सेक्यूलर दलों का सांप्रदायिक चेहराः हिंदुओं को बांटों और मुसलमानों से कहो-एकजुट होकर हमें वोट करें
   दिनांक 08-अप्रैल-2019
सोच यही कि हिंदुओं को दलित, पिछड़े, सवर्ण वोटों में बांट लो और फिर उसमें एकमुश्त मुस्लिम वोट जोड़कर जीत का समीकरण बनाओ. असल में कांग्रेस हो, बसपा हो, सपा हो, तृणमूल हो, आम आदमी पार्टी हो या फिर तेलगू देशम, सभी हिंदुओं के एक हो जाने से डरे हुए हैं.
तथाकथित सेक्यूलर दलों का सांप्रदायिक चेहरा आपके सामने है. बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती और समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव जिस तरह खुले-आम मुस्लिम मतों के लिए झोली फैलकर गिड़गिड़ा रहे हैं, इनकी बौखलाहट समझी जा सकती है. लेकिन क्या सांप्रदायिकता की परिभाषा बस हिंदू शब्द पर खत्म हो जाती है. चुनावी रैली में मुस्लिमों से एकजुट होकर वोट करने की अपील के पीछे वही सोच काम कर रही है, जो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के केरल की वायनाड सीट से चुनाव लड़ने के पीछे है. सोच यही कि हिंदुओं को दलित, पिछड़े, सवर्ण वोटों में बांट लो और फिर उसमें एकमुश्त मुस्लिम वोट जोड़कर जीत का समीकरण बनाओ. चुनाव आयोग ने मायावती के बयान का संज्ञान ले लिया है. सहारनपुर के जिलाधिकारी से रिपोर्ट मांगी गई है. लेकिन क्या मायावती-अखिलेश को किसी का डर है. जी हां है, ये बस हिंदुओं के एक होने से डर रहे हैं. यही डर आपको कांग्रेस, तृणमूल, राजद, तेलगू देशम, आम आदमी पार्टी समेत तमाम पार्टियों में नजर आएगा.
सहारनपुर के बहाने सांप्रदायिक जहर को समझिए
पश्चिम उत्तर प्रदेश की सहारनपुर सीट भारत की राजनीति में जातीय और सांप्रदायिक जहर घोलने का सटीक टेस्ट केस है. पहले जरा सहारनपुर को समझिए क्योंकि यही तस्वीर देश के तमाम हिस्सों में है, जहां विपक्षी दल अलग-अलग भेष में मायावती वाली ही सांप्रदायिक राजनीति कर रहे हैं. सहारनपुर सीट पर 2011 की जनगणना के मुताबिक 2014 में सहारनपुर में कुल 56.74 फीसदी हिंदू, 41.95 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या है. यहां से भारतीय जनता पार्टी के राघव लखनपाल निर्वतमान सांसद हैं. उन्होंने पिछले चुनाव में कांग्रेस के इमरान मसूद को 65 हजार वोटों से हराया था. बहुजन समाज पार्टी यहां तीसरे नंबर पर रही थी और समाजवादी पार्टी प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई थी. कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद को पहचानिए. यह वही इमरान मसूद हैं, जो खुलेआम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की धमकी देते हैं. इसी समझ जाइये कि वह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के किस कदर दुलारे होंगे. इस बार भाजपा के राघव लखनपाल के सामने इमरान मसूद फिर कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन से हाजी फजलुर्रहमान प्रत्याशी हैं.
देवबंद को चुनने का महत्व
पश्चिम यूपी में गठबंधन की पहली रैली के लिए मायावती और अखिलेश ने देवबंद को प्रतीकात्मक रूप से चुना. दारुल उलूम के कारण देवबंद को वहाबी विचारधारा का केंद्र माना जाता है. पुलवामा हमले और सर्जिकल स्ट्राइक के बाद बने माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में इस समय लहर है. मायावती और अखिलेश की आखिरी उम्मीद हिंदू बांटों, मुसलमान जुटाओ के गणित पर टिकी है. सहारनपुर भीम आर्मी का हेडक्वार्टर है. भीम आर्मी के चंद्रशेखर उर्फ रावण की कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद से नजदीकी छिपी हुई नहीं है. मायावती डरी हुई हैं कि इमरान मसूद पिछले चुनाव के तरह अपने घनघोर सांप्रदायिक चेहरे की वजह से मुसलमानों का वोट तो बटोरेगा ही, भीम आर्मी के दम पर बसपा के वोटबैंक में भी सुराख करेगा. यही डर दोनों को देवबंद खींच लाया.
 
मायावती का सांप्रदायिक भाषण शब्दशः
मायावती ने रविवार को जनसभा में क्या कहा शब्दशः पढ़िए. मायावती बोलीं- पश्चिमी यूपी में, खासकर सहारनपुर, मेरठ, मुरादाबाद और बरेली मंडल में मुस्लिम समाज की आबादी बहुत ज्यादा है. इस चुनाव में मुस्लिम समाज के लोगों को मैं सावधान करना चाहती हूं. आप लोगों को भी मालूम है कि पूरे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी इस लायक नहीं है कि बीजेपी को टक्कर दे सके. गठबंधन ही इस लायक है कि वो बीजेपी को टक्कर दे सके. कांग्रेस पार्टी को इस बात का पता है. मुझे ये जानकारी मिली है कि कांग्रेस पार्टी ये मानकर चल रही है कि खुद जीते न जीते, गठबंधन नहीं जीतना चाहिए. मुझे रिपोर्ट मिली है कि कांग्रेस ने ऐसी जाति और धर्म के लोगों को खड़ा किया है, जिससे भारतीय जनता पार्टी को फायदा पहुंचे. मैं मुस्लिम समाज के लोगों से कहना चाहती हूं. मैं ज्यादा दूर की बात नहीं कर रही हूं. सहारनपुर सीट की बात कर रही हूं. सहारनपुर के मुसलमानों को पता है कि हमने अपने मुसलमान कैंडीडेट का टिकट बहुत पहले फाइनल कर दिया था. कांग्रेस का टिकट फाइनल भी नहीं हुआ था. कांग्रेस को पता है कि उसे किसी और समाज का वोट मिलना भी नहीं है. मैं मुस्लिम समाज के लोगों से कहना चाहती हूं कि आप लोगों को अपना वोट बांटना नहीं है. आप लोगों को अपना वोट एकजुट होकर बीएसपी-सपा और आरएलडी के उम्मीदवार को देना है. आपको पता है कि लोकसभा की हर सीट पर बड़ी तादाद में बीएसपी का बेस वोट है. अब तो समाजवादी पार्टी के लोग भी मैदान में उतर पड़े हैं. हमारे जाट भाई भी मैदान में उतर पड़े हैं. मैं खासतौर पर मुस्लिम समाज के लोगों को कहना चाहती हूं कि आप लोगों को भावनाओं में बहकर, रिश्ते-नातों, यार दोस्तों के चक्कर में आकर वोट को बांटना नहीं है. अगर आपको इस चुनाव में बीजेपी को हरा का मुंह उत्तर प्रदेश से दिलाना है, तो आपको अपने वोट बांटना नहीं है, बल्कि एकतरफ होकर अपना वोट गठबंधन के उम्मीदवार को ही देना है. यह मेरी खासकर मुस्लिम समाज के लोगों से मेरी यही अपील है.
भाजपा की शिकायत पर आयोग ने लिया संज्ञान
भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष और चुनाव प्रबंधन प्रभारी जेपीएस राठौर ने रविवार को देवबंद की रैली में मायावती की मुसलमानों से की गई एकतरफा अपील को मजहबी उन्माद फैलाने वाला भाषण बतायाय लिखित शिकायत में उन्होंने कहा कि यह आचार संहिता का उल्लंघन है. मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सहारनपुर के जिलाधिकारी से रिपोर्ट मांगी है. गौरतलब है कि चुनाव आयोग लोकसभा चुनाव से पहले ही सभी दलों को हिदायत दे चुका है कि प्रचार के दौरान किसी जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर वोट की अपील न की जाए. आयोग का कहना है कि चुनाव में वैमनस्य फैलाने वाले भाषण न दिए जाएं.
बढ़ गई है विपक्षी दलों की बेचैनी
लोकसभा चुनाव के ऐलान के बाद से जिस तरह के सर्वे और संकेत आ रहे हैं, विपक्षी दलों की बेचैनी बढ़ी हुई है. पिछले लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी. विधानसभा चुनाव में भी बसपा का प्रदर्शन बेहद खराब रहा. समाजवादी पार्टी की हालत भी खस्ता है. बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का यह गठबंधन असल में अस्तित्व बचाने की लड़ाई है. यह लड़ाई भी ऐसे मुकाम पर आ गई है, जहां मुसलमानों से एकजुट होकर वोट करने की अपील की जा रही है.
हर कोने में मुसलमानों के दरवाजे पर विपक्षी
इस घनघोर सांप्रदायिक रैली में मजेदार बात ये थी कि मुसलमानों से एकजुट होकर वोट करने की अपील के ठीक बाद मायावती ने भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी करार दिया. इससे सवाल उठता है कि सांप्रदायिकता शब्द का क्या मतलब है. क्या मुसलमानों को किसी के खिलाफ एकजुट करना सांप्रदायिकता नहीं है. मायावती का अपराध बस इतना नहीं है. उन्होंने मुसलमानों को एकजुट होने की अपील करते हुए हिंदुओं को बांटने की भी कोशिश की. कहा-बीएसपी का बेस वोटर पूरे प्रदेश में है. वो वोटर किस धर्म से है, ये बताना वह भूल गई. साथ ही उन्होंने कहा कि अब तो जाट भी साथ आ गए हैं. यहां उन्हें हिंदू शब्द याद नहीं आया. भारतीय राजनीति का यही सच है. बहुसंख्यक समाज के खिलाफ बोला गया हर शब्द सेक्यूलर होता है. इसकी गुनाहगार अकेली मायावती नहीं हैं. दिल्ली में यही काम खुलेआम आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने घोषणापत्र में मुसलमानों के लिए न जाने क्या-क्या कर गुजरने की इच्छा जाहिर की है. पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सोच को क्या आप मायावती से अलग कह सकते हैं. वह भी भाजपा का डर दिखाकर मुस्लिम वोटों का चेक भुनाने का ही काम करती आई हैं. चुनाव में मतदान की तारीख पास आते-आते साफ हो रहा है कि एक तरफ सबका साथ-सबका विकास है और दूसरी तरफ सहमे हुए विपक्ष की मुस्लिम मतों के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश.