जनमत के संकेत
   दिनांक 20-अप्रैल-2019
लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम भले 23 मई को घोषित हों किन्तु यह साफ है कि यह नतीजे वर्ष 2014 की तुलना में ज्यादा रोचक रहेंगे। इस रोचकता का कारण राजनीति के वे संदेश हैं जो बस गूंजने ही वाले हैं।
 1984 सिख दंगों में हजारों सिखों को मार डाला गया, कांग्रेसी इन दंगों के आरोपी हैं.कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को उम्रकैद भी हो चुकी है.
23 मई के बाद राजनैतिक दलों के बाहर छिड़ने वाली चर्चा का सर्वप्रमुख मुद्दा भाजपा के राष्ट्रव्यापी आधार के टिकाऊपन से जुड़ा होगा। साथ ही इससे यह साफ हो जाएगा कि छीजन की शिकार कांग्रेस के लिए भविष्य की कोई गुंजाइश है या राहुल-प्रियंका सहित हर दवा बुजुर्ग पार्टी के लिए बेकार हो चुकी है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण संदेश उन क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए होगा जिन्होंने निजी अस्तित्व की लड़ाई अथवा राष्ट्रीय मुख्यधारा और इसके सरोकारों में से किसी एक का चुनाव किया।
किन्तु परिणाम और संदेश से पहले ही सियासत के संकेत रिसने लगे हैं। दूसरे दौर के मतदान से पहले दिल्ली में नीलाभ मिश्रा जनसंवाद की दूसरी कड़ी का आयोजन इन संकेतों का साक्षी होने की दृष्टि से अच्छा मौका था।
लोकलुभावन दौर में इच्छा और विकल्पों की बात तथा नई तरह के 'नेशनलिज्म' की चर्चा करता यह आयोजन बौद्धिक दिखने पर भी खास तरह का राजनैतिक विमर्श खड़ा करने की मंशा से था।
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन दौर में नेहरू स्मारक और पुस्तकालय की कमान संभालने वाले, कांग्रेसी खेमे के विचारक प्रताप भानु मेहता का संबोधन इसके केंद्र में था। उन्होंने नए 'नेशनलिज्म' के विविध पहलुओं के साथ भाजपा के संदर्भ जोड़ने का चतुराई भरा प्रयास किया। वर्तमान देशभक्ति की बहस बनाम संप्रग शासन की कमी-कसर का दर्द सामने रखते हुए यह भी कहा-'तब भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा को अप्रासंगिक कर देने का एक बड़ा प्रयास मनमोहन कर रहे थे, लेकिन कांग्रेस के भीतर से ही उसे असफल कर दिया गया'। किन्तु इस सधे हुए संबोधन के बाद उन्हें दर्शकों से जिस प्रकार के प्रश्न और प्रतिक्रियाएं मिलीं उससे लगा कि उसकी अपेक्षा आयोजकों को नहीं थी।
उदाहरण के लिए, एक प्रश्न था-विपक्ष सांप्रदायिक राजनीति का आरोप भाजपा और उससे जुड़े संगठनों पर लगाता है, लेकिन क्या नफरत का वातावरण कांग्रेस ने पैदा नहीं किया? 1984 के दंगे में हजारों सिखों को मार डाला गया और इसके लिए कांग्रेस नेताओं ने लोगों को उकसाया। तब राजीव गांधी के खिलाफ मेनका गांधी लड़ रही थीं और उनके खिलाफ नारे लगे थे-बेटी है सरदार की, कौम है गद्दार की!
एक अन्य प्रश्न था-जब भी मुसलमानों का कोई पर्व होता है, दिल्ली की सड़कों पर उन्हें मोटरसाइकिल पर बिना हेल्मेट,तीन-तीन लोगों को सवार होकर सारे नियम-कानून को ताक पर रखकर हंगामा करते हर किसी ने देखा है। इससे हिंदुओं के मन में दहशत पैदा होती है, कई मामले हैं जब किसी हिंदू लड़के ने किसी मुस्लिम लड़की से प्रेम किया या शादी की तो उसे मारा-पीटा गया,उसकी हत्या कर दी गई! एक नवयुवती द्वारा उछाला गया तीसरा प्रश्न तो और रोचक था कि-कुछ साल पहले तक मेरे माता-पिता कांग्रेसी थे, आज वे पूरी तरह भाजपाई हो चुके हैं! और अगर घर में राष्ट्रीय मुद्दों पर राजनीतिक बातचीत शुरू हो जाए तो माहौल एकदम गर्म हो जाता है। मुझे क्या करना चाहिए?
जाहिर है इस तरह के राजनैतिक-बौद्धिक आयोजनों में जनता को अपने सीधे प्रश्नों के साफ जवाब नहीं मिलते। किन्तु खास बौद्धिक कोटरियों के सामने भारत की जनता के इन तीखे-सीधे प्रश्नों में ही जनमत की गूंज सुनी जा सकती है।
आम आदमी पार्टी-कांग्रेस पार्टी गठजोड़ करें न करें, सिखों से नफरत और '84 के नरसंहार का राजनैतिक बदला लेने का आक्रोश केवल सिख नहीं, बल्कि पूरे समाज के मन में खौल रहा है।
अपराध तय करते वक्त कानून-व्यवस्था की बजाय 'टोपी' देखकर फैसला करने का संकेत करने वालों की सियासत उखड़ने को है। राष्ट्रीय मुद्दों पर ऊंघने और राजनीतिक प्रश्नों का अनमना जवाब देने वाली जनता देश और राजनीति की दीर्घकालीन दुरावस्था से आक्रोशित है।
इस जन जागरण में ही भाजपा के राष्ट्रीय व्याप, कांग्रेस की छीजन और क्षुद्र हितों से चिपके रह गए क्षेत्रीय क्षत्रपों का भविष्य छिपा है।