‘‘राष्ट्रीय हित और सैद्धांतिक राजनीति पर हम चट्टान की तरह अडिग हैं’’
   दिनांक 27-अप्रैल-2019
 11 अकबर रोड। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का निवास। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, जिनके बारे में कहा जाता है कि वह न रुकते हैं, न थकते हैं। लोकसभा चुनावों की भारी व्यस्तता के मध्य उन्होंने पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर  से चुनावी समीकरणों, गठबंधन राजनीति, राजनीति में परिवारवाद, भाजपा में वरिष्ठ नेताओं पर निर्णयों और नागरिकता (संशोधन) विधेयक जैसे अनेक ज्वलंत मुद्दों पर विस्तृत बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के संपादित अंश-
तीन चरणों के चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी के प्रति देश के लोगों के उत्साह को कैसा पाते हैं आप?
देखिए, मत की अभिव्यक्ति अब हो रही है लेकिन भाजपा का प्रचार अभियान छह महीने पहले से ही जारी था। मैं लगातार देशभर में घूम रहा हूं, कार्यकर्ताओं से मिल रहा हूं और आम लोगों के बीच जाकर मिलता हूं तो भारतीय जनता पार्टी के प्रति एक अभूतपूर्व लहर के दर्शन होते हैं। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को फिर से प्रधानमंत्री बनाने के लिए देश के सभी हिस्सों में एक प्रचंड लहर देखने को मिल रही है। इसकी अभिव्यक्ति स्पष्ट रूप से तीन चरणों के चुनाव में दिखाई पड़ती है और आने वाले चरणों में यह अभिव्यक्ति मुखर होगी। मैं आशा करता हूं कि भारतीय जनता पार्टी और राजग पहले के चुनाव से भी ज्यादा बहुमत के साथ यह चुनाव जीतेंगे।

विरोधी कह रहे हैं कि भाजपा अपने काम की बजाय पाकिस्तान और राष्ट्रभाव के नाम पर चुनाव लड़ रही है!
यह विरोधियों की छटपटाहट है। पांच वर्ष के सुशासन के बाद हम कह सकते हैं कि जितना काम भाजपा ने इस दौरान किया, वह अभूतपूर्व है। लोगों के जीवन में, देश के बुनियादी ढांचे में और भारत के बारे में दुनिया की सोच में बहुत बड़ा सकारात्मक अंतर आया है।
पाकिस्तान और आतंकवाद को जैसी प्रतिक्रिया इस दौरान मिली, वह जरूरी थी। यह बात किसी और देश से ज्यादा भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा की है। रही बात देशभक्ति की तो हमारा मानना है कि यह देश के लिए, लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। देशभक्त नागरिकों के बिना देश की कल्पना कैसी?
आपने कहा कि भारतीय जनता पार्टी और राजग पहले के चुनाव से भी ज्यादा बहुमत के साथ यह चुनाव जीतेंगे। यह भावनात्मक आशा है या इसका कोई तार्किक आधार भी पाते हैं?
देखिए, भावना से जनसमर्थन नहीं मिलता। जनसमर्थन सरकार के ठोस कामों से मिलता है। इसलिए मैं आपको बताना चाहता हूं कि देश की सुरक्षा के बारे में नरेंद्र मोदी जी ने एक भरोसा खड़ा किया है। आज आम लोग मानते हैं कि इस शासन में देश सुरक्षित है। दूसरा 50 करोड़ गरीबों में एक आशा का संचार देखा गया है। 22 करोड़ परिवारों को लाभ मिला है। जैसे सात करोड़ परिवारों को गैस सिलेंडर मिला है, आठ करोड़ लोगों को शौचालय मिला है, ढाई करोड़ लोगों को घर मिला है, दो करोड़ पैंतीस लाख लोगों को घर में बिजली मिली है, 50 करोड़ लोगों को आयुष्मान भारत जैसी योजना का फायदा मिला है, 19 हजार गांव ऐसे थे जहां 70 साल से बिजली नहीं पहुंची थी, इस सरकार ने वहां बिजली पहुंचाने का काम कर दिखाया है। इसलिए मोदी सरकार ने स्पष्ट रूप से ढांचागत एवं गरीबी दूर करने के लिए अंत्योदय के सिद्धांत के आधार पर अनेक काम किए हैं, जो निस्संदेह निचले स्तर तक न केवल पहुंचे हैं बल्कि उन्हें फायदा मिला है। साथ ही पूरी दुनिया में भारत के गौरव को स्थापित करने में यह सरकार सफल हुई है।
यह सब 2014 के बाद हुआ, किन्तु क्या इससे पहले कुछ नहीं हुआ?
हुआ, किन्तु पूर्व की सरकार और इस सरकार में अंतर है। 2014 के पहले दस साल तक देश में संप्रग की सरकार रही। इस दौरान दुनिया में देश का गौरव रसातल में पहुंचता गया। आजादी के बाद पहली बार देश की जनता को लगता है कि एक ऐसा प्रधानमंत्री आया है जो 125 करोड़ लोगों के लोकतंत्र को दुनिया में उचित सम्मान दिला पाया है। इसके अलावा देश के अर्थतंत्र को चुस्त-दुरुस्त करने में सफलता मिली है। अटल जी देश के अर्थतंत्र को विश्व की अर्थतंत्र की सूची में 11वें नंबर पर छोड़कर गए थे, मनमोहन सिंह के दस साल के शासन में वह अर्थतंत्र एक भी नंबर नहीं बढ़ा। जबकि नरेंद्र मोदी जी के पांच साल के शासन में हम 11 नंबर से से छह नंबर पर पहुंचे हैं। अन्य कच्चे आंकड़े जब सितंबर में पूरे होंगे तब हम विश्व की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो जाएंगे। इससे देश को तो फायदा हुआ ही है, जनता की अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं। जनता चाहती है कि दुनिया में भारत महाशक्ति के रूप में जाना जाए। हम इस दिशा में लगातार आगे बढ़ रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले आपने देखा कि शक्ति मिशन के तहत लाइव सैटेलाइट मार गिराने का जो परीक्षण हुआ, इससे देश की जनता में यह विश्वास जगा है कि हम भी विश्व महाशक्ति बन सकते हैं। इन सभी चीजों की अभिव्यक्ति मतदान में हो रही है। मैं इस दृश्य को स्पष्ट देख रहा हूं, देश का प्रत्येक वर्ग, चाहे वह गरीब हो, मध्यम वर्गीय हो, उच्च हो—सभी में राष्ट्रीय आकांक्षा और चेतना की एक समान लहर दिखाई दे रही है।
चुनाव आने पर हर सरकार अपने मुद्दे, उपलब्धियां, योजनाएं गिनाती है। क्या आप इससे इतर कोई राजनीतिक कारक जैसे, (विकल्प हीनता) भी देखते हैं, जिसके चलते नरेंद्र मोदी के प्रति लहर है?
मैं नहीं मानता कि यह लहर विकल्पहीनता के कारण है। यह सकारात्मक लहर है। देखिए, सरकार के काम गिनाना एक बात है, सरकार के काम का अनुभव कराना दूसरी बात है। मोदी सरकार ने मतदाता को अपने कामों का अनुभव कराया है और यहां से जो भरोसा जगा है, वही लहर, जनज्वार रूप में दिखाई पड़ रहा है।
तीन चरणों के चुनाव के बाद मतदान कम होने को आप कैसे देखते हैं? गाजियाबाद, नागपुर जैसी आपकी मजबूत सीटों से भी मतदान कम होने के समाचार आए हैं।
मुझे स्पष्ट रूप से लगता है कि विपक्ष के समर्थक मतदाता हताशा में हैं। इसके कारण मतदान का फीसद कुछ कम हुआ है। भाजपा को समझने, इस सरकार के कार्य को पसंद करने वाले मतदाता जोर-शोर से मतदान कर रहे हैं।
 
बेंगलुरू दक्षिण से आपने एक युवा तेजस्वी सूर्य को टिकट दिया। भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार रहे स्व. अनंत कुमार की सीट होने से सहज भाव से माना जा रहा था कि उनकी पत्नी, जो कि सामाजिक क्षेत्र में काम करती हैं, एक दावेदार हो सकती थीं। किन्तु भाजपा ने यहां से तेजस्वी पर दांव लगाया। क्या पार्टी ने इसके जरिए कोई संदेश देने की कोशिश की है?
देखिए, परिवार के लोग भी हमारे ही कार्यकर्ता हैं, इसलिए ऐसी कोई बात नहीं है। लेकिन परिवार के बाद उनके ही परिवार से किसी को लाने की परंपरा को थोड़ा रोकने का सफल प्रयास हमने किया है। भाजपा ने स्व. अनंत कुमार जी की पत्नी को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया है और संगठन की जिम्मेदारी दी है। रही बात तेजस्वी सूर्य की तो वे एक युवा कार्यकर्ता हैं। विचारधारा के आधार पर अभाविप, भाजपा के साथ काम करते-करते आगे आए हैं। तो हमने युवाओं को आगे बढ़ाने का एक प्रयोग किया है और मुझे लगता है कि हम इसमें सफल होंगे।
 
आपने परिवारवाद की कोशिश को रोकने की बात की, इस बार पार्टी के संस्थापक सदस्य भी चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। उनकी भूमिका और योगदान को आप कैसे देखते हैं?
देखिए, यह निर्णय किसी एक नेता के लिए नहीं हुआ है। 75 वर्ष के ऊपर के 22 ऐसे नेता थे, जिन्हें टिकट नहीं दिया गया है। तो यह निर्णय सबके लिए समान है। पार्टी ने तय किया है कि 75 के ऊपर जिनकी आयु है, उनको अब चुनावी राजनीति में नहीं जाना चाहिए। पार्टी में और भी बहुत सारे दायित्व होते हैं तो उनका भी उपयोग होगा। इसलिए यह फैसला किसी नेता या समूह के लिए हो, ऐसा नहीं है।
पश्चिम बंगाल से अच्छे मतदान की खबरें आई हैं। लेकिन इस बार पिछली बार से भी अधिक हिंसा के समाचार आ रहे हैं। इन दोनों बातों को आप कैसे देखते हैं?
लंबे समय तक साम्यवाद की राजनीति और सत्ता होने के कारण राज्य की संस्कृति में हिंसा का ताना-बाना बुना गया है। पर अब राज्य में भारतीय जनता पार्टी का लोकप्रियता की दृष्टि से उदय होने के कारण यह धीरे-धीरे कम होता जाएगा, मैं ऐसी आशा करता हूं। दूसरी बात, इस बार हम बंगाल के अंदर 23 से ज्यादा सीटों पर विजयी होंगे और भाजपा मजबूत और नंबर एक पार्टी बनकर स्थापित होगी।
ओडिशा के बारे में क्या आकलन है आपका ?
ओडिशा में भी हमारी लोकप्रियता आप देख ही रहे हैं। मैं वहां लगातार रैली, रोड शो कर रहा हूं। इससे मुझे अनुभव हुआ है कि ओडिशा की जनता भी बहुत बड़े परिवर्तन की ओर अग्रसर है और भाजपा के पक्ष में निर्णय कर चुकी है।
2014 के लोकसभा चुनाव में बात चाहे गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश की हो, भाजपा ने इन राज्यों में अधिकतर सीटें जीती थीं। इस बार के चुनाव में उन्हें बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण है?
बिल्कुल चुनौतीपूर्ण है। लेकिन मुझे भरोसा है कि हम इस चुनौती को पार करेंगे और फिर एक बार जो हमारी ताकत बनी है, उसको व्यवस्थित करते हुए नए क्षेत्रों को भी साथ में जोड़ेंगे।
कुछ स्थानों से उतार-चढ़ाव की खबरें हैं। आपका मानना है कि ओडिशा के अलावा कई ऐसे राज्य हैं, जहां से भाजपा को मजबूती मिलती दिखाई दे रही है। आपको कहां-कहां से अधिक मजबूती मिलती दिखाई दे रही है?
देखिए, अकेले ओडिशा ही नहीं, पूर्वोत्तर में हमारी सीटें बढ़ रही हैं। बंगाल और कर्नाटक में भी हमारी सीटें बढ़ेंगी। इसके अलावा केरल में सीटें बढ़ने वाली हैं। भाजपा यहां (केरल) चार सीटों पर अच्छा चुनाव लड़ी है। ऐसे में इसका असर जरूर देखने को मिलेगा और एक अच्छी शुरुआत होगी।
आप उत्तर से दक्षिण तक संभावनाएं देख रहे हैं। इन संभावनाओं के बरअक्स कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा, बिहार में राजद-कांग्रेस ने गठबंधन किया है। इस तालमेल को आप कैसे देखते हैं?
आप अगर पुराने लिहाज से देखेंगे तो एक स्तर पर यह गठबंधन मायने रखता है। लेकिन अब यानी 2014 के बाद जितने भी चुनाव हुए उनमें स्पष्ट रूप से दिखा है कि दो नेताओं के ‘ड्राइंग रूम’ में बैठने से मतदाता अपने आपको उनके इशारे पर बदल देगा, अब यह संभव नहीं है। जातिवाद, तुष्टीकरण और परिवारवाद की राजनीति समाप्त हो गई है। राजनीति में काम के प्रदर्शन के युग की शुरुआत हो चुकी है और मैं मानता हूं कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, असम, मणिपुर, त्रिपुरा इसके उदाहरण हैं। जहां कभी भाजपा को एक या दो फीसद वोट मिलता था, वहां आज पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार है। यह सब बताता है कि जनता ने राजनीति के जरिए विकास के प्रदर्शन को तरजीह दी है और परिवारवाद, जातिवाद और तुष्टीकरण की राजनीति को नकारा है। जब ये तीनों नासूर थे तब तो गठबंधन में एक पर एक होता था। मगर मैंने कई बार कहा है और फिर से बोल रहा हूं ‘पॉलिटिक्स’ ‘फिजिक्स’ नहीं ‘कैमिस्ट्री’ होती है। जब दो पदार्थ एकत्र होते हैं तो तीसरा पदार्थ बनता है।
आप अपने भाषणों में लगातार नागरिकता (संशोधन) विधेयक का उल्लेख कर रहे हैं। लेकिन कहीं न कहीं इसे लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। क्या इसका कुछ असर दिख रहा है आपको ?
देखिए, नागरिकता (संशोधन) विधेयक हमारी सैद्धांतिक प्रतिबद्धता है। हम मानते हैं कि आस-पास के देशों में मजहबी प्रताड़ना के आधार पर वहां के धार्मिक अल्पसंख्यक जो यहां पर आए हैं, उनको घुसपैठिया नहीं मानना चाहिए। वे शरणार्थी हैं। वे स्वधर्म और स्वमान की रक्षा के लिए यहां आए हैं। इसलिए भारत का दायित्व है उनको शरण देना। और हम उनको नागरिकता देने के लिए अडिग हैं। राष्ट्रीय हित और सैद्धांतिक राजनीति पर हम चट्टान की तरह अडिग हैं। इसलिए जैसे ही राज्यसभा में हमारा बहुमत होगा, हम इस बिल को पारित करेंगे।
2014 में आम से लेकर खास तक यानी सभी कह रहे थे कि मोदी लहर है। आज के संदर्भ में, आपको भी लगता है, लहर है?
प्रचंड लहर है और देश की जनता पुन: नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाने का तय कर चुकी है। 23 मई को इसका जवाब मिल जाएगा।
विपक्ष बार-बार ईवीएम को मुद्दा बना रहा है। क्या कहेंगे आप इस पर?
मेरा इस पर इतना ही कहना है कि विपक्ष को फिर तीन राज्यों में शपथ क्यों लेनी चाहिए थी? अगर ईवीएम गलत है तो फिर जो जीत ईवीएम से हुई है, उसे स्वीकार न करते। यानी जहां जीतते हैं वहां ईवीएम ठीक है, जहां हारते हैं, वहां ईवीएम ठीक नहीं है। और अभी तो मतगणना शुरू भी नहीं हुई, अभी से वे अपनी पराजय मान चुके हैं। इसलिए पहले चरण से ही उन्होंने यह बहाना निकालना शुरू कर दिया।
 
आपके चुनाव लड़ने के बाद यह कयास आम है कि आप केन्द्रीय मंत्रिमंडल में आ जाएंगे। ऐसे में पार्टी अध्यक्ष पद के लिए कुछ सोचा है क्या?
ऐसा कोई भी फैसला व्यक्ति नहीं करता, पार्टी करती है। और जहां तक मेरे लोकसभा चुनाव लड़ने का सवाल है तो मैं पांच बार विधायक रहा हूं और जनता के बीच से ही सदन में गया हूं। लेकिन जब मेरा विधायक का कार्यकाल समाप्त हुआ तब लोकसभा का चुनाव नहीं था, इसलिए राज्यसभा के माध्यम से मैं सदन में गया। अब जब लोकसभा का चुनाव आया है तो स्वाभाविक रूप से मैं लोगों के बीच से जाना पसंद करूंगा और पार्टी ने इसकी अनुमति दी है।
 
(पूरा साक्षात्कार पढ़ने के लिए देखें पाञ्चजन्य का आगामी अंक)