पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदू महिलाओं का जीवन नर्क बन चुका है
   दिनांक 06-अप्रैल-2019
                                                                                                                      - मलिक असगर हाशमी    
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं की स्थिति बहुत दयनीय है। उन्हें शारीरिक, मानसिक यातनाओं के साथ बुनियादी जरूरतों के लिए भी जूझना पड़ता है। हाल ही में जारी पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में इसका जिक्र किया गया है। लेकिन इस पर अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है
पाकिस्तान में दमन के विरुद्ध आक्रोश प्रकट करते हिन्दू
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के मानवाधिकार सुरक्षित नहीं हैं। प्रधानमंत्री इमरान खान देश के अल्पसंख्यकों को सहेजने और सुरक्षित रखने के चाहे जितने दावे करें, पर वास्तविकता इसके विपरीत है। अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने का सिलसिला नहीं थम रहा है। हाल ही में पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने ‘अ मीनिंगफुल डेमोक्रेसी’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है, जो अल्पसंख्यकों की बदहाली बयां करती है। 25 पन्नों की यह रिपोर्ट विशेष तौर से पाकिस्तान की अल्पसंख्यक महिलाओं के मानवाधिकार को लेकर तैयार की गई है। इसे तैयार करने से पहले आयोग ने पिछले वर्ष 26 अप्रैल से 17 नवंबर तक लाहौर, इस्लामाबाद, क्वेटा, कराची, मुलतान और हैदराबाद में मानवाधिकार से जुड़े विभिन्न विषयों पर संगोष्ठियां आयोजित की थीं। इसमें जो निष्कर्ष निकलकर आया वह माथे पर बल बढ़ाने वाला है। रिपोर्ट तैयार करने का उद्देश्य प्रधानमंत्री इमरान खान को समस्या से परिचित कराना और ‘नए पाकिस्तान’ में अल्पसंख्यकों को देश के संविधान के अनुसार सुरक्षा और सुविधा मुहैया कराना था। अलग बात है कि रिपोर्ट प्रकाशित होने के तीन माह बाद भी कुछ नहीं बदला है। इमरान खान की कार्यशैली और नीति भी पूवर्ती सरकारों जैसा ही है। सरकार अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सुरक्षा का ढिंढोरा तो पीटती है, पर करती कुछ नहीं। किसी मुददे पर बाहरी-भीतरी दबाव पड़ने पर सरकार कुछ समय के लिए अवश्य सक्रिय होती है, लेकिन फिर पुराने ढर्रे पर आ जाती है।
बहरहाल, रिपोर्ट तैयार करने के दौरान खुलासा हुआ कि देश के अलग-अलग प्रांतों में अल्पसंख्यक महिलाओं को दबाने, कुचलने के भिन्न-भिन्न तरीके आजमाए जा रहे हैं। मसलन, सिंध में नाबालिग हिन्दू लड़कियां अपहरण, कन्वर्जन व शादी की समस्या झेल रही हैं तो खैबर-पख्तूनख्वा, गिलगित-बल्टिस्तान, बलूचिस्तान, दक्षिण पंजाब व केंद्र शासित जनजातीय क्षेत्र फाटा के अल्पसंख्यक और उनकी महिलाओं को दूसरी संगीन परेशानियों ने दबोच रखा है।
पाकिस्तान में पुरातन परंपरा, रूढ़िवादिता, पिछड़ापन और कट्टरता के चलते अल्पसंख्यक महिलाओं का जीवन नर्क बन चुका है। दक्षिण पंजाब की अल्पसंख्यक महिलाएं ‘वट्टा-सट्टा, ‘करो-कर’ और ‘वानी’ जैसी दकियानुसी परंपराओं के चलते मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेल रही हैं। इन कुरीतियों के कारण उन्हें ‘एक्सचेंज रेप’ यानी ‘बलात्कार के बदले बलात्कार’ जैसी यातना से भी दो-चार होना पड़ रहा है। रिपोर्ट में 14वें पन्ने पर इसका उल्लेख है कि दक्षिण पंजाब में ‘आॅनर किलिंग’ और बहुविवाह प्रथा कुछ ज्यादा ही जड़ जमा चुकी है। इस क्षेत्र में ‘वट्टा-सट्टा’ प्रथा आम है। इसके तहत यदि एक कबीले का कोई व्यक्ति अपने विरोधी कबीले की किसी लड़की से विवाह करता है तो बदले में अपने परिवार की किसी महिला या बालिका को उस लड़की के परिजनों को ‘भेंट’ कर देता है। इसी तरह, यदि कोई लड़की या महिला अपने विरोधी कबीले के पुरुष से प्रेम विवाह करती है तो ‘वानी’ प्रथा के तहत लड़की के परिवार वाले लड़के के परिवार से किसी लड़की को उठा लाते हैं और उससे बलात शारीरिक संबंध बनाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण पंजाब में 2018 में ‘आॅनर क्राइम’ की एक हजार से अधिक वारदातें दर्ज की गईं। इसी तरह पाकिस्तान में पिछले वर्ष हिन्दू समुदाय की करीब एक हजार कम उम्र लड़कियों का अपहरण कर जबरन कन्वर्जन कर निकाह कराया गया। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में तो अल्पसंख्यक महिलाओं को बुनियादी सुविधाएं तक मयस्सर नहीं हैं। सिंध के बदिन, मीठी और उमरकोट में घोर जल संकट है। कहीं थोड़ा-बहुत पानी है भी तो उसमें फ्लोराइड की मात्रा इतनी अधिक है कि उसका सेवन करने वाले हड्डियों के रोग की चपेट में हैं। सिंध के अधिकांश क्षेत्र में हर वर्ष सूखा पड़ता है, इसलिए क्षेत्र की हिन्दू महिलाएं और बच्चियां घरेलू काम और पढ़ाई छोड़ कर दिनभर पानी की तलाश में भटकती रहती हैं।
केंद्र शासित जनजातीय क्षेत्र फाटा, खैबर पख्तूनख्वा व गिलगित-बल्टिस्तान की अल्पसंख्यक महिलाओं की समस्याएं कुछ अलग हैं। इस इलाके में 15 लाख अफगानी विस्थापित रह रहे हैं। पाकिस्तान सरकार से इन्हें नागरिकता भी मिली हुई है। इसके बावजूद इन इलाकों में सैन्य गतिविधियां अधिक होने के कारण शरणार्थियों को संदेश की दृष्टि से देखा जाता है।
पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, विस्थापितों की महिलाओं एवं बच्चियों के प्रति सेना का रवैया भी ठीक नहीं। उन्हें सामान्य पाकिस्तानियों की तरह सारे अधिकार नहीं दिए गए हैं। रिपोर्ट कहती है कि पूर्वी खैबर पख्तूनख्वा में मानवाधिकार का खुला उल्लंघन हो रहा है। 2008 में यहां रह रहे 53 लाख लोगों को इलाका छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया। अभी हालात यह है कि आम नागरिक, मानवाधिकार कार्यकर्ता या कोई मीडियाकर्मी वहां तक जा नहीं सकता। सीमावर्ती क्षेत्र गिलगित-बाल्टिस्तान में तो स्थिति और भी खराब है। इस क्षेत्र के अधिकांश इलाकों में ‘लैंडमाइन’ बिछे हुए हैं और आए दिन कोई न कोई इसकी चपेट में आता रहता है। वहीं, बलूचिस्तान में शिया और ईसाई समुदाय प्रताड़ना के शिकार हैं। इस इलाके में सुन्नी-शिया हिंसा जैसे नियती-सी बन गई है। हिंसा की सूरत में खासतौर से अल्पसंख्यक महिलाओं को निशाना बनाया जाता है। ईश निंदा के नाम पर उन्हें यातनाएं दी जाती हैं और देश छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। पुलिस और निचली अदालतें भी ऐसे मामलों में पीड़ितों का साथ नहीं देतीं। बलूचिस्तान में विदेशी धन से बड़ी संख्या में मदरसे बनाए गए हैं। इसकी वजह से क्षेत्र में कट्टरता चरम पर है। आतंकी संगठन भी क्षेत्र में सक्रिय हैं। अल्पसंख्यकों के बच्चों को मदरसे में पढ़ने को विवश किया जाता है। देश में अल्पसंख्यकों के लिए नौकरी और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की सुविधा है। लेकिन बलूचिस्तान में इसका खुला उल्लंघन हो रहा है।
हिन्दू बहुल सिंध प्रांत में अल्पसंख्यकों की दशा ज्यादा खराब है। यहां अल्पसंख्यक हिन्दुओं को किसी भी स्तर पर राहत नहीं है। क्षेत्र मेंं इस्लामी कायदे और संविधान का गलत खुलासा हिन्दुओं को प्रताड़ित करने के लिए किया जाता है। हिन्दू बच्चियों से बलात्कार, जबरन विवाह और कन्वर्जन की घटनाएं आम हैं। ऐसे मामलों में पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने में भी आना-कानी करती है। अगर प्राथमिकी दर्ज भी कर ली जाती है तो दबाव डालकर मामले को रफा-दफा करा दिया जाता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, सिंध प्रांत में हर साल गैर-मुस्लिम लड़कियों से बलात्कार, उनके कन्वर्जन और अपहरण के 1000 से अधिक मामले दर्ज किए जाते हैं। औसतन ऐसी 20 से 25 घटनाएं प्रत्येक माह दर्ज की जाती हैं। ज्यादातर मामलोें में 16 वर्ष की बच्चियां शिकार बनती हैं। इस उम्र में बच्चियां किसी पर जल्दी भरोसा कर लेती हैं, जो बाद में उनके लिए मुसीबत बन जाती है। सिंध विधानसभा ने नवंबर 2016 में बिल पासकर ‘हिंदू मैरेज एक्ट 2017 के तहत 18 वर्ष से कम उम्र की शादियों पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बावजूद इसमें कोई कमी नहीं आई है। इसी साल होली के दिन दो हिन्दू बच्चियों का अपहरण कर जबरन शादी और कन्वर्जन किया गया। पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 498-बी, गार्जियन वार्ड एक्ट, चाइल्ड मैरिज एक्ट और कुरान मजीद में कन्वर्जन और और निकाह की व्याख्या से उत्पन्न भ्रम के चलते भी पाकिस्तान सरकार ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने में नाकाम है। इसके अलावा, पाकिस्तान सरकार कराची में बड़ी संख्या में बसे अफगानियों, बंगालियों, बिहारियों, बर्मीज, कश्मीरियों और ईरानियों के मानवाधिकारों की सुरक्षा में भी बुरी तरह असफल साबित हो रही है। कराची प्रेस क्लब के पास हिन्दू जोगिया समुदाय के लोग बड़ी संख्या में पिछले कई वर्षों से फुटपाथ पर रह रहे हैं। उनके बच्चों को शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधा तक नसीब नहीं।
(लेखक हिन्दी दैनिक पायनियर, हरियाणा संस्करण के संपादक हैं)