शैतानी फितूर
   दिनांक 30-अप्रैल-2019
 
 
कोलम्बो के सेंट एंथोनी चर्च में स्थापित यीशु की प्रतिमा, जिस पर मारे गए लोगों के खून के धब्बे दिख रहे हैं
गत रविवार, 21 अप्रैल को श्रीलंका के 3 पांच सितारा होटलों—शंग्री-ला, सिनामन ग्रेंड और किंग्सबरी—के अलावा कोलंबो के एक अतिथि गृह तथा एक घर में विस्फोट हुआ, किन्तु यह बात अधूरी और सिर्फ आतंकी हमले के दायरे में सिमटी रह जाएगी जब तक इस तथ्य को खास तौर पर रेखांकित न किया जाए कि 21 अप्रैल को श्रीलंका की राजधानी कोलंबो का सेंट एंथोनी चर्च, पश्चिम तटीय कस्बे का सेंट सेबेस्टियन चर्च और पूर्वी कस्बे बट्टीकलोआ का सेंट माइकल चर्च खून से नहा गए।
यह तथ्य इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है कि 15 मार्च को न्यूजीलैंड में क्राइस्टचर्च स्थित मस्जिद पर हमला हुआ था! यह तथ्य इसलिए और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्राइस्टचर्च के मुकाबले सात गुना ज्यादा (करीब 350) लोग इस हमले में मारे गए और आईएस की शह पर किया गया यह अब तक का सबसे बड़ा हमला है। क्राइस्टचर्च की घटना आतंकी हमला नहीं, ईसाई-मुस्लिम धारावाहिक टकराव का एक नया अध्याय थी। कोलंबो की घटना भी आतंकी हमला नहीं, इस्लामी आतंक की नई वैश्विक गूंज है। यह आतंकी हमला इसलिए भी नहीं है, क्योंकि तौहीद जमात और परदे के पीछे छिपा आईएस आतंकी नहीं, इस्लामी संगठन हैं।
इसलिए भी, क्योंकि हमलों के वक्त लगने वाले नारे, झंडे पर कुरान की आयतें और बर्बरता का 1400 वर्ष पुराना कबाइली अंदाज बताता है कि दुनिया भले बदल गई हो, किन्तु कुछ लोगों ने ठान रखा है कि मुसलमानों को समय के साथ बदलने नहीं देंगे।
ऐसे में कुछ लोगों का यह कहना कि अशिक्षा या गरीबी से आतंकवाद पनपता है और आतंकवाद को किसी मजहब से जोड़ना गलत है, कायदे से रचा गया प्रगतिशील झूठ है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। उनकी यह बात ठीक मानी जा सकती थी, यदि आतंक की वारदात इक्का-दुक्का होतीं, गरीब-अशिक्षित पृष्ठभूमि से होतीं और आतंकियों की एक-सी मजहबी पृष्ठभूमि इस तर्क को न झुठला रही होती।
यदि गरीबी-अशिक्षा कारण थी तो सीधे अनपढ़-देहाती लोगों को ब्रेंटन या इन इस्लामी आतंकियों से ज्यादा खूंखार होना था। यदि गरीबी ही कारण थी तो इन आत्मघाती हमलावरों की विदेश के नामी संस्थानों से पढ़ाई और परिवारों की अरबपति पृष्ठभूमि होनी ही नहीं चाहिए थी।
मत भूलिए कि क्राइटस्टचर्च में आतंक मचाने वाला ब्रेंटन उस्मानिया साम्राज्य के दौर के बाद से अब तक हुए ईसाई-मुस्लिम संघर्ष की खूनी यादों में उबल रहा था। याद रखिए कि कोलंबो के इस्लामी आतंकियों के दिलो-दिमाग में भी जिहाद और मुस्लिम श्रेष्ठता का नृशंस उन्माद खौल रहा था।
क्राइस्टचर्च या कोलंबो, हमलावरों के नाम अलग थे। हथियार अलग थे। तरीका भी अलग था। लेकिन इनसान को जानवर बना देने वाला फितूर एक ही था। यह फितूर क्या है? यही कि सिर्फ हम सही, हमारी बात सही, बाकी दुनिया भाड़ में जाए या हम काफिरों, नॉनबिलीवर्स, मुशरिकों के लिए इस दुनिया को ही जहन्नुम बना देंगे! गौर करने वाली बात यह कि अपनी एक बात को सच मानने, मनवाने की जिद पाले ये उन्मादी खुद अनेक मजहबी पालों में बंटे हैं! कैथोलिक को प्रोटेस्टैंट से, प्रोटेस्टैंट को ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स, ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स को ओरिएंटल ऑर्थोडॉक्स से अलग-अलग करने वाली ईसाइयत किस एकात्म विश्व और शांति की बात करती है? आपसी खींचतान छोड़ि़ए, उसकी लड़ाई किस से है? इस्लाम से? उस मुसलमान से जो शिया को सुन्नी से, सुन्नी को अहमदिया से, अहमदिया को सलफी से, सलफी को हनफी से अलग करती है? यह तथ्य है कि हर वर्ष मुसलमानों के हाथों ही सबसे ज्यादा मुसलमान मारे जाते हैं, फिर इस्लाम को शांति का मजहब कहने वाले किस आधार पर ऐसी झूठी बातें करते हैं?
बहरहाल, इस्लामी या ईसाई मजहबी उन्माद को सिर्फ आतंकवाद बताने वाले लोग कौन हैं? इनकी पहचान जरूरी है। यह खुद उस प्रगतिशीलता, वामपंथ और अराजकता के सौदागर हैं जो क्रांति के नाम पर इनसानों का खून बहाकर तानाशाह हो जाना चाहते हैं। यह भी—सिर्फ हम सही, सिर्फ हमारी बात सही, वाली लीक के लोग हैं। नहीं भूलना चाहिए कि तुर्की में प्रगतिशील आंदोलन को लीलने का काम उसी इस्लामी आतंकवाद ने किया जिसे भारत में बैठे वामपंथी नकार रहे हैं। जिनके लिए क्राइस्टचर्च दूर था, उनके कान कोलंबो की धमक से खुल जाने चाहिए। भारत, कोलंबो या कहीं और, ईसाइयत और इस्लाम की उन्मादी टकराहट विविधता और ऐक्य में विश्वास रखने वाली आस्था और सभ्यता के लिए जोखिम लाए, उससे पहले ही जागना होगा।