परिवारवादी दलों के इर्द-गिर्द मंडराता लोकतंत्र
   दिनांक 09-अप्रैल-2019
 
अगले पांच साल तक देश का भाग्यविधाता कौन होगा, इसे लेकर चुनावी गहमागहमी तेज है। इस गहमागहमी के बीच गाहे-बगाहे राजनीति में वंशवाद की भी चर्चा उठती है तो लेकिन वह या तो सिरे से परवान नहीं चढ़ती या फिर चढ़ भी जाती है तो वह सिर्फ गांधी-नेहरू परिवार तक ही सिमट कर रह जाती है। लेकिन इस देश में कम से कम चार ऐसे बड़े दल हैं, जिनका अपने राज्यों में बड़ा प्रभाव रहा है, सरकारें चला चुके हैं या चलाते रहे हैं। उससे भी ज्यादा दिलचस्प यह है कि ये दल भारतीय राजनीति के चिर विद्रोही राममनोहर लोहिया के पदचिन्हों पर चलने का दावा करते हैं। लेकिन वंशवाद और परिवारवाद के खिलाफ लोहिया के विचारों को भुलाने और किनारे लगाने में देर नहीं लगाते। आजादी के बाद 1959 में जब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी 42 वर्षीय बेटी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने को लेकर परोक्ष मदद की तो उसका अगर विपक्ष की ओर से किसी ने प्रखर विरोध किया था तो वे डॉक्टर लोहिया ही थे। इसके बाद से ही भारतीय राजनीति में वंशवाद को लेकर विरोधी पक्ष सवाल उठाते रहे हैं।
 
लेकिन यह विडंबना ही कहेंगे कि उन्हीं लोहिया की समाजवादी विचारधारा पर चलने वाले दलों ने सबसे ज्यादा परिवारवाद को बढ़ावा दिया। लोहिया के शिष्य होने का दावा करने वाले मुलायम सिंह यादव हों या फिर समाजवादी धारा पर चलने का दावा करने वाले लालू प्रसाद यादव, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा हों या फिर ओमप्रकाश चौटाला, इनके दलों में अगली पीढ़ी का नेतृत्व इनके ही बच्चों को मिलता रहा है। 4 अक्टूबर 1992 को मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी का गठन किया। इस पार्टी का घोषित उद्देश्य समाजवादी धारा पर लोगों का विकास करना और समाज में समरसता फैलाना है। समाजवादी पार्टी राज्य में तीन बार सत्ता में रही, लेकिन उसने समाजवाद का कितना भला किया, इस पर शोध किया जा सकता है। लेकिन इस पर कोई सवाल नहीं उठ सकता कि मुलायम की समाजवादी पार्टी में दल और सत्ता की कमान उनके ही परिवार के पास रही। 
पहले लगता रहा कि मुलायम सिंह के बाद पार्टी के कर्णधार उनके छोटे भाई शिवपाल यादव होंगे। यह बात और है कि 2015 से विवाद बढ़ा और मुलायम के बेटे अखिलेश यादव के हाथ पार्टी की कमान आ गई। उनके साथ मुलायम के चचेरे भाई राम गोपाल यादव, उनके बेटे अक्षय यादव और मुलायम के भाई के बेटे धर्मेंद्र यादव हैं। दिलचस्प यह है कि यही लोग पार्टी के सांसद भी हैं। इस लिस्ट में एक नाम अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव का भी जोड़ा जा सकता है।
 
कुछ यही स्थिति बिहार के प्रथम राजनीतिक दल की हैसियत हासिल कर चुके लालू प्रसाद यादव का भी है। जनता दल से अलग होकर उन्होंने 5 जुलाई 1997 को राष्ट्रीय जनता दल का गठन किया था। तब पार्टी ने दावा किया था कि वह गांधी, लोहिया और जयप्रकाश के विचारों पर चलेगी, बिहार के नेता कर्पूरी ठाकुर के आदर्शों को आगे बढ़ाएगी। लेकिन हकीकत कुछ और है। दिलचस्प यह है कि लालू यादव भारतीय राजनीति और बौद्धिक जगत में सांप्रदायिकता विरोध के प्रतीक पुरूष हैं। बेशक वे चारा घोटाला में जेल की सजा काट रहे हैं। लेकिन अब भी भारत के बौद्धिक वर्ग का एक हिस्सा उनमें ही देश का भविष्य देखता है। उनकी भी पार्टी पर उनके परिवार का ही कब्जा है। जब चारा घोटाले में लालू को जेल जाना पड़ा तो उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। अब उनकी पार्टी की कमान उनके छोटे बेटे तेजस्वी यादव के हाथ है। तेजस्वी विधायक भी हैं और नीतीश कुमार के साथ गठबंधन में जब तक बिहार में उनकी सरकार चलती रही, तब तक वे राज्य के उपमुख्यमंत्री भी रहे। तेजस्वी के बड़े भाई तेजप्रताप भी विधायक हैं और जब तक सरकार रही, बतौर स्वास्थ्य मंत्री बिहार का स्वास्थ्य सुधारते रहे। लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती बिहार से पार्टी की राज्यसभा सदस्य भी हैं।
 
समाजवाद के नाम पर परिवार की सेवा करने और उसे बढ़ाने वाला तीसरा दल जनता दल सेक्युलर है, जिसके अध्यक्ष पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा हैं। एचडी देवेगौड़ा ने जनता दल से अलग होकर जुलाई 1999 में जनता दल सेक्युलर का गठन किया। एक दौर में उनके सबसे बड़े सिपहसालार सिद्धारमैया थे। लेकिन जब देवेगौड़ा को अपना उत्तराधिकारी चुनने की बात आई तो उन्होंने अपने बेटे एचडी कुमारस्वामी पर भरोसा किया। इससे आस लगाए सिद्धारमैया का धैर्य चूक गया और उन्होंने अलग राह चुन ली और कांग्रेस में जाकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह लिए। यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि कथित सांप्रदायिकता रोकने के नाम पर भाजपा विरोध के खेल में उन्होंने उसी एचडी कुमार स्वामी का साथ दिया, जिनकी वजह से पार्टी से बाहर निकले। दक्षिण में समाजवाद को बढ़ावा देने के नाम पर यह देवेगौड़ा परिवार के पास ही उनके राजनीतिक परिवार की पूरी धुरी है। उनके बड़े बेटे एचडी रेवन्ना भी राजनीति में हैं और अब तो उनके पोते भी लोकसभा चुनाव मैदान में हैं।
इसी तरह चौथा समाजवादी दल है हरियाणा का इंडियन नेशनल लोकदल। हरियाणा के कद्दावर समाजवादी नेता और स्वतंत्रता सेनानी चौधरी देवीलाल ने 1987 में जनता दल से अलग होकर इंडियन नेशनल लोकदल का गठन किया था। बाद में उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला ने इस दल की कमान संभाल ली। अभी ओमप्रकाश चौटाला शिक्षक भर्ती घोटाला में दिल्ली की तिहाड़ जेल में दस साल की सजा काट रहे हैं। उनके साथ कभी उनके उत्तराधिकारी माने जाते रहे उनके बड़े बेटे अजय चौटाला भी जेल में हैं। ये दोनों बाप बेटे कभी सांसद तो कभी विधायक रहते रहे हैं। चौटाला के छोटे बेटे अभय चौटाला के ही हाथ इन दिनों दल की कमान है। इससे अलग होकर अजय चौटाला के बेटे दुष्यंत चौटाला ने अपनी अलग जनता जननायक पार्टी बना ली है।
बहरहाल इन चारों दलों में एक बात इन दिनों सामान्य दिख रही है। परिवार के ही हाथ सत्ता होने के बावजूद इन दलों में इन दिनों पारिवारिक कलह जोरों पर है। इन दलों के आकाओं के पास अकूत संपत्ति है और सत्ता पर वर्चस्व को लेकर इनके बीच जंग चल रही है। बिहार में टिकटों को बंटवारे को लेकर तेजप्रताप अपने भाई तेजस्वी से नाराज हैं और चार लोकसभा सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारने की बात कर रहे हैं। मुलायम परिवार की जंग तो सार्वजनिक हो ही चुकी है।
एचडी देवेगौड़ा परिवार में भी एचडी रेवन्ना और एचडी कुमार स्वामी के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। इंडियन नेशनल लोकदल से अलग होकर अजय चौटाला के बेटे दुष्यंत ने अपनी अलग पार्टी बना ही ली है। इस दल के अगुआ परिवार की आपसी लड़ाई भी सड़क पर आ ही गई है।
परिवारवाद का यह रोग सिर्फ समाजवादी खेमे में ही नहीं है, बल्कि स्थानीय उपराष्ट्रीयता वाले दलों में भी है। तमिलनाडु का एक दल है द्रविड़ मुनेत्र कषगम्, इसकी स्थापना सीए अन्नादुरै ने की थी। लेकिन बाद में इस पर कलइनर करूणानिधि का कब्जा हो गया। अब करूणानिधि नहीं हैं। लेकिन उनके उत्तराधिकार को लेकर उनके बड़े बेटे एम के अल्लागिरी और छोटे बेटे स्टालिन के साथ ही उनकी बेटी कनिमोई में विवाद चला। एम के अल्लागिरी बड़ा बेटा होने के नाते पार्टी पर करूणानिधि के बाद हक चाहते थे। हालांकि करूणानिधि ने जीते-जी ही स्टालिन को आगे बढ़ाया। इससे अल्लागिरी नाराज हुए। अलग दल भी बनाया। हालांकि अब उन्होंने अपने छोटे भाई का नेतृत्व स्वीकार कर लिया है। जबकि कनिमोई शुरू से ही भाई स्टालिन के साथ हैं।
 
भारतीय लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिन दलों ने अपनी घोषित विचारधारा के उलट जाकर लगातार काम किया है, वंशवाद और परिवारवाद को बढ़ावा दिया है, अकूत संपत्ति इकट्ठी की है, भारतीय मतदाताओं का एक वर्ग यह सब जानते हुए भी उन पर भरोसा जताता है और अपना भाग्यविधाता बनाता है। यह भी कम दुर्भाग्य की बात नहीं है कि भारत के एक बौद्धिक वर्ग को इन्हीं दलों में भारत का भविष्य और गरीब की रोटी की गारंटी दिखती है। शायद यह विरोधाभास ही है कि आजादी के सत्तर साल की यात्रा में भारत को जितना आगे होना चाहिए था, नहीं हो पाया। ऐसे में सवाल यह है कि भारतीय मतदाता कब जागरूक होगा और कब वह राजनीति की इन बुराइयों को परे धकेलने के लिए तैयार होगा?