता है। लेकिन मौजूदा चुनावों में जिस तरह लांछन लगाने, भाषायी पवित्रता को दरकिनार करने और झूठ फैलाने का खेल हो रहा है, क्या भारतीय चुनावों को लोकतंत्र का महापर्व कहा जा सकता है? चुनाव मैदान से लेकर सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर जिस तरह झूठ, फेक न्यूज और अनाचारी तौर-तरीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है, निश्चित तौर पर चुनावी महापर्व की अवधारणा पर ही सवाल उठ खड़े होते हैं। इन सवालों को बल तब और मिला, जब सोशल मीडिया के एक बड़े मंच फेसबुक ने करीब 687 पेजों को अपने सिस्टम से हटा दिया। फेसबुक के मुताबिक ये पेज बीजेपी के खिलाफ स्थानीय स्तर पर ऐसे समाचारों को बढ़ावा दे रहे थे, जो हकीकत से दूर रहे हैं। फेसबुक ने अपने एक बयान में कहा कि उसने नेटवर्क द्वारा तैयार पेजों, एकाउंटों और ग्रुपों को समन्वित अप्रामाणिक व्यवहार से संबंधित फेसबुक की नीतियों का उल्लंघन करने पर हटा दिया है।
फेसबुक ने ऐसा करते वक्त चार असंबद्ध ग्रुपों, पेज और एकाउंट को उदाहरण के तौर पर साझा भी किया। फेसबुक के साइबर सिक्यॉरिटी पॉलिसी के प्रमुख नाथानियल ग्लेसर की ओर से जारी बयान में कहा गया कि उसने 103 पेजों, ग्रुपों और अकाउंटों को नेटवर्क के रूप में फेसबुक और इंस्टाग्राम पर समन्वित अप्रामाणिक व्यवहार को लेकर हटा दिया। ये नेटवर्क पाकिस्तान में स्थित है।
 
फेसबुक से हटाए गए इन पृष्ठों के बहाने सोशल मीडिया पर फैल रहे राजनीतिक झूठ और फरेब के कारोबार की मीमांसा से पहले कैंब्रिज एनालिटिका को भी याद कर लेना चाहिए। पिछले साल ब्रिटेन स्थित यह कंपनी तब विवादों में आई थी, जब उस पर आरोप लगा था कि उसने डेटा लीक करके अमेरिकी चुनावों में डोनॉल्ड ट्रंप के पक्ष में माहौल बनाने में मदद की थी। इसके बाद उस पर भारत में कांग्रेस के लिए भी अपने डेटा बैंक का इस्तेमाल करने और लोगों की निजी जानकारियों को लीक करने का आरोप लगा। इसके बाद आनन-फानन में इस कंपनी ने खुद को दिवालिया घोषित करके अपना कामकाज बंद कर दिया था। इसके बाद यह समझ बनी कि यह कंपनी कांग्रेस को चुनावी फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रही थी। जिस तरह भारतीय जनता पार्टी की सरकार के जायज और जन समर्थक मुद्दों के उलट नैरेटिव विकसित किए गए और नरेंद्र मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया और इस बहाने में जनता को गुमराह करके आंदोलित किया गया, उससे माना गया कि कांग्रेस का एक तंत्र भारतीय जनता पार्टी की सरकार को पचा नहीं पा रहा है और वह किसी ना किसी तरह से उसे बदनाम करके जनता की नजरों में गिराना चाहता है। इसके बाद कुछ समूहों ने जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की पड़ताल शुरू की तो उसके पीछे सीधे कांग्रेस का हाथ भले ही कम मिला, पाकिस्तान का हाथ जरूर मिला।
पिछले साल कठुआ में एक मासूम के साथ बलात्कार हुआ तो उस गंदी घटना का हिंदू समाज और हिंदुत्व के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए फेक नैरेटिव का जमकर इस्तेमाल हुआ। इसके बाद पता चला कि सोशल मीडिया पर वायरल करने वाले खेल में ज्यादातर पाकिस्तानी अकाउंट थे।
अब आते हैं कांग्रेस से जुड़े 687 पेजों को फेसबुक द्वारा बंद करने या हटाने की बात पर। फेसबुक ने अपने बयान में माना है कि इनमें से 103 पेज अप्रमाणिक जानकारियां दे रहे थे और उन पर सिर्फ भाजपा विरोधी अनर्गल प्रचार किया जा रहा था। फेसबुक के अनुसार ये पेज या अकाउंट पाकिस्तान से संचालित हो रहे थे। तो क्या यह मान लिया जाए कि कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी को चुनावी मैदान में पटखनी देने के लिए पाकिस्तान का सहयोग ले रही थी या फिर आंख दिखाने वाली नरेंद्र मोदी की सरकार से पाकिस्तान भी परेशान है। इसलिए वह इस सरकार से हर हाल में छुटकारा चाहता है और वह कांग्रेस का सहयोग कर रहा है? अगर दोनों ही सवालों का जवाब हां में है तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक नैतिकता के लिहाज से बेहत आपत्तिजनक है। वैसे भी कांग्रेस में मणिशंकर अय्यर और शशि थरूर जैसे नेता हैं, जिनकी पाकिस्तान परस्ती अनजानी नहीं है। वहां जाकर वे नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ बयानबाजी कर ही चुके हैं। फेसबुक के कदम से यही साबित होता है कि सत्ता की चाहत में कांग्रेस ने जाने या अनजाने में ही देशप्रेम और राष्ट्रीयता की सर्वमान्य भारतीय धारा को अंगूठा दिखा दिया है।
जब फेसबुक ने कार्रवाई की तो कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने बयान दिया कि उनकी पार्टी इन खबरों पर प्रतिक्रिया नहीं दे रही है। वह जांच रही है कि फेसबुक से आई खबरों की सच्चाई कितनी है। लेकिन उसे जवाब देना ही पड़ेगा। कांग्रेस को यह बताना ही पड़ेगा कि जो पार्टी महात्मा गांधी की विचारधारा पर चलने और उनके आदर्शों के हिसाब से काम करने का दावा करती है, क्या वह चुनावी जीत के लिए नैतिकता, आदर्श और राष्ट्रप्रेम से इतना समझौता कर सकती है ?