900 कलाकारों ने दिया मोदी को समर्थन
   दिनांक 21-अप्रैल-2019

लोकसभा चुनाव में इस बार फिर वामपंथी संगठनों ने असहिष्णुता की काठ की हांडी चढ़ाने की कोशिश की। वे नहीं जानते थे शायद कि काठ की हांडी बार—बार नहीं चढ़ती है। वामपंथी संगठनों ने इस बार 600 थिएटर से जुड़े कलाकारों की सूची जारी की जो चाहते हैं कि मोदी प्रधानमंत्री न बने। यह पत्र मीडिया में आने के चौबीस घंटे के अंदर फुस्स हो गया। वैसे इन वामपंथी कलाकारों का दावा यह है कि वे निष्पक्ष कलाकार हैं। बहरहाल इन 600 निष्पक्ष वामपंथी कलाकारों के जवाब में 900 कलाकारों ने हस्ताक्षर अभियान चलाकर एक बार फिर मोदी सरकार बनाने के लिए वोट देने की अपील की है.
मोदी का समर्थन करने वाले इन कलाकारोें में शास्त्रीय संगीत से पंडित जसराज, पंडित विश्व मोहन भट्ट, उस्ताद वसीफुद्दीन डागर, रिता गांगुली। शास्त्रीय नृत्य से सरोज वैद्यनाथन, डॉ. रंजना गौहर, पंडित राजेन्द्र गंगानी। सूफी गायक हंस राज हंस। कवि अर्जुन डांगले। लोक गायन से अनुराधा पोडवाल, मालिनी अवस्थी। वॉलीवुड से विवेक आबराय, राहुल रॉय, अनंत महादेवन, पल्लवी जोशी, पायल रोहतगी, कोएना मित्रा आदि हैं. इन्होंने किसी विचारधारा की वजह से नहीं बल्कि देश के प्रधानमंत्री के काम काज को देखने के बाद तय किया कि देश को मजबूत सरकार, मोदी ही दे सकते हैं।
बहरहाल बात चल रही थी वामपंथी कलाकारों की सूची की। वॉलीवुड में कांग्रेस के प्रचार में लगे ऐसे निष्पक्ष कलाकारों की सूचि में कल्कि कोचलिन, अनुराग कश्यप, मोहम्मद जिशान अयूब, वरूण ग्रोवर, कुणाल कामरा, अमोल गुप्ता अनुपमा चोपड़ा, तिग्मांशु धुलिया, विक्रमादित्य मोटवाने, स्वरा भास्कर, विनय शुक्ला, विशाल डडलानी, राजीव निगम, सयानी गुप्ता, नसीरूद्दीन शाह, अमोल पालेकर, गिरीश कर्नाड, उषा गांगुली जैसे वामपंथी कलाकार अपना नाम लिखा चुके हैं।
यहां उल्लेखनीय है कि इस कांग्रेस के पक्ष में जारी हुई इस वामपंथी सूची में वनवासी, वंचितों और अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के नाम तलाशने मुश्किल हैं। जबकि कांग्रेस का यह लोकप्रिय नारा रहा है, कांग्रेस का हाथ— आम आदमी के साथ। जबकि यह हाथ कभी गरीबों और वंचितों के साथ नजर नहीं आया।
 
देश में छह दशक तक कांग्रेस 'डीएनए वाली' सरकार रही और सरकार चाहे कोई भी हो, कांग्रेस का नारा हर बार एक ही रहा। कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ। उसके बावजूद जनता उस पर विश्वास करती रही। परिवर्तन की कोई राह दिखता न देखकर, यथास्थिति को जनता ने स्वीकार करना सीख लिया था। परिणाम यह हुआ कि देश में सांसद निधि में 20 से 40 फीसदी का दलाली को देश का आम आदमी स्वीकार कर चुका था। विकास कार्यो के लिए आवंटित राशि का 20—40 फीसदी हिस्सा लगभग हर एक सांसद का हिस्सा माने जाने लगा था। ऐसे भ्रष्ट शासन के साथ वाम विचार के कलाकार, लेखक, पत्रकार आसानी से अपनापन महसूस करने लगे थे। वामपंथी जामे में कांग्रेसी बनियान पहन कर घुमने वाले साहित्यकार, पत्रकार, कलाकारों की पहचान अब समाज में हो गई है। इसी का परिणाम है कि पिछली बार असहिष्णुता विमर्श को लेकर पूरे देश में कितना बवाल काटा गया था। इस बार असहिष्णुता की चिट्ठी पर कोई हलचल नहीं हुई।
पिछली बार भी बिहार में गैर भाजपा सरकार बनाने के लिए असहिष्णुता का षडयंत्र रचा गया था। जिसमें पुरस्कार लौटाने का इतना शोर करने के बावजूद एक साहित्यकार ने एक रूपया नहीं लौटाया। बाकि षडयंत्र की बात का खुलासा कुछ ही दिनों बाद उस वक्त हो गया था, जब राजद और जदयू गठबंधन की सरकार बनी। इसी गैर भाजपाई सरकार को बनाने के लिए असहिष्णुता का सारा खेल रचा गया था।
600 वामपंथी कलाकार जिन्होंने मोदी को वोट न करने की अपील की, उन सबकी पहचान समाज में जाहिर है। वामपंथ की नींव ही भाजपा के विरोध पर टिकी है। वह भारत में जिन्दा है भाजपा का विरोध करके। वामपंथी कलाकारों का भाजपा विरोध मोदी के पिछले पांच साल के कार्यकाल से नहीं उपजा यह समझना हो तो मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले इन विरोध करने वालों की स्थिति पर गौर कीजिए। आप पाएंगे, वे मोदी की सरकार बनने से पहले भी भाजपा और रा.स्व.संघ के विरोध में खड़े थे। कुछ बदला नहीं है सिर्फ शब्दों को छोड़कर।
यह वही वामपंथी कलाकार हैं जिन्हें गुजरात पर्यटन निगम का विज्ञापन अमिताभ बच्चन द्वारा किया जाना बहुत अखरा था। अनुराग कश्यप से लेकर कुणाल कामरा तक एक खास विचार से प्रेरित हैं। जिसे सारी ऊर्जा आरएसएस और बीजेपी के विरोध से मिलती है। इसलिए अब समाज में इनके लिखे और विरोध को कोई गम्भीरता से नहीं ले रहा। भारत के इतिहास में यह पहली बार जरूर हुआ कि थिएटर और फिल्म से जुड़े वामपंथी कलाकारों की साजिश का जवाब उनके ही क्षेत्र के लोगों ने दिया। वामपंथी षडयंत्र का जवाब भारतीय कलाकारों की तरफ से सामने आया। एक तरफ पांच साल की सतत कोशिशों के बाद 600 वामपंथी कलाकार मोदी के खिलाफ जुट पाए। जबकि तीन—चार दिनों में 900 भारतीय कलाकारों ने विचारधारा से उपर उठकर मोदी के साथ खड़े होने का निर्णय लिया।
 
भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में जल प्रबंधन से जुड़े मंत्रालय की बात की है और नदी ज़ोड़ने वाली परियोजना को आगे बढ़ाने की बात की है। यह पढ़कर दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत ने मोदी सरकार की तारीफ करते हुए कहा— ''इससे किसानों को तो फ़ायदा होगा ही, साथ ही ग़रीबी मिटाने में भी ये सहायक सिद्ध होगा।'' दक्षिण भारत में आम आदमी के बीच मोदी के समर्थन में की गई रजनीकांत की यह अपील, उन दर्जनों दक्षिण भारतीय वामपंथी कलाकारों के मोदी विरोध पर भारी पड़ गया। वामपंथी कलाकारों के विरोध को मीडिया ने भी गम्भीरता से नहीं लिया। यहां गौरतलब है कि रजनीकांत ने पूर्वाग्रह से भरकर मोदी के लिए कोई राय बनाने की जगह सरकार की नीतियों को जानने—समझने का प्रयास किया। उसके बाद उन्होंने राय बनाई।
जब आप 600 वामपंथी और 900 भारतीय कलाकारों की सूची का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे तो आप पाएंगे कि एक तरफ पूर्वाग्रह से भरा एक खास विचार से प्रेरित मोदी विरोधी गैंग है और दूसरी तरफ विविधता से भरा भारतीयता को प्रेम करने वाला, कला को समर्पित वे कलाकार हैं, जिन्हें मोदी से नहीं बल्कि देश से लगाव है। वे मोदी में देश का भविष्य देख रहे हैं। वे किसी खास विचारधारा से प्रेरित नहीं हैं। वे विविध क्षेत्र और संगठन से आते हैं।