उबल रहा ग्वादर का समंदर
   दिनांक 24-अप्रैल-2019
-ग्वादर से पुलन ग्वादरी   
चीन की आर्थिक-सैनिक महात्वाकांक्षा के कारण ग्वादर के लोगों का जीना मुहाल है। चीन के लाखों लोग यहां डेरा जमाए हुए हैं, जबकि बलूचों को भागने के लिए मजबूर किया जा रहा है। निर्माण गतिविधियों के कारण ग्वादर के समुद्र से झींगा गायब हो गई हैं। इन्हीं के बूते पेट पाल रहे मछुआरे बड़ी संख्या में पलायन कर चुके हैं। लेकिन काफी लोगों ने वहीं रहकर पाकिस्तान-चीन के जुल्मों के खिलाफ आवाज बुलंद करने का फैसला किया है।
ग्वादर में हो रहे विकास कार्यों से बलूचों को वंचित रखा जा रहा है, जिसके लिए वे संघर्ष कर रहे हैं
ग्वादर का नाम लेते ही मन में खास तरह का अक्स उभरता है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के मुहाने के पास का एक बंदरगाह जो चीन के 62 अरब डॉलर की परियोजना 'वन बेल्ट वन रोड' की जान है। एक ऐसा बंदरगाह जिस पर काबिज ताकत दुनिया पर अपना दबदबा बना सकती है, क्योंकि समुद्री रास्ते से होने वाले तेल कारोबार का एक तिहाई व्यापार इसी रास्ते से होता है। ऐसा बंदरगाह जहां पैर जमा रहे चीन के मुकाबले के लिए इससे महज 172 किलोमीटर की दूरी पर ईरान के चाबहार में भारत एक बंदरगाह बना रहा है। इससे इतर भी ग्वादर की एक पहचान है जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है। वह है, यहां रहने वाले बलूचों के साथ हो रहा जुल्म। चीन की परियोजना के लिए ग्वादर के लोगों को रोजी-रोटी से महरूम किया जा रहा है। स्थिति यह है कि कई बलूच बस्तियां खाली हो चुकी हैं। जो रह गए हैं, उन्होंने अपने हक के लिए लड़ने का फैसला किया है और वे आए दिन सड़कों पर आवाज बुलंद कर रहे हैं।
कुछ ही समय पहले नए ग्वादर अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के सिलसिले में बड़ा जलसा हुआ था, जिसमें पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम इमरान खान भी शरीक हुए थे। उन्होंने बलूचों को भरोसा दिया था कि उनकी हुकूमत लोगों का ख्याल रखेगी और वैसा कुछ भी नहीं होने देगी, जिससे मछुआरों की रोजी-रोटी में कोई मुश्किल आए। उन्होंने साफ लफ्जों में कहा था कि मछुआरों के लिए अलग से चैनल बनाया जाएगा। मछली पकड़कर पेट पालने वाले चाचा करीम बख्श कहते हैं, ''मालूम नहीं, इमरान साहब किन मछुआरों की हिफाजत की बात कर रहे हैं। अब तक तो ऐसा नहीं हुआ। वे कहते हैं कि स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी का जरिया बरकरार रखा जाएगा, लेकिन कैसे? ग्वादर के समंदर में झींगा पाई जाती थी, लेकिन समंदर में हो रहे कंस्ट्रक्शन और बड़े-बड़े ट्रॉलरों की वजह से ये अमूमन गायब हो चुकी हैं। अगर मशक्कत कर इन्हें पकड़ें भी तो इससे पेट नहीं पाल सकते, क्योंकि इनकी तादाद बहुत कम है।'' गौरतलब है कि ग्वादर में रहने वाली बलूच जातियां सदियों से मछली पकड़कर गुजारा करती रही हैं। ऐसा भी नहीं कि ग्वादर कोई नया बंदरगाह हो। कश्तियों के लिए कुदरती तौर पर मुफीद होने की वजह से समुद्र से माल-असबाब लाने-ले जाने का काम सैकड़ों सालों से होता रहा है। अग्रेजों ने इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया में इस बात का जिक्र किया है कि हिन्दू और 'खोजा', जिन्हें यहां के लोग लोटिया कहते थे, के साथ अच्छा-खासा कारोबार होता था। गजट के मुताबिक, 1903 में करीब 5.5 लाख का सामान बाहर गया, जबकि 2 लाख का आया।
यह पूछने पर कि ग्वादर के विकास कार्य से स्थानीय लोगों को महरूम क्यों रखा जा रहा है, करीम बख्श कहते हैं, ''वे जोरावर हैं। हुक्मरान हैं। जैसा चाहेंगे, करेंगे। ग्वादर से लेकर डेरा गाजी खान तक पाकिस्तान की ताकत, उसकी तशद्दुद (हिंसा) के नमूने हर जगह मिल जाएंगे। आवाज बुलंद करने वाले हजारों लोगों का कत्ल किया जा चुका है। बेहिसाब लोग पाकिस्तान के यातनागृहों में कैद हैं। हकीकत यह है कि वे चाहते हैं कि बलूच इस इलाके को छोड़ दें। वे जो विकास कार्य कर रहे हैं, उसमें हमारे लिए कोई गुंजाइश नहीं है। वे इस बात के फिक्रमंद नहीं कि सदियों से समंदर से कमाने-खाने के हमारे नस्ली हक की हिफाजत कुदरती इंसाफ का तकाजा है।'' पाकिस्तानी जुल्म-जबरदस्ती का ही नतीजा है कि कई बस्तियां काफी हद तक खाली हो चुकी हैं। ऐसी ही एक बस्ती है कोलांच। यहां रहने वाले मुशान अहमद कहते हैं, ''बाहर कितना जानते हैं, यह नहीं मालूम। पर यहां तो सबकुछ खुलेआम हो रहा है। पाकिस्तान फौज स्थानीय लोगों को उनकी जमीन से बेदखल कर रही है। उन्हें दूसरी जगह जाने के लिए मजबूर कर रही है। कोलांच, गश्त जैसे तमाम इलाके जहां सैकड़ों साल से बलूचों की बस्तियां थीं, वे खाली हो चुकी हैं। सब अस्त-व्यस्त हो गया है। पूरी आबादी दूसरी जगहों पर जा चुकी है। यहां से लेकर क्वेटा तक चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा से सटे इलाकों में रह रहे लोगों को उनके घरों से बेदखल कर दिया गया है।'' ग्वादर में ऐसे लोगों की तादाद अधिक है, जो पाकिस्तान के जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं। इसी वजह से यहां हमेशा मछुआरे जुलूस निकालकर नाराजगी का इजहार करते दिखते हैं। मजबूरी में बंदरगाह पर तमाम छोटे-छोटे काम कर रहे मछुआरे अक्सर काम बंद कर देते हैं। कुछ समय पहले भी ऐसा ही हुआ। बड़ी तादाद में मछुआरों ने जुलूस निकाला और कामकाज ठप कर दिया। इसके बाद ग्वादर बंदरगाह के अधिकारी और सूबे की हुकूमत के नुमाइंदों ने मछुआरों से कई दौर की बातचीत की। इसके बाद यह घोषणा की गई कि मछुआरों की सभी मांगें मान ली गई हैं। मछुआरों की बड़ी मांग थी कि 200 फीट चौड़ा अंडरपास बनाया जाए, ताकि उनकी कश्तियां समुद्र में जा सकें। लेकिन बाद में जब पाकिस्तान और चीन के अफसरों के साथ मछुआरों के नुमाइंदों की बैठक हुई तो 200 फीट की जगह 20 फीट के अंडरपास का खाका रख दिया गया। जाहिर है, इतने छोटे रास्ते से बड़ी कश्ती लेकर समुद्र में जाना मुमकिन नहीं था। लिहाजा मछुआरों ने पेशकश ठुकरा दी। करीम बख्श कहते हैं, ''वे ढोंग करते हैं। गौर करने वाली बात है कि अगर उनमें जरा भी सलाहियत होती तो क्या हमारे लिए पीने का पानी नहीं होता? यहां काम कर रहे लाखों पाकिस्तानियों और चीनियों को तो पीने का पानी हासिल है। 5 लाख चीनियों के लिए नया शहर बसाया जा रहा है। उनके लिए पानी की कमी नहीं तो फिर हमें क्यों नहीं? उन्हें इलाज की सुविधा है, हमारे लिए क्यों नहीं? क्या अस्पताल नहीं होना चाहिए? शिक्षा तो इनसान का बुनियादी हक है। हमारे बच्चों को यह सहूलियत क्यों नहीं मिलनी चाहिए? जहां पर हम अपनी कश्तियां खड़ी करते हैं, वहां पर नया एक्सप्रेस-वे बनने जा रहा है और इस वजह से हमें वहां से भी बेदखल किया जा रहा है। क्या करें हम? अपनी ही सरजमीं से बेदखल हो जाएं?''
ग्वादर के बारे में अमेरिका सहित पूरी दुनिया को मालूम है कि यह चीन की सैन्य परियोजना है, जो कारोबारी शक्ल में है। जमाल बलोच कहते हैं, ''चीन इस वजह से पाकिस्तान के सफे में खड़ा है क्योंकि वह ग्वादर की अहमियत जानता है। आज नहीं, सदियों से इस मुकाम पर आने के लिए विभिन्न लोगों ने कोशिशें कीं, लेकिन हर वक्त वे नाकाम हुए, क्योंकि बलूचों ने हर बार उनका विरोध किया। बलूचों ने उन्हें अपनी सरजमीं से ताकत के बूते बाहर निकाला। इसकी मिसाल पुर्तगाली हैं, जिन्हें हमने भागने के लिए मजबूर कर दिया। सिकंदर जब बलूचिस्तान में पहुंचता तो यहीं शिकस्त खाकर वापस लौटा। हम जद्दोजहद करते रहेंगे।'' पाकिस्तान और चीन की फौज ग्वादर में मौजूद हैं। चीन यहां नौसेना अड्डा बना रहा है। वह अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ सैन्य ताकत भी बढ़ा रहा है। चीन यह सब क्यों कर रहा है? दरअसल, चीन अन्य देशों की घेराबंदी के उद्देश्य से ऐसा कर रहा है। चूंकि दुनिया की जरूरत का 30 प्रतिशत तेल इसी इलाके से गुजरता है, इसलिए चीन इस मार्ग पर दबदबा बनाना चाहता है।