हमेशा बलिदानियों का अपमान करती आई है कांग्रेस
   दिनांक 22-अप्रैल-2019
कांग्रेस को आजकल बलिदानियों की बहुत चिंता हो रही है| भोपाल की भाजपा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा के हेमंत करकरे पर दिए गए उनके निजी बयान के बाद कांग्रेस का यह “शहीद” प्रेम जागा है। चुनावी माहौल में बहुत सी बातें होती हैं, लेकिन कांग्रेस की सरकारों ने बलिदानियों के साथ जो व्यवहार किया है, वो दिल को कचोटता रहता है।
याद करें बाटला हाउस एनकाउंटर की। 2008 की बात है। इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी बाटला हाउस में छिपे हुए थे। सूचना मिलने पर पुलिस ने घेरा डाला। आतंकियों को मार गिराया। लेकिन इस कार्रवाई में पुलिस अधिकारी मोहन चंद शर्मा आतंकियों की गोली का शिकार हो गए। देश में शोक का वातावरण था। उसी समय कांग्रेस की सरकार में बैठे नेताओं ने मारे गए आतंकियों से सहानुभूति जतानी शुरू कर दी। पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। सलमान खुर्शीद ने बयान दिया कि बाटला हाउस में मारे गए आतंकियों के बारे में सुनकर सोनिया जी की आंखों में आंसू आ गए| रातभर नींद नहीं आई।
फिर जब 2016 में भोपाल की जेल से सिमी के आतंकी एक पुलिस कांस्टेबल का गला रेतकर भागे, और पुलिस ने उन्हें ढूंढकर मार गिराया तो कांग्रेस के बड़े नेता, राहुल गांधी के सलाहकार और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने पुलिस पर ऊंगुली उठाते हुए मीडिया में बयान दिया कि “मुझे समझ नहीं आता कि सिर्फ मुस्लिम आतंकी ही जेल से क्यों भागते हैं?” इस बयान के कई अर्थ हैं। एक अर्थ कांग्रेस द्वारा गढ़े गए “हिंदू आतंकवाद” के शिगूफे से भी है, जो दिग्विजय सिंह के शब्दों में “केवल मुस्लिम आतंकी ही....” से पता चलता है।
हिंदू आतंकवाद की इस अपनी इस थ्योरी में कांग्रेस सरकार और कांग्रेस के नेताओं ने भारत की सेना और सुरक्षाबलों को भी लपेट लिया। साल 2010 में मुंबई के एक पत्रकार अज़ीज़ बर्नी ने एक किताब लिखी ’26/11 आरएसएस की साज़िश’। मुंबई के ताज होटल , रेलवे स्टेशन, अस्पताल और अन्य कई ठिकानों पर 2008 में हुए हुए आतंकी हमले पर लिखी गई इस किताब में पाकिस्तान को क्लीनचिट देते हुए सारा इलज़ाम ‘हिंदू आतंकियों’ और देश के सुरक्षाबलों पर थोपा गया था। किताब में कहा गया था कि भारत के सुरक्षाबलों ने ही विदेशी ताकतों के साथ मिलकर भारत के नागरिकों पर ये हमला किया। इस किताब का उदघाटन करने कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और महाराष्ट्र कांग्रेस के नेता गए थे। क्या ये आतंकी कसाब को पकड़ते हुए शहीद हुए मुंबई पुलिस के कांस्टेबल तुकाराम ओम्बले और ताज होटल में आतंकियों को मारते हुए बलिदान होने वाले एसपीजी के मेजर उन्नीकृष्णन का अपमान नहीं था? क्या ये देश के लिए बलिदान देते आ रहे सैनिकों और सुरक्षाबलों का अपमान नहीं था? पर तुष्टिकरण के फेर में कांग्रेस ने सब कुछ ताक पर रख दिया।
कांग्रेस की सरकारों का देश की सीमा पर जान देने वाले हमारे जवानों के प्रति क्या रवैया रहा है इसकी दिल चीर देने वाली मिसालें हैं। 1971 का युद्ध हमारे सैनिकों के शौर्य और बलिदान की अमिट गाथा है। भारत की सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में (अब बंगलादेश) अत्याचार- बलात्कार कर रही पाकिस्तानी सेना के घुटने टिकवा दिए। 90 हजार पाकिस्तानी फौजियों ने हमारी सेना के सामने आत्मसमर्पण किया। इन सब फौजियों को इंदिरा सरकार ने पाकिस्तान को लौटा दिया, लेकिन पाकिस्तान के पास बंदी हमारे बहादुर जवानों की सुध नहीं ली। वो आज भी पाकिस्तान की जेलों में यातना भोग रहे हैं| उनके परिवारजन उनकी रिहाई के लिए आज भी भटक रहे हैं, और पाकिस्तान उनके अस्तित्व से ही इनकार करता आ रहा है। ये लोग विंग कमांडर अभिनंदन की तरह भाग्यशाली नहीं थे।
1971 के युद्ध के महानायक फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की भी घोर उपेक्षा कांग्रेस की सरकारों ने की। 2008 में जब भारत के इस महान सेनापति ने अपनी अंतिम सांस ली, तब तत्कालीन कांग्रेस सरकार के एक भी मंत्री को उनके अंतिम संस्कार में जाने का समय नहीं मिला। इंदिरा के पिता भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पंडित नेहरु ने अपनी जिद के चलते सेना को संसाधन मुहैया नहीं करवाए। हथियार, गरम कपड़े और दूसरी जरुरी चीज़ों से विहीन रखा। परिणाम ये हुआ कि जब चीन ने हमला किया तो हमारे जवान खाली हाथ थे। शून्य से नीचे के तापमान में ठिठुरते, गोला-बारूद की कमी से जूझते हमारे जवान लड़ते रहे। अपनी जान लुटाते रहे। चीन युद्ध की रिपोर्ट करते हुए अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका टाइम्स ने लिखा था कि “भारत के सैनिकों के पास साहस के अलावा हर चीज़ की कमी है।”
कांग्रेस का ये रवैया कभी नहीं बदला। इंदिरा गाँधी के समय से सेना वन रैंक वन पेंशन की माँग करती आई थी, जिसे कांग्रेस ने कभी पूरा नहीं किया| यूपीए के दस सालों के शासन में सेना हथियार, गोलाबारूद और लड़ाकू विमानों की मांग करती रही। खुद जेड प्लस सुरक्षा में घूमने वाले कांग्रेस के नेताओं ने सत्ता में रहते सैनिकों को बुलेटप्रूफ जैकेट मुहैया नहीं करवाए। राफेल विमान की खरीद को पूरे दस साल लटकाए रखा| और अब, जब उसका सौदा हो गया तो उसमें रोड़े अटकाते घूम रहे हैं। राफेल मामले में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कोर्ट का नाम ले-लेकर झूठ बोल रहे हैं। प्रधानमंत्री को चोर बोल रहे हैं, और कोर्ट से फटकार पड़ने पर माफ़ी मांग रहे हैं। कांग्रेस सरकारों के द्वारा किए गए रक्षा सौदों में सदा दलाली की दुर्गंध आती रही। मुक़दमे चलते रहे| अब आम चुनाव में, जनता की भंगिमा देखकर, कांग्रेस को बलिदानी याद आ रहे हैं।
बलिदानियों की बात करते हुए भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खां, रौशन लाहिड़ी, रामप्रसाद बिस्मिल, मदनलाल धींगरा जैसे हजारों बलिदानियों को भी याद करना होगा जिन्हें आज़ादी के बाद षडयंत्रपूर्वक भुला दिया गया, और देश की सड़कें, चौराहे, सरकारी भवन, हवाई अड्डे,पार्क, अस्पताल, कॉलेज, कला संस्थान, सरकारी योजनाएं एक परिवार विशेष के नाम कर दिए गए।