चुनावी फायदे के लिए देश के संवेदनशील जनजातीय क्षेत्रों को आग में झोंकने की तैयारी में राहुल गांधी
   दिनांक 28-अप्रैल-2019
ध्यान से देखने पर समझ आता है कि 2014 के बाद से ही इस तरह का बारूद बिछा रहे अनेक स्लीपर सेल अब कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। राहुल का बयान भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है।
अभी-अभी वो सर्वोच्च न्यायालय से माफ़ी मांगकर फुर्सत हुए हैं। झूठ बोलने पर अदालत से फटकार खाई है। लेकिन क्या वो सुधरे हैं? नहींं। क्योंकि ये उनकी आदत है। राहुल गाँधी बेबुनियाद बातें बेहिचक बोलते हैं। चुनावी फायदे के लिए अपने झूठों से देश की एकता और शांति पर चोट करने से भी गुरेज़ नहीं करते।
 
23 अप्रैल को राहुल गांधी चुनावी सभा को संबोधित करने मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में पहुंचे थे। शहडोल लोकसभा जनजातीय बहुल आरक्षित सीट है। कांग्रेस अध्यक्ष अपनी पूरी रौ में थे। प्रधानमंत्री मोदी का जिक्र करते हुए बोले “नरेन्द्र मोदी ने नया क़ानून बनाया है। आदिवासियों के लिए क़ानून बनाया है जिसमें लिखा है कि आदिवासियों को गोली से मारा जा सकेगा। क़ानून में लिखा है कि आदिवासियों पर आक्रमण होगा। आपकी जमीन लेते हैं फिर कहते हैं कि आदिवासियों को गोली मारी जा सकती है।” इस तरह सफ़ेद झूठ बोलकर जातीय तनाव भड़काने की कोशिश राहुल गांधी ने की। उन्होंने जनजातीय समाज में सरकार और संसद दोनों के प्रति अविश्वास पैदा करने का प्रयास किया। ये अत्यंत गंभीर बात है।
कांग्रेस अध्यक्ष ने वही बात की, जो नक्सली अपने लाल पर्चों में करते हैं। वास्तव में राहुल गांधी ने माओवादी उग्रवाद के सुर में सुर मिलाया है। वो गैरगंभीर राजनेता तो हैं ही, लेकिन अब खतरनाक किस्म के दुस्साहसों में मशगूल होते जा रहे हैं। देश के जनजातीय क्षेत्रों पर अनेक अराष्ट्रीय शक्तियाँ नज़र गडाए हुए हैं। यहां देश के संविधान को अमान्य करने, देश की प्रशासन व्यवस्था को अमान्य करने संबंधी दुष्प्रचार वामपंथी धड़े पहले से ही कर रहे हैं। हिंसा भड़काने की सुनियोजित कोशिशें जारी हैं। ऐसे में कांग्रेस के सर्वोच्च नेता द्वारा इस प्रकार का बयान देना आग में पेट्रोल डालने जैसा है। आश्चर्य है कि इतना संगीन मामला राष्ट्रीय मीडिया से भी गायब है। आज सोशल मीडिया के कारण ख़बरें आग की तरह फैलती हैं, और उससे भी तेजी से फैलती हैं अफवाहें। सुनियोजित तरीके से फैलाए जाने वाले झूठे बयान। राहुल की इस सभा में शहडोल के कांग्रेस प्रत्याशी को स्थानीय गोंगपा याने गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने भी अपना समर्थन दिया है। जब राहुल मंच से ये सब बातें कह रहे थे तब गोंगपा के प्रत्याशी भी मंच पर मौजूद थे। गोंगपा भी जनजातीय समाज के बीच इसी तरह के नकारात्मक और भड़काऊ प्रचार के लिए जानी जाती है।
कहते हैं झूठ के पाँव नहीं होते, लेकिन राहुल गांधी को देखकर लगता है कि झूठ की जुबान बहुत लंबी होती है। वो सर्वोच्च न्यायालय के मुंह में अपना झूठ डाल देते है। फ़्रांस के राष्ट्रपति के मुंह में अपना झूठ डालते हैं, वो भी लोकसभा में खड़े होकर पकड़े जाते हैं। बेनकाब होते हैं, पर उन्हें रत्तीभर भी शर्म नहीं आती।
दरबारियों और खानदान के सेवादारों से घिरे, राहुल गांधी की राजनैतिक समझ संभवतः असत्य भाषण तक ही सीमित है। भारत की राजनीति में इससे से ज्यादा गैरजिम्मेदार नेता शायद ही कोई हुआ होगा। राहुल की बातें सिर्फ उनकी पार्टी के हित-अहित तक सीमित हों तो उन्हें नज़रंदाज़ किया जा सकता है, लेकिन सत्ता से दूर होने की छटपटाहट में उन्होंने सब कुछ ताक पर रख दिया है| वो “टुकड़े-टुकड़े” गिरोह के साथ सहानुभूति जताने जेएनयू पहुंचे थे। वो शहरी नक्सलियों के समर्थन में खुलकर सामने आए थे| उनकी पार्टी के राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेता कश्मीरी अलगाववादियों से सहानुभूति जतलाते हैं। उनकी पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में देशद्रोह का क़ानून हटाने का वादा किया है। आफ्सपा हटाने का आश्वासन दिया है| आतंक से लड़ रहे सैनिकों पर केस लगाने में सुविधा देने का इशारा किया है। जाति ने नाम पर हिंसा और अलगाव भड़काने वाले कई नवोदित नेता कांग्रेस में शामिल हो गए हैं और राहुल गांधी के सहयोगी हैं। देशभर में घूम-घूमकर भड़काऊ सभाएं कर रहे हैं। तिस पर राहुल का ये बयान। सारे बिंदुओं को जोड़ें तो ध्यान में आएगा कि ये सब सोचा समझा है। अकस्मात् कुछ भी नहीं है।