लापरवाही और बेचारगी का मारा मीडिया
   दिनांक 08-अप्रैल-2019
“सेकुलर मीडिया के तथाकथित कांग्रेस प्रेम और पक्षधरता से उसकी निष्पक्षता पर संदेह”
 
 
 
 
कांग्रेस के लिए मीडिया का प्रेम कोई छिपी बात नहीं है। 2019 के चुनावों से पहले यह बात खुलकर सामने आई है। कांग्रेस ने जब अपना घोषणापत्र जारी किया तो मीडिया के एक वर्ग का सारा जोर कुछ महत्वपूर्ण बातों को छिपाने पर था। तभी उन वादों को ज्यादा दिखाया गया जिनके बारे में सभी जानते हैं कि वे कभी पूरे नहीं होने वाले। ऐसा पहली बार है कि किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल ने लिखित रूप से जिहादियों और नक्सलियों के समर्थन में चुनावी वादे किए हैं। आश्चर्य कि एक-दो चैनलों और प्रकाशनों को छोड़ दें तो ज्यादातर ने इसकी अनदेखी करने की कोशिश की। क्या यह मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है कि वह कांग्रेस घोषणापत्र की उन बातों के बारे में भी लोगों को बताए जिन पर अमल हुआ तो देश की एकता, अखंडता और संविधान के लिए खतरा पैदा हो जाएगा?
रिपब्लिक और एकाध दूसरे चैनल ही रहे, जिन्होंने कांग्रेस के उन वादों का पूरा विश्लेषण किया, जिन्हें आजतक, एबीपी न्यूज, एनडीटीवी जैसे चैनल छिपाने का भरसक प्रयास कर रहे थे। रही-सही कसर सोशल मीडिया ने पूरी की, जिस पर आम लोगों ने उन वादों की पूरी लिस्ट निकाली जो कांग्रेस बीते कई चुनावों से करती आ रही है। इनमें कुछ ऐसी बातें भी थीं जिन्हें पिछले पांच साल में भाजपा सरकार पूरा कर चुकी है। लेकिन ये सबकुछ सोशल मीडिया पर मिलेगा, न कि मुख्यधारा मीडिया में। राहुल गांधी अपने भाषणों में हर गरीब को 72 हजार रुपये हर महीने देने से लेकर 72 हजार करोड़ रुपये देने तक के बयान दे चुके हैं। लेकिन मीडिया इसकी तथ्यात्मक जांच कभी नहीं करता। प्रधानमंत्री ने चुनावी रैलियों में 'हिंदू आतंकवाद' के मुद्दे पर हमला बोलना शुरू किया तो कांग्रेस से पहले मीडिया का एक तबका बिलबिला उठा। कई चैनलों ने इसे 'हिंदू कार्ड' चलना करार दिया। आजतक चैनल ने बड़े भोलेपन से पूछना शुरू किया क्या हिंदू आतंकवाद का जिक्र करके जीतेंगे चुनाव?
 
राहुल गांधी का वायनाड सीट से लड़ना भी मीडिया को 'मास्टरस्ट्रोक' लगा। 50 प्रतिशत से कम हिंदू आबादी वाली सीट पर कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव लड़ने का मतलब जनता अच्छी तरह समझ रही है, लेकिन मीडिया का एक वर्ग तर्क गढ़ने में जुटा है। कुछ दिन पहले एक झूठी खबर उड़ाई गई थी कि प्रधानमंत्री मोदी वाराणसी के बजाय किसी और सीट से लड़ सकते हैं। अगर ऐसा वाकई हो गया होता तब क्या मीडिया उतना नरम होता जितना वह राहुल गांधी के मामले में है? दरअसल वायनाड से राहुल गांधी के लड़ने से केंद्रीय स्तर पर महागठबंधन की जड़ें हिल गई हैं। वामपंथी नेता कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं। लेकिन मीडिया ने एक रणनीति के तहत उसे कोई महत्व नहीं दिया।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया समेत कई अखबारों ने दादरी के बिसाहेड़ा गांव में योगी आदित्यनाथ की रैली की खबर में बार-बार 'अखलाक का गांव' कहकर संबोधित किया। इससे इन अखबारों के एजेंडे पता चलता है। क्या कोई अखबार कभी कुंभकोणम को रामलिंगम का गांव लिखेगा? क्या कभी दिल्ली के विकासपुरी को डॉ पंकज नारंग का मुहल्ला लिखा जाएगा? मीडिया क्या कभी कासगंज को चंदन गुप्ता का शहर कहेगा? जालंधर के बिशप मुलक्कल चर्च की कार से 10 करोड़ रुपये पकड़े गए। जाहिर है, चुनावों में चर्च पूरी तरह सक्रिय है और यह रकम वोटरों में बांटने के लिए ले जाई जा रही थी। शायद इसीलिए मीडिया ने मामले को अंदर के पन्नों में छिपा दिया।
पंजाब में नशीली दवाओं के खिलाफ काम कर रही सरकारी अधिकारी नेहा शौरी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। मामला ड्रग्स माफिया से जुड़ा था लेकिन मुख्यधारा मीडिया ने इसे दबा दिया। किसी अखबार या चैनल ने इस महिला अधिकारी की कहानी नहीं दिखाई। किसी ने भी पंजाब में कांग्रेस सरकार में ड्रग्स माफिया के बढ़ते आतंक पर बात नहीं की। जबकि यही मामला किसी भाजपा शासित राज्य में हुआ होता तो दिल्ली का मीडिया आसमान सिर पर उठा चुका होता। मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांगा जा रहा होता। इतने कुकर्मों के बावजूद अगर मीडिया खुद को निष्पक्ष और लोकतंत्र का प्रहरी बताता है तो इस बात पर बस हंसा ही जा सकता है।