नाम की आंधी और गड्डी में बंधे गांधी
   दिनांक 05-अप्रैल-2019
  
चुनाव के दौरान आरोप-प्रत्यारोपों की बरसात कुछ लोगों को दिलचस्प लगती है तो कुछ को बोझिल। मतदान की तिथि नजदीक आते-आते कई बार तथ्यहीन आरोप स्तरहीन बहस का अंधड़ भी खड़ा कर देते हैं, किन्तु नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक दलों की यह रस्साकशी ही मतदाताओं को सही को चुनने और गलत को बुहारने का अनमोल अवसर देती है। किसी दल या राजनेता के नाम से बड़ा यह अवसर अंतत: मतदाता को सबसे ऊंचे स्थान पर स्थापित करता है।
इस चुनावी समर में भी आरोप, आरोपी और आरोपण करने वालों की कुछ दिलचस्प झांकियां देश ने देखी हैं।
पहला मामला राफेल का था जिसे चुनाव के बहुत पहले से कांग्रेस पार्टी सुलगाए बैठी थी। यह आरोप लगाने वाले की आतुरता ही थी जिसके चलते भाजपा को उसी तेजी से जवाब देने के लिए सामने आना पड़ा। चूंकि चुनाव में समय था सो, मामले की सुनवाई के बाद आरोपों की धार और भोथरी हो गई।
इसकी दूसरी झलक दिल्ली में दिखी जब राजनैतिक भ्रष्टाचार से लड़ने की ताल ठोकते आम आदमी पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार की पर्याय बनी कांग्रेस पार्टी के सामने साष्टांग करते पाए गए। इसका विस्तार से जिक्र फिर कभी।
बात करते हैं उस तीसरे आरोप की जिससे एकबारगी सबकी नजरें चौंधिया गईं। संदिग्ध आर्थिक लेन-देन से जुड़े ये आरोप सीधे देश के सबसे पुराने दल, कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी पर लगे।
एक नामी समाचार चैनल ने खुलासा किया कि राहुल गांधी 2 जी मामले के एक अभियुक्त की कंपनी के साथ वर्षो से अजीब तरह के आर्थिक लेन-देन में लगे थे और इससे उन्हें लगातार तगड़ा मुनाफा हो रहा था। चैनल ने सौदे की शर्तो से जुड़े राहुल गांधी के हस्ताक्षर वाले दस्तावेज दिखाना शुरू किया तो परिवार को बुरी तरह घिरा देख पूरी कांग्रेस पार्टी बैकफुट पर आ गई।
यह मामला संपत्ति क्षेत्र में अग्रणी गिनी जाती उस यूनीटेक कंपनी से जुड़ा है जिसके उत्थान की कहानी कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में व्याप्त राजनीतिक भ्रष्टाचार से पतन में बदल गई। अपने क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर रही यूनीटेक के टेलीकॉम सेक्टर में उतरने की प्रेरणा देने के पीछे कौन था और किसकी नीतियों या पैरवी के चलते कंपनी को 2जी स्पैक्ट्रम का आवंटन हुआ, यह अलग जांच और पत्रकारीय शोध का विषय है।
 
मूल बात यह है कि कंपनी के कर्ताधर्ता संजय चंद्रा पर एक कंपनी का पैसा दूसरी फर्जी कंपनी में लगाने-दिखाने का गंभीर आरोप है। साथ ही यह भी आरोप है कि 2जी घोटाले के मुख्य अभियुक्तों में शामिल संजय चंद्रा के तार व्यावसायिक संपत्ति की साझेदारी में राहुल गांधी के साथ जुड़े हुए हैं। ध्यान देने वाली बात है कि संप्रग राज में देश के 22 में से 20 टेलिकॉम सर्कल हासिल कर सबसे ज्यादा लाभ में रही यूनीटेक के प्रबंध निदेशक संजय चंद्रा और तत्कालीन टेलिकॉम मंत्री ए. राजा, दोनों ही जेल में लंबा समय बिताने के कारण कुख्यात हैं। अक्तूबर 2010 में देश के सवार्ेच्च न्यायालय ने संप्रग सरकार से 2जी मामले पर नोटिस का जवाब मांगा था और यही वह माह था जब राहुल गांधी ने यूनीटेक के साथ दो कार्यालय खरीदने का सौदा किया। आरोप है कि सौदे में संपत्ति की मूल कीमत से कम भुगतान करते हुए भी राहुल गांधी ने न केवल दो परिसंपत्तियां हासिल कीं बल्कि उन्हें चुकाई गई रकम पर कंपनी द्वारा करोड़ों रुपए ब्याज का भुगतान भी किया गया और हर वर्ष यह राशि आश्चर्यजनक रूप से और बढ़ती गई।
पत्रकारिता जगत जानता है कि देश में सरकार के प्रश्रय वाले भ्रष्टाचार की कहानियों का पिछले पांच वर्ष में अकाल ही रहा है। ऐसे में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार को घेरने चले राहुल गांधी के लिए अब अपने दामन का दाग साफ करना बड़ी चुनौती है।
किन्तु बात यहीं नहीं थमती। ताजा दस्तावेजी आरोपों ने देश को उन सभी आर्थिक अपराधों को एक साथ जोड़कर देखने को बाध्य किया है जो कांग्रेस पार्टी के 'शीर्ष परिवार' पर लगते रहे हैं।
याद कीजिए स्वीडन की तोप बनाने वाली कंपनी बोफर्स। यह '90 का दशक था और 155 एमएम हवित्जर तोपों के रक्षा सौदे में 64 करोड़ रु. की दलाली लेने के आरोप तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनके करीबियों पर लगे थे। यह तथ्य है कि इस मामले में लंबी झोलदार जांच के नतीजे देश की जनता को कभी संतुष्ट नहीं कर सके। और तो और राजीव गांधी की पत्नी, 'एडविज एनतोनिया एल्बिना माइनो' यानी सोनिया भी आरोपों के घेरे में आईं जब उनके मार्फत 'गांधी परिवार' के करीब आए सौदे के बिचौलिए ओत्तावियो क्वात्रोक्की के बारे में देश की जनता को पता चला। क्वात्रोक्की अर्जेंटीना भाग गया किन्तु सोनिया परिवार के साथ उसके संपर्क की प्रगाढ़ता का यह सिलसिला आरोपों से बेअसर था। शायद यही वजह रही कि संप्रग शासन में इस मामले पर सरकार ने उच्च न्यायालय से आगे कदम ही नहीं बढ़ाए। और तो और वर्ष 2006 जनवरी की बात है, जब ब्रिटेन की शाही अभियोजन सेवा (सीपीएस) तथा सीबीआई के मध्य आधिकारिक रूप से यह बात हुई कि क्वात्रोक्की का खाता सील नहीं रखा जाए! इस तरह मामले की आगे की सुनवाई और दलाली में लिप्त रसूखदार से पैसा वापस मिलने की भारतीय आम लोगों की आखिरी आस भी टूट गई। क्वात्रोक्की जैसे विदेशी दलाल की 10 जनपथ तक गहरी पहुंच का दाग ऐसा है जो उसकी मौत के बाद भी कांग्रेस के आला परिवार का पीछा नहीं छोड़ने वाला।
ऐसा इसलिए भी क्योंकि रक्षा सौदों में दलाली की कीचड़ एक बार तक सीमित नहीं रही। फिर इसी परिवार पर ऐसे ही छींटे उछले तो आरोपों को राजनैतिक बताकर खारिज करने का सहज आधार भी जाता रहा। वीवीआईपी हेलीकॉप्टरों की खरीद में दलाली की बात उजागर होने के बाद से ही कांग्रेस का मुखिया परिवार फिर भारी संदेह के घेरे में हैं। इस मामले में मुख्य दलाल क्रिश्चियन मिशेल के हाथ का लिखा नोट एक अन्य मध्यस्थ गुइडो हैशके के यहां 2013 की शुरुआत में मारे गए छापे में मिला। इस नोट के मुताबिक, कुल दलाली 30 मिलियन यूरो की थी जो कि लगभग 242 करोड़ रुपये बैठती है। 12 हेलीकॉप्टरों को खरीदने का सौदा 3,600 करोड़ रुपये में हुआ था। नोट के मुताबिक, वायुसेना अधिकारियों को 6 मिलियन यूरो दिया जाना था जो कि लगभग 48 करोड़ रुपये हुआ। रक्षा मंत्रालय में वरिष्ठ नौकरशाहों को 8.4 मिलियन यूरो यानी लगभग 68 करोड़ रुपये दिए जाने की बात थी। अंतिम श्रेणी राजनैतिक नेताओं की थी, जहां 15़16 मिलियन यूरो दिखाए गए हैं, जो लगभग 122 करोड़ रुपये बैठते हैं।
इतालवी अदालत में रखे गए 15 मार्च 2008 के एक नोट में इशारा किया गया था कि प्रमुख दल की ताकतवर नेत्री वीआईपी चॉपर खरीद के पीछे अहम भूमिका निभा रही थी।
इटली में दलाली और दलालों के खुलते चिट्ठों में 'सिग्नोरा' (इतालवी में श्रीमती सरीखा संबोधन) को उस सरकार द्वारा किए जा रहे हेलीकॉप्टर सौदे में मुख्य कारक बताया गया। क्या कांग्रेस में सोनिया गांधी से ज्यादा ताकतवर भी कोई नेत्री उस दौरान रही है? देश यह जरूर जानना चाहेगा कि यह सिग्नोरा है कौन? क्या करती है? और क्या वह देश तथा कानून से भी बड़ी है?
गांधी उपनाम वाले इस परिवार पर रक्षा सौदों में घोटाले या किसी रीयल एस्टेट कंपनी से बेजा लाभ लेने के आरोपों में घिरने के ये इक्का-दुक्का मामले नहीं हैं। हाल में उछले यूनीटेक मामले की ही तरह वर्ष 2012 में सोनिया और उनके दामाद (जोकि उनकी स्कॉटिश मित्र मौरीन के पुत्र हैं) पर रीयल एस्टेट कंपनी डीएलएफ से 65 करोड़ रुपए की मोटी रकम ब्याजमुक्त ऋण के रूप में लेने तथा कंपनी को राजनैतिक लाभ पहुंचाने का आरोप लगा था। इस दौरान केंद्र में संप्रग सरकार थी, सोनिया संप्रग की संयोजक, कांग्रेस की अध्यक्ष और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष थीं और इसी समय देश के कई हिस्सों में कीमती जमीनें कौडि़यों के दाम खरीदीं। हाल में प्रवर्तन निदेशालय ने मौरीन तथा राबर्ट वाड्रा से जमीनों की खरीद से जुड़े मामलों में लंबी पूछताछ की है।
एक अन्य प्रकरण का उल्लेख किए बिना यह सूची पूरी हो ही नहीं सकती। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया और कांग्रेस के प्रथम परिवार से जुड़ा यह ऐसा मामला है जिसमें पहली बार गांधी परिवार, के दो लोगों सोनिया तथा राहुल गांधी, को नामजद किया गया है। मामला नेशनल हेराल्ड अखबार और उसकी परिसंपत्तियों से जुड़ा है। 1938 में हजारों स्वतंत्रता सेनानियों के अंशदान से यह समाचार पत्र लखनऊ से शुरू हुआ। स्वतंत्रता के कुछ वर्ष बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने एक समारोह में कहा कि 'मैं नेशनल हेराल्ड को बंद नहीं होने दूंगा चाहे मुझे इलाहाबाद का अपना पैतृक घर, आनंद भवन भी बेचना पड़े।' विडंबना देखिए, आनंद भवन अपनी जगह है किन्तु हेराल्ड अखबार के लिए पल्ले से कुछ करने की बजाय सोनिया परिवार पर इसकी बहुमूल्य परिसंपत्तियां कब्जाने का आरोप लगा है।
वर्ष 2008 में इस समाचार पत्र को बंद कर इसका स्वामित्व एसोसिएट जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) नामक कंपनी को दे दिया गया। कंपनी ने कांग्रेस से बिना ब्याज 90 करोड़ रुपए ऋण लिया। समाचार पत्र के शुरू हुए बिना ही 26 अप्रैल 2012 को एक बार फिर स्वामित्व का स्थानांतरण हुआ और नेशनल हेराल्ड 'यंग इंडिया' को दे दिया गया। ध्यान देने वाली बात है कि एसोसिएट जर्नल लिमिटेड पर केवल 90 करोड़ रुपए के ऋण था जो उसकी परिसंपत्तियों के माध्यम से आसानी से पाया जा सकता था लेकिन ऐसा करने की कोशिश ही नहीं की गई। दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिस कंपनी को यह सौगात बिना मेहनत मिली उस यंग इंडिया कंपनी में 76 प्रतिशत शेयर सोनिया और राहुल गांधी के पास हैं। जानकार कहते हैं कि यंग इंडिया ने हेराल्ड की संपत्ति केवल 50 लाख रुपए में हासिल कर ली जिसकी बाजार कीमत हजारों करोड़ रुपए थी।
वर्ष 2013 में, सुब्रमण्यम स्वामी ने गांधी परिवार पर धोखाधड़ी और धन के गबन का आरोप लगाते हुए दर्ज शिकायत में कहा कि ''गांधी परिवार ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश और अन्य स्थानों पर धोखाधड़ी करते हुए एसोसिएट जर्नल लिमिटेड की संपत्तियां हड़प ली हैं।'' उन्होंने इन संपत्तियों की कीमत 2000 करोड़ रुपये बताई।
पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण, जो एजेएल में शेयरधारक हैं, का भी दावा है कि यंग इंडिया का अधिग्रहण पूरी तरह से अवैध था। यह स्थापित तथ्य है कि एजेएल नेहरू परिवार की निजी संपत्ति नहीं बल्कि एक सार्वजनिक कंपनी की तरह थी जिसे लगभग 5,000 स्वतंत्रता सेनानियों के सहयोग-समर्थन से शुरू किया था।
 
बहरहाल, घोटालों के घर के बाद अब बात राहुल और उनके पसंदीदा आरोप राफेल, उसके भारत में निर्माण की शर्तो और करार के साझीदारों की। यदि राहुल के आरोपों में किंचित भी तथ्य हैं तो देश को निश्चित ही इन्हें गंभीरता से लेना चाहिए। परंतु अपने और अपने परिवार पर लगे दागों से ध्यान हटाने के लिए शिगूफा छोड़ने की इजाजत उन्हें नहीं है। साथ ही एक सवाल और प्रासंगिक हो जाता है -यदि एक उद्योगपति को (जिसकी पहचान ही नए-नए उद्योगों में हाथ आजमाना है) हवाई जहाज के पुर्जे (गौर कीजिए पूरा हवाई जहाज नहीं) बनाने का अनुभव न होने की दलील देकर लज्जित किया जा सकता है तो यह कसौटी राबर्ट वाड्रा पर लागू क्यों नहीं की जा सकती जो बिना किसी पृष्ठभूमि के 'किसान' से लेकर जमीनों के संदिग्ध सौदागर की छवि अर्जित कर चुके हैं! और तो और यह कसौटी खुद राहुल और सोनिया गांधी पर लागू क्यों नहीं की जा सकती? क्या राहुल और सोनिया गांधी को किसी अखबार के प्रकाशन, प्रबंधन, संपादन का ऐसा गहरा अनुभव है कि वह हजारों करोड़ रुपए की संपत्ति वाले किसी अखबार को नई दिशा दे सकते हैं!
आर्थिक अपराधों के आरोपों की आंधी में सच तलाशते हुए फिलहाल यह तो कहा ही जा सकता है कि उपनाम को कुर्सी की कुंजी बना देने वालों का  'गांधी' राजनैतिक जीवन और आर्थिक व्यवहार में पारदर्शिता का वह प्रतीक नहीं है, जिसे यह देश जानता है। वह नोटों की गड्डी में बंधा है, कुछ ऐसा जो बुजुर्ग पार्टी के शीर्ष कुनबे को खूब ललचाता है और जिसे जैसे मर्जी मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है।