बलूचिस्तान में आजादी की गूंज
   दिनांक 05-अप्रैल-2019
 - अवारान (बलूचिस्तान) से दिलजान बेजैन्जो                             
27 मार्च, 1948 को पाकिस्तान की फौज ने आजाद बलूचिस्तान पर कब्जा किया था। पहली बार इस मौके पर पूरे बलूचिस्तान में अनौपचारिक और गुपचुप तरीके से छोटे-छोटे समूहों में बड़ी संख्या में बैठकें हुईं। सामाजिक हताशा से जन्मी जनक्रांति ऐसे ही मुकामों से होकर गुजरती है। बलूचों की यह सक्रियता काफी कुछ कहती है
एक बैठक में महिलाओं को ‘बलूचिस्तान को आजादी क्यों चाहिए, उसका इतिहास क्या है’ आदि विषयों की की जानकारी देता एक प्रशिक्षक
पाकिस्तान की सियासी दहशतगर्दी और रोजाना लापता होते अपनों को देखने के बाद भी मुल्क की आजादी के लिए बलूचिस्तान के लोग क्या-कुछ कर रहे हैं, कैसे कर रहे हैं और किस हौसले से कर रहे हैं, यह काबिले गौर है। बेशक क्वेटा जैसे शहरी इलाके में पाकिस्तान के जुल्मों के खिलाफ बैनर लहराना मुमकिन हो, बाकी इलाकों में इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि संगीन के साये ने इन इलाकों में आजादी की ख्वाहिश को खत्म कर दिया है, बल्कि हकीकत यह है कि यह और तेज हुई है। अभी 27 मार्च को कई तंजीमों ने बलूचिस्तान के दूर-दराज के इलाकों में छोटे-छोटे समूह में लोगों को इकट्ठा करके उन्हें बताया कि उनकी रवायत क्या है, उनकी तारीखी हकीकत क्या है, उनके लिए आजादी क्यों जरूरी है।
बलूचिस्तान के लोगों के लिए 27 मार्च ऐसा दिन है जिसे वे कभी भूल नहीं सकते। 27 मार्च, 1948 को पाकिस्तान की फौज ने कलात पर हमला कर उस पर कब्जा कर लिया था। उस दौरान पाकिस्तानी सेना से मुकाबला करते हुए 15 से 20 हजार बलूच शहीद हो गए थे। तभी से बलूच इसे काला दिन की तरह मनाते हैं। दुनिया के तमाम देशों में बसे बलूच इस दिन जुलूस निकालते हैं, लोगों को बताने की कोशिश करते हैं कि बलूचिस्तान में कैसे बुनियादी इंसानी हकूक की अनदेखी हो रही है, यहां सियासी सरपरस्ती में कैसे दहशतगर्दी फैलाई जा रही है। जैसा इस बार यूनान, जर्मनी वगैरह में हुआ। इस बार की खास बात यह रही कि बलूचिस्तान की तमाम तंजीमों, खास तौर पर बलूचिस्तान स्टूडेंट आॅर्गनाइजेशन (आजाद) और बलूचिस्तान नेशनल मूवमेंट ने बलूचिस्तान के दूर-दराज के इलाकों में लोगों को इस बात से अवगत कराया कि उनकी रवायती सलाहियतें क्या हैं, उनकी तारीखी हकीकत क्या है, उनके लिए कौमी आजादी क्यों जरूरी है। इस रपट को तैयार करने के लिए यह संवाददाता ऐसे कई कार्यक्रमों में शामिल हुआ। अवारान के मश्कई में ऐसे ही एक कार्यक्रम में बलूचिस्तान स्टूडेंट आॅर्गनाइजेशन (बीएसओ) आजाद की ओर से एक कार्यक्रम दोपहर में हुआ। जब वहां पहुंचा तो बीएसओ (आजाद) का नुमाइंदा करीब 25 लोगों से मुखातिब था। मुझे देख उसने इंतजार करने का इशारा किया और अपनी बात करने लगा। तब तक मैंने कुछ तस्वीरें उतार लीं। थोड़ी देर में वह मेरे सामने था। मैंने सवाल किया कि वे इन लोगों को क्या बता रहे हैं। जवाब में उसने कहा, आप तो बाखबर हैं कि क्या हो रहा है...हममुल्क हैं... लगता है कोई रिपोर्ट बना रहे हैं...। खैर, ‘‘हमारा मानना है कि दुनिया की कोई भी कौम तब तक आजाद नहीं रह सकती... या हो सकती... जब तक उसे अपनी रवायतों और तारीख का इल्म न हो। यहां हम इन लोगों को यही सब बता रहे हैं। हमेशा चलने वाले कार्यक्रम से यह इसलिए अलग है कि यह एक खास मौके पर हो रहा है। सुबह से यह तीसरा दौर है।’’ बलूचिस्तान में इस तरह की बैठक इसलिए जरूरी है कि यहां की आबादी के ज्यादातर हिस्से को तालीम हासिल नहीं। ऐसे अनेक परिवार हैं जिनके बच्चे इसलिए तालीम नहीं हासिल कर पा रहे क्योंकि कमाने वाला पाकिस्तानी फौज के हाथों गायब कर दिया गया।
इसके बाद हमने रुख किया अवारान की ही जाहू तहसील में चल रहे ऐसे ही एक कार्यक्रम की ओर। वहां का नजारा भी कुछ अलग नहीं था। हां, एक बात अलग थी कि यहां सिर्फ महिलाएं थीं। ऐसे कार्यक्रम में सामने से तस्वीर खींचने की इजाजत नहीं होती सो पीछे से तस्वीर उतारी। फिर बाहर निकल आया। थोड़ी देर में उनका प्रशिक्षक बाहर निकला तो बातचीत का मौका मिला। उसने आते ही कहा, ‘‘इन चित्रों को कहीं भेजते समय इस बात का ख्याल रखेंगे कि किसी की भी पहचान जाहिर न हो....’’ मैंने सिर हिलाकर हां कहा और वही सवाल किया-क्या बता रहे हैं? जबाव अंदाजे से कुछ अलग मिला। उसने कहा, ‘‘पंजाबी भेड़ियों के सामने इन्हें कैसे छोड़ दें? उन्होंने क्या हाल कर रखा है, सब जानते हैं। महिलाओं-बच्चों की हिफाजत करना हमारी नस्ली जिम्मेदारी है... तारीख गवाह है कि बलूच महिलाओं की इज्जत करने वाली कौम है और बढ़ते फौजी जबर के साथ हमें इनकी हिफाजत के लिए भी ज्यादा वाकिफ होना होगा। यहां इन महिलाओं को तारीखी बातें तो बताते ही हैं, साथ ही यह भी कि उन्हें महफूज रहने के लिए क्या एहतियात रखना चाहिए।’’ अभी हमारी बात चल ही रही थी कि एक महिला आई और उसने जानना चाहा कि तस्वीर में कहीं उसका चेहरा तो नहीं आ गया। इससे पहले कि प्रशिक्षक कुछ कहता, मैंने उसे भरोसा दिलाया- इत्मीनान रखें, इसका ख्याल रखा जाएगा। काबिले गौर है कि हाल के करीब दस साल के दौरान फौजियों और एफसी (फ्रंटियर कॉर्प्स) वालों ने बलूच महिलाओं पर जेहनी और जिस्मानी जुल्म बढ़ा दिए हैं। उनका अंदाजा है कि महिलाओं पर जुल्म बढ़ाकर बलूचों का हौसला तोड़ा जा सकता है।
ऐसा ही कार्यक्रम केच (मकरान) के बल्गतार में हुआ। इसमें भी 20-25 लोगों का समूह बनाकर उन्हें बलूचिस्तान की तारीख से लेकर आज के हालात के बारे में विस्तार से बताया गया। यहां हुई बैठक की खास बात यह रही कि इसमें कराची से आए एक शख्स ने बताया कि बलूचिस्तान की आजादी के लिए जरूरी है कि दुनिया को यहां हो रहे जुल्मों के बारे में सबूत के साथ जानकारी दी जाए। सीपीईसी (चीन पाकिस्तान इकॉनोमिक कॉरिडोर) पर चीन जिस तेजी से काम कर रहा है, और इस कॉरिडोर पर काम शुरू होने के साथ ही जितनी तेजी से पाकिस्तानी फौज की दरिंदगी बढ़ी है, उसके मद्देनजर बलूचों को भी सबूत इकट्ठा करने की रफ्तार बढ़ानी होगी। एक दूसरे शख्स ने कहा, कि दुनियाभर में फैले बलूच अपने-अपने तरीकों से कौमी आजादी के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन, हम यहां रह रहे लोगों को चाहिए कि उन्हें यहां के हालात के सबूतों से ज्यादा से ज्यादा बाखबर रखें जिससे दुनिया को पता चले कि यहां क्या हो रहा है। इतना जरूर है कि चीजें बदली हैं, दुनिया यहां के हालात के बारे में धीरे-धीरे समझने लगी है। लेकिन जरूरी है कि इसकी रफ्तार बढ़े। वैसे, इस तरह के तमाम आॅडियो-वीडियो सबूत मौजूद हैं जो दिखाते हैं कि कई मौके ऐसे रहे जब जमीन पर पाकिस्तानी सेना के साथ वायु सेना ने भी बलूचों पर हमले किए। बीएसओ (आजाद) और बीएनएम जैसी तंजीमों के नुमाइंदे पहले से ही इस तरह के सबूत इकट्ठा करके सोशल मीडिया के जरिए इन्हें फैलाती रही हैं। 27 मार्च की ही बात है, बल्ूाचिस्तान के अलग-अलग इलाकों से 12 लाशें मिलीं जिनकी हालत ऐसी थी कि जानना मुश्किल कि किसकी है। इन्हें एक साथ क्वेटा में दफना दिया गया। ऐसे वाकये यहां रोज होते हैं। आज तमाम जगहों पर ऐसे कार्यक्रम हुए जिनमें यह बात भी खास तौर पर लोगों को बताई गई कि बेशक सबूत इकट्ठा करने में वे ज्यादा सक्रिय हो जाएं, लेकिन उन्हें आगे कहां और कैसे भेजना है, यह काम तयशुदा लोगों पर छोड़ दिया जाए।
सीपीईसी के जरिए चीन की दखलअंदाजी के साथ बलूचिस्तान की आजादी की राह पहले से मुश्किल जरूर लगती है, और हाल के समय में पाकिस्तानी फौज की ओर से जुल्म भी बढ़ा है, लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि बलूचों में ऊपर से बहुत जाहिर न होने वाला एक इंकलाबी जुनून फैलता जा रहा है। इस उम्मीद में कि कभी तो रात
खत्म होगी।
 
(प्रस्तुति : अरविंद)