वायनाड में हरे परचम के तले राहुल का चुनाव,गायब हो गए तिलक और कलावे
   दिनांक 06-अप्रैल-2019
 
राहुल गांधी ने मुस्लिम लीग के हरे परचमों की छांव में केरल की वायनाड लोकसभा सीट से नामांकन किया, तो क्या वह अपनी बहन के साथ किसी मंदिर गए. क्या आपको कहीं, जनेऊ, तिलक और कलावा नजर आया. यह धर्म को जीना नहीं, उसका सुविधाजनक प्रदर्शन है.आप भूले नहीं होंगे, जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के जनेऊधारी ब्राह्मण होने का प्रचार पूरी पार्टी मिलकर कर रही थी. प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ताल ठोककर कहा था कि राहुल जनेऊधारी ब्राह्मण हैं. आप नहीं भूले होंगे कि कभी हिंदू आतंकवाद का हौवा सरकारी मशीनरी के दम पर खड़ा करने वाली कांग्रेस के अध्यक्ष मंदिरों में दर्शन-पूजन कर रहे थे. आपको याद होगा कि राम को काल्पनिक किरदार बताने वाली कांग्रेस की नव अवतरित महासचिव श्रीमती प्रियंका वाड्रा गांधी गले में रुद्राक्ष और मनकों की माला पहने गंगाजल का आचमन कर रही थीं.  यह धर्म को जीना नहीं, उसका सुविधाजनक प्रदर्शन है. वायनाड में मुस्लिम वोटों के दम पर चुनाव लड़ रहे राहुल हिंदू प्रतीकों के साथ खड़े क्यों नहीं हो रहे हैं ?
मध्यप्रदेश में महाकाल मंदिर में पूजा कर शुरू किया था राहुल ने चुनावी अभियान
जिस देश में पत्रकार किसी के एक टोपी न पहनने को लेकर सालों डिबेट कर सकते हैं, वे वायनाड में जनेऊधारी कांग्रेस अध्यक्ष के जनेऊ से लेकर तिलक तक, सब कुछ गायब होने पर चुप रहते हैं. यह भी सुविधाजनक प्रदर्शन ही है. यदि हम कलावा बांधते हैं, तो वह प्रदर्शन नहीं है. वह विश्वास है कि यह रक्षा सूत्र है. यदि तिलक धारण करते हैं, तो ब्रह्मकृपा और सद्बुद्धि का आशीर्वाद है. यदि जनेऊ धारण करते हैं, तो उसका वैज्ञानिक आधार है. कर्ण छेदन है, तो उसके शारीरिक लाभ हैं. बहरहाल, ये प्रतीक दिन-प्रतिदिन के जीवन से जुड़े हैं. जब आप कलावा बंधी कलाई के साथ होश संभालते हैं, तो आपको उसके साथ जीने की आदत हो जाती है. जब जीवन प्रतीकों पर टिका है, तो उसका स्वाभाविक महत्व राजनीति में है ही. 2014 के लोकसभा चुनाव में 44 सीटों पर सिमटने के बाद कांग्रेस नेतृत्व को यह महसूस हुआ कि हिंदू प्रतीकों का निरादर करके मुस्लिम तुष्टिकरण की उसकी नीति को देश का मतदाता समझ चुका है. देश का बहुसंख्यक मतदाता तीन दशक बाद केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक पूर्ण बहुमत प्राप्त सरकार बैठा देता है.
ये राजनीति के बहुत बड़े बदलाव का दौर था. सिर्फ सरकार के स्तर पर नहीं. सोच के स्तर पर भी. नरेंद्र मोदी हिन्दुत्व को जीते हैं. उनके जीवन हर पहलू में उसकी झलक है. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष अपनी सुविधा के अनुसार चलते हैं. मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में प्रदेश में प्रचंड बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी. भाजपा हिचकिचाई नहीं. उसने प्रदेश में अपने सबसे लोकप्रिय चेहरे योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री के रूप में चुना. कहां तो राहुल गांधी समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ नई-नई दोस्ती करके अल्पसंख्यक मतों के समीकरण के जरिए उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जिंदा करने के सपने देख रहे थे. कहां एक भगवाधारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ गया. गठबंधन के बावजूद कांग्रेस की जो दुर्गति उत्तर प्रदेश के चुनाव में हुई, वह इतिहास में दर्ज हो चुकी है. कांग्रेस सात सीटों पर सिमट गई. छोटे से इलाके में सिमटी भाजपा की कई सहयोगी पार्टियों ने कांग्रेस से ज्यादा सीट हासिल की थी.
काशी विश्वनाथ में पूजा—अर्चना करतीं प्रियंका गांधी
संदेश साफ था. बहुसंख्यक मतदाता अब ऐसे बयानों और सोच को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है जिसका यह मानना हो कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है. जनाकांक्षा समानता की है. सबका साथ सबके विकास की है. मोदी कई बार कह भी चुके हैं कि मैं सबके लिए सबके विकास के लिए काम करता हूं.
जब कांग्रेस को लगा कि मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति से पैदा हुआ रोष अब वोट में परिवर्तित हो चुका था. तब कांग्रेस नेतृत्व यह समझ आया कि उत्तर भारत में मुस्लिम प्रेम के उसके ज्यादा दिखावे से बहुसंख्यक मतदाता खीझे हुए हैं. यहां से राहुल गांधी का हिंदूकरण शुरू हुआ.
राहुल का टेंपल रन
गुजरात चुनाव में उन्होंने अपना प्रचार ही सौराष्ट्र के द्वारकाधीश मंदिर से शुरू किया. इसके बाद उन्होंने गुजरात के 25 से ज्यादा मंदिरों में पूजा अर्चना की. जहां गए, वहां के प्रसिद्ध मंदिर में शीश नवाया. पूरे चुनाव अभियान में शायद ही कोई मौका था, जब तिलक मस्तक से दूर हुआ हो. उन्होंने गुजरात के सोमनाथ मंदिर, रणछोड़ दास जी मंदिर, भाथी जी महाराज मंदिर, खोदलधाम, जलाराम बापा, दासीजीवन मंदिर और अक्षरधाम जैसे हर गुजराती व देशवासी की आस्था से जुड़े मंदिरों में पूजा की. गुजरात में कांग्रेस चुनाव हार गई. लेकिन राहुल ने अपना टेंपल रन जारी रखा. मध्य प्रदेश चुनाव में राहुल गांधी ने अपने अभियान की शुरुआत उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर से की. इसके अलावा वह मध्य प्रदेश में चित्रकूट के कामतानाथ मंदिर, दतिया के पीतांबरा पीठ, जबलपुर के गौरी घाट, इंदौर के बड़ा गणपति मंदिर गए. राजस्थान में भी मंदिर-मंदिर घूमे. यहां कांग्रेस मामूली अंतर से सत्ता में तो आ गई, लेकिन इसे राहुल के इमेज मेकओवर कम, स्थानीय सरकारों के खिलाफ जनादेश ज्यादा माना गया. इस चुनाव में राहुल गांधी के जनेऊ और गोत्र विवाद ने भी तूल पकड़ा. पूजा के संकल्प के समय उन्होंने अपना धर्म हिंदू और गौत्र दत्तात्रेय बताया, जो कि अब तक शोध का विषय है.
लोकसभा चुनाव में सुविधा के प्रतीक
लोकसभा चुनाव में अब हिंदू इमेज मेकओवर की जिम्मेदारी कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा गांधी ने संभाली है. वह गंगाजल के आचमन, बाबा विश्वनाथ के दर्शन, हनुमान गढ़ी में आशीर्वाद लेने समेत पूरे हिंदू रंग में सरोबार नजर आती हैं. गले में रुद्राक्ष और कंठी धारण करें, वह गंगा में नौका विहार पर निकलती हैं. 21 फरवरी को राहुल गांधी ने आंध्र प्रदेश में चुनाव अभियान की शुरुआत तिरुपति बालाजी मंदिर के दर्शन से की. लेकिन जैसे ही उन्होंने अमेठी के साथ केरल की वायनाड सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की, सारा छवि रूपांतरण ताश के पत्तों की तरह ढह गया. वायनाड कांग्रेस की सबसे विश्वसनीय सहयोगी मुस्लिम लीग का गढ़ है. यहां मुस्लिम और ईसाई आबादी बहुत ज्यादा है। सबकी नजर राहुल गांधी के नामांकन पर थी. राहुल गांधी के शिवभक्त, जनेऊधारी हिंदू होने के कांग्रेस के दावे के मद्देनजर सबकी नजर थी कि नामांकन जैसे महत्वपूर्ण मौके पर वह अपने किस आराध्य का आशीर्वाद लेते हैं.
 
 गुजरात में रणछोड़दास मंदिर में पूजा—अर्चना करते राहुल गांधी
वायनाड पहुंचते ही उतरा हिंदू चोला
कोई कह सकता है कि धार्मिक विश्वास और प्रतीकों को धारण करना नितांत निजी मामला है. लेकिन जब इन प्रतीकों के बल पर राजनीति होने लगे, तो अपेक्षाएं बदल जाती हैं. वायनाड में नजारा दूसरा था. उम्मीद के मुताबिक कांग्रेस के सहयोगी दल मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता चांद सितारा वाले हरे झंडे लिए इंतजार कर रहे थे. राहुल गांधी यहां किसी मंदिर नहीं गए. अपनी बहन प्रियंका के साथ वह सीधे नामांकन दाखिल करने पहुंचे. इसके बाद रोड शो पर निकले. उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक से नजारा अलग था. कलावे की जगह राहुल और प्रियंका के हाथ में एक काला धागा था. न कहीं तिलक था, न जनेऊ न ही रुद्राक्ष की माला. बताते चलें कि राहुल गांधी जहां नामांकन कर रहे थे, उससे थोड़ी ही दूर पर केरल का प्रसिद्ध तिरुनेल्ली मंदिर है. भगवान विष्णु का ये मंदिर इतना प्राचीन है कि इसकी स्थापना कब हुई, किसी को नहीं पता. तमिल चेर राजा भास्कर रवि वर्मा के समय में सन 970 के आस-पास भी इसका उल्लेख मिलता है.
केरल में बहुत गहरा है हिंदू विश्वास
हर राज्य में मंदिर-मंदिर घूमने वाले कांग्रेस अध्यक्ष को हम केरल के मंदिरों का पता भी बताना चाहेंगे. केरल भगवान अयप्पा और सबरीमाला की भूमि है. जिसकी मर्यादा को हाल ही में तार-तार करने की सेक्युलर गैंग ने साजिश रची. केरल में हिंदू विश्वास बहुत गहरा है और भगवान अयप्पा के मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक की अनादि काल से चली आ रही परंपरा को ध्वस्त करने खिलाफ पूरे राज्य में आंदोलन फैला. राज्य की वामपंथी सरकार ने इस आंदोलन और हिंदू मान्यताओं को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कांग्रेस ने इस पूरे मसले पर चुप्पी ओढ़े रखी. बहरहाल, केरल में हिंदू कोई भी कार्य भगवान अयप्पा को याद करके शुरू करता है. इसके अलावा केरल मे तिरुवनंतपुरम में प्राचीन पद्मनाभस्वामी मंदिर है. अंबलापुझा में भगवान श्रीकृष्ण का प्राचीन मंदिर है. गुरू वयूर के प्राचीन कृष्ण मंदिर में भी पूरे दक्षिण भारत की आस्था जुड़ी है. एर्नाकुलम में चोट्टानिकारा माता विराजती हैं. वाइकोम में कदातिरुति मंदिर है, तो मन्नारसाला में नागराज देवता हैं. त्रिशूर में तिरुवंचिकुलम शिव मंदिर है, कोझीकोड़ में लोकनारकावु मंदिर है. वल्लापट्टनम में भगवान मुथप्पन विराजित हैं. चर्च और मौलानाओं के प्रभाव वाले केरल में मतदाता इंतजार कर रहे हैं कि राहुल गांधी इन मंदिरों के दर्शन को कब पहुंचेंगे.