कांग्रेस ने हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए हिंदू आतंकवाद का शब्द गढ़ा
   दिनांक 03-अप्रैल-2019
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि अंग्रेजों ने भी कभी हिन्दुओं को आतंकवादी नहीं बताया था मगर कांग्रेसियों ने हिन्दुओं को आतंकवादी बताया
झूठ का साम्राज्य तैयार करने में माहिर कांग्रेस ने 2009 के लोकसभा चुनाव के पहले हिन्दू आतंकवाद का भ्रम फैलाया. समझौता एक्सप्रेस विस्फोट काण्ड, हैदराबाद मस्जिद बम विस्फोट काण्ड एवं मालेगांव में बम विस्फोट की आतंकी घटनाओं को आधार बनाकर राहुल गांधी, सुशील शिंदे, दिग्विजय सिंह और पी. चिदम्बरम आदि कांग्रेस के नेताओं ने हिन्दू आतंकवाद का एक भ्रमजाल बनाने की कोशिश की. हिन्दू समाज पर प्रहार किये गये. राहुल गांधी ने तो हिन्दू आतंकवाद को लश्कर व जैश से भी ज्यादा बड़ा खतरा बता दिया था. अदालत ने इन सभी मामलों में अभियोजन पक्ष की दलील को खारिज कर दिया और स्वामी असीमानन्द और साध्वी प्रज्ञा को बरी कर दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक जनसभा में कहा कि “हजारों साल का इतिहास है. अंग्रेजों ने भी कभी हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग नहीं किया मगर कांग्रेस ने हिन्दू आतंकवाद कहकर , हिन्दुओं को बदनाम करने की साजिश की. हिन्दू आतंकवाद का शब्द इन्ही कांग्रेस के लोगों ने गढ़ा. कभी इनको माफ़ मत करियेगा.”
अदालत से फैसला आने के बाद सभी कांग्रेसी नेता इस पर चुप्पी साधे हुए हैं. किसी भी कांग्रेसी नेता ने इस पर अभी तक खेद नहीं व्यक्त किया. बेशर्मी की हद पार करते हुए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत ने कहा कि ‘हैदराबाद मस्जिद बम विस्फोट काण्ड में आरोपियों के बरी होने पर वहां की प्रदेश सरकार को यह तय करना है कि वह ऊपर की अदालत में अपील करती है अथवा नहीं.’ एक निर्दोष साध्वी को सिर्फ इसलिए मुकदमे में झूठे तरीके से फंसाया ताकि हिंदू आतंकवाद का शब्द गढ़ा जा सके। यह भ्रम फैलाया जा सके कि आतंकवाद सिर्फ मुसलमान ही नहीं हिन्दू भी फैला रहे हैं. मुकदमे में झूठे तरीके से संलिप्तता दिखाकर स्वामी असीमानन्द और साध्वी प्रज्ञा को जेल भेजा गया. उन्हें यातनाएं दी गईं.
जब यूपीए की सरकार मुसलमानों को खुश करने में लगी हुई थी और उस दौर में लगातार बड़े आतंकी हमले देश में हो रहे थे. वर्ष 2006 के जुलाई महीने में मुम्बई की लोकल ट्रेनों में 7 सीरियल बम विस्फोट हुए थे. जिसमें 188 लोग मारे गए थे और 800 से ज्यादा घायल हुए थे. इस हमले में घायल पराग सावंत नाम के एक युवक को 9 साल कोमा में रहना पड़ा , वर्ष 2015 में उनकी मृत्यु हुई. मुंबई में 26 नवंबर 2008 को ताज होटल में आतंकवादी हमला हुआ जिसे 26 / 11 के नाम से जाना जाता है. पाकिस्तान के 10 आतंकवादियों ने ताज होटल और उसके आस - पास के लोगों को अपना निशाना बनाया था. इन हमलों में 166 लोगों की जान चली गई थी जिनमें कई विदेशी नागरिक थे. आतंकवाद विरोधी अभियान में सुरक्षाबलों ने 9 आतंकवादियों को मार गिराया था और एक आतंकवादी अजमल कसाब को पकड़ने में कामयाब हुए थे . अजमल कसाब को चार साल बाद 21 नवंबर 2012 को उसे फांसी दी गई थी.
उस समय की केंद्र सरकार को मालूम था कि इन घटनाओं को मुसलमानों के द्वारा ही अंजाम दिया जा रहा है. कड़ी कारवाई करने में मुसलमान नाराज हो सकते थे. इसके लिए कांग्रेस पार्टी ने एक बेहद घिनौना रास्ता अपनाया. कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने यह प्रचार करना शुरू कर दिया कि देश को हिन्दू आतंकवाद से खतरा है. ऐसा करके कांग्रेस ने एक तीर से दो निशाना साधे. कांग्रेस की मंशा थी कि हिन्दू आतंकवाद का प्रचार करने से मुसलमान प्रसन्न हो जायेंगे कि आतंकवाद सिर्फ मुसलमान ही नहीं हिन्दू भी फैला रहे हैं.
हिन्दुस्थान में मुल्जिम के गिरफ्तार होते ही यहां ‘मीडिया ट्रायल’ शुरू हो जाता है. समझौता एक्सप्रेस बड़ा नरसंहार था. जैसे ही राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने स्वामी असीमानंद एवं अन्य तीन हिन्दुओं को अभियुक्त बता कर गिरफ्तार किया, मीडिया ‘ट्रायल’ शुरू हो गया. गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने यह प्रचारित किया कि देश में हिन्दू आतंकवाद बढ़ रहा है और इस पर नियंत्रण किये जाने की जरूरत है. दिग्विजय सिंह को यह मालूम था कि सभी आतंकवादी घटनाओं के खुलासे में मुसलमानों के ही नाम आते हैं. ऐसे में हिन्दू आतंकवाद पर बयान देकर उन्होंने मुसलमानों को एक आधार दिया ताकि मुसलमान समाज में यह बहस कर सकें कि आतंकवाद तो हिन्दू भी करा रहे हैं.
सरकारी दबाव में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने स्वामी असीमानंद समेत कुछ अन्य हिन्दुओं को बगैर किसी ठोस सबूत के आरोपी बना दिया. जांच एजेंसी का तर्क था कि वाराणसी में संकट मोचन मंदिर पर हुए आतंकी हमले से स्वामी असीमानंद एवं अन्य लोग क्रोधित थे. उस घटना का बदला लेने के लिए इन लोगों ने समझौता एक्सप्रेस में इस तरह की आतंकी घटना को अंजाम दिया. इस मुकदमे की सुनवाई पूरी होने पर विशेष अदालत ने स्वामी असीमानंद एवं अन्य तीन अन्य को बरी कर दिया और कहा कि इन लोगों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है.
18 मई 2007 को हैदाराबाद की मक्का मस्जिद में भीषण बम विस्फोट हुआ था. नमाज के पहले वजू करने के लिए वजूखाने के पास नमाजियों की भीड़ लगी हुई थी तभी बम विस्फोट हुआ. 9 लोगों की मृत्यु हो गयी और 58 लोग गंभीर रूप से जख्मी हो गए. रिमोट तकनीक से यह आतंकी हमला किया गया था. इस आतंकी घटना की विवेचना पहले हैदराबाद की स्थानीय पुलिस ने शुरू की. उसके बाद इस मामले को सी.बी.आई को दिया गया था. वर्ष 2011 में इस घटना की अग्रिम विवेचना का जिम्मा राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंपा गया. राष्ट्रीय एजेंसी ने इस मामले में भी स्वामी असीमानंद एवं कुछ अन्य हिन्दुओं को अभियुक्त बनाया. इस मुकदमे की सुनवाई कर रही विशेष अदालत ने 16 अप्रैल 2018 को स्वामी असीमानंद समेत अन्य अभियुक्तों को बरी कर दिया. अदालत का फैसला आने के बाद कांग्रेसी नेताओं को जैसे सांप सूंघ गया. भारत सरकार के गृह मंत्रालय के पूर्व अवर सचिव ने आर.वी.एस. मणि का बयान काबिले तारीफ़ रहा. उन्होंने कहा कि “'मुझे इसी फैसले की उम्मीद थी, सारे सबूत फर्जी थे. हिंदू आतंकवाद का कोई ऐंगल नहीं था.'
 
29 सितम्बर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगावं में मोटर साइकिल में बम विस्फोट करके आतंकी घटना को अंजाम दिया गया. इस विस्फोट में 6 लोगों की मृत्यु हो गयी थी और 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे. इस घटना में साध्वी प्रज्ञा एवं अन्य लोगों को अभियुक्त बनाया गया. साध्वी प्रज्ञा को अनायास इस आतंकी घटना का अभियुक्त बना कर उन्हें यातनाएं दी गयीं. काफी समय तक उन्हें जेल में रहना पड़ा. जब विशेष अदालत में इस मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई तो अभियोजन पक्ष के पास कोई ठोस सबूत नहीं था जिसके आधार पर साध्वी प्रज्ञा का अपराध साबित किया जा सके. न्यायालय ने साध्वी प्रज्ञा को इस मुकदमे से बरी कर दिया.