यूपीए के राज में 32 रुपए रोज कमाने वाला गरीब नहीं था
   दिनांक 03-अप्रैल-2019
कभी यूपीए सरकार के समय योजना आयोग ने उच्चतम न्यायालय में दिए अपने हलफनामें में कहा था 32 रूपया रोज कमाने वाला गरीब नहीं होता। अब सत्ता से महज पांच साल बाहर रहने के बाद गरीबों को वार्षिक 72 हजार देने की बात कर रहे हैं.
कभी साहिर लुधियानवी ने लिखा था – “इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर / हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़.” कुछ ऐसा ही मजाक इस देश के गरीबों के साथ राहुल गांधी कर रहे हैं. अभी हाल ही में उन्होंने कहा “यह गरीबी पर सर्जिकल स्ट्राइक है, 72 हजार. बस यह नंबर याद रखिये 72 हजार, एक वर्ष में 72 हजार रूपये दिए जायेंगे." अब ज़रा कथित अर्थशास्त्री राहुल गांधी के 72 हजार रूपये की हकीकत भी देख लीजिये. जब अर्थशास्त्र के पंडित डॉ. मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे. उस समय उच्चतम न्यायालय ने भारत के गरीबों और गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे लोगों की रिपोर्ट के बारे में जानकारी मांगी। वर्ष 2011 में केंद्र सरकार के योजना आयोग(अब नीति आयोग) ने शपथपत्र दाखिल कर के यह कहा था कि जो व्यक्ति शहर में 32 रूपया प्रति दिन और गांव में 26 रूपया प्रति दिन कमा रहा है.उसे गरीब नहीं माना जा सकता है. ऐसे व्यक्ति को गरीबी रेखा से ऊपर रखा गया है और इन लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं दिया जा सकता है. योजना आयोग के इस शपथ पत्र के बाद यूपीए सरकार की चारों तरफ आलोचना हुई थी. मगर योजना आयोग ने कहा कि आबादी ज्यादा है इसमें कोई परिवर्तन संभव नहीं है.
10 वर्षों तक इनकी यूपीए की सरकार थी तब वर्ष भर में 11 हजार 680 रूपया कमाने वाला व्यक्ति इन्हें गरीबी रेखा के ऊपर दिखाई दे रहा था. अब राहुल गांधी का कहना है कि गरीबों को 72 हजार रूपया दिया जाएगा. महज पांच साल तक सरकार से बाहर रहने के बाद गरीबों के लिए 72 हजार रूपये की बात करने लगे. अब सवाल यह है कि किस आधार पर यह तय करेंगे कि गरीब कौन है क्योंकि इनकी पिछली सरकार में गरीबी की जो परिभाषा तय की गयी थी वो तो बेहद हास्यास्पद थी.
योजना आयोग(अब नीति आयोग) के शपथ पत्र पर जरा विस्तार से गौर करें तो उस समय यह बताया गया था कि गरीबी रेखा के नीचे गुजर - बसर करने वालों की आबादी 40.74 करोड़ है. शहरी क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों के लिए 32 रूपया प्रति दिन और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए 26 रूपया प्रति दिन आय की सीमा रेखा तय की गयी है. जानकारी के अनुसार वर्ष 1970 में योजना आयोग के द्वारा पहली बार इस तरह का सर्वे काराकर गरीबी रेखा का निर्धारण किया गया था. गरीबी रेखा का निर्धारण हो जाने के बाद समय – समय पर इस प्रकार का सर्वे योजना आयोग कराता रहता है. पहली बार जब यह सर्वे कराया गया था. तब एक व्यक्ति को कितना न्यूनतम कैलोरी दिन भर में चाहिए होगी, इस आधार पर गरीबी रेखा का निर्धारण किया गया था. प्रतिदिन के हिसाब से यह माना गया था कि शहर में रहने वाले एक वयस्क को 2100 कैलोरी और गावं में रहने वाले एक व्यस्क को 2400 कैलोरी की न्यूनतम आवश्यकता है. अर्थशास्त्री डी. टी. लकड़ावाला और बाद में वाई. के. अलघ भी इस प्रकार के सर्वे में शामिल थे. कुछ वर्ष बीतने के बाद कैलोरी के साथ - साथ कुछ अन्य आवश्यकताओं जिसमे शिक्षा एवं वस्त्र आदि को गरीबी रेखा के सर्वे में शामिल किया गया. इसका उद्देश्य यह था कि गरीबी रेखा को और अधिक यथार्थ से जोड़ा जा सके. यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर ने वर्ष 2009 में गरीबी रेखा के नए मानक तय किये. आलोचकों का कहना है कि ऐसा करके केंद्र सरकार को दोहरा लाभ हो रहा था. पहला तो यह कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की आबादी में 22 फीसदी की गिरावट आ रही थी. दूसरा सरकार के खजाने पर आर्थिक भार कम हो रहा था.
तेंदुलकर कमेटी का गरीबों का मजाक उड़ाने वाले सर्वेक्षण –
तेंदुलकर कमेटी के हवाले से योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में बताया था कि अगर कोई व्यक्ति चावल या गेहूं पर प्रति दिन 5 रु खर्च करता है तो वह गरीब की श्रेणी में नहीं आयेगा. उस समय सामान्य किस्म के चावल की कीमत करीब 20 रूपये किलो थी और गेंहू की कीमत 11 रूपये किलोग्राम थी. कमेटी के अनुसार प्रतिदिन करीब दो रूपया सब्जी पर खर्च करने वालों को गरीब नहीं माना जाएगा. इस तरह की कई हास्यास्पद सिफारिशें तेंदुलकर कमेटी ने की थी. इन सब सिफारिशों से यूपीए सरकार न केवल सहमत थी बल्कि शपथ पत्र पर लिखकर उच्चतम न्यायालय में दाखिल किया था. जो मानक तेंदुलकर कमेटी ने तय किये थे उतनी खुराक अगर किसी व्यक्ति को दी जाय तो वह कुपोषण का शिकार हो जाएगा मगर भारत के मशहूर अर्थशास्त्री को किस आधार पर यह लगा कि उक्त मानक के ऊपर वाले लोगों को गरीबी रेखा के ऊपर का व्यक्ति माना जाएगा और ऐसे लोगों को सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं दिया जाएगा. यह सब आंकड़े ऐसे समय दिए गए थे जबकि उस समय के प्रधानमंत्री स्वयं एक अर्थ शास्त्री थे.