देश के साथ कांग्रेस के 10 अन्याय, हिसाब दो
   दिनांक 01-मई-2019
भारतमाता के टुकड़े कर देने का अन्याय. कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान को सौंप देने का अन्याय. बिना गोला-बारूद देश के सैनिकों को चीन के हमले के समय मरने के लिए छोड़ देने का अन्याय. संविधान की हत्या का अन्याय. सिखों के कत्लेआम का अन्याय. कश्मीरी पंडितों के साथ अन्याय. फेहरिस्त बहुत लंबी है.
कांग्रेस का चुनाव में नारा है, अब होगा न्याय. धर्म की पहली आवश्यकता न्याय है. अन्याय के हिसाब को ही न्याय कहते हैं. कांग्रेस के देश के साथ अन्याय की फेहरिस्त बहुत लंबी है. अब जबकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जनसभाओं में चिल्ला-चिल्लाकर न्याय की बात कर रहे हैं, तो हम भी अन्याय का हिसाब मांगना चाहेंगे. अन्याय का वो सिलसिला जो देश की आजादी से पहले शुरू होता है. फिर भारतमाता के टुकड़े कर देने का अन्याय. कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान को सौंप देने का अन्याय. बिना गोला-बारूद देश के सैनिकों को चीन के हमले के समय मरने के लिए छोड़ देने का अन्याय. संविधान की हत्या का अन्याय. सिखों के कत्लेआम का अन्याय. कश्मीरी पंडितों के साथ अन्याय. फेहरिस्त बहुत लंबी है. लेकिन अब जब न्याय की बात छिड़ गई है, तो हर अन्याय पर बात होगी, हिसाब होगा.
और देश बंट गया 
 
कांग्रेस आजादी, आजादी आंदोलन सबका श्रेय लेती है. अगर आजादी कांग्रेस कहीं से चुपके से उठाकर ले आई थी, तो फिर बंटवारे का दोष किसे दिया जाए. देश के साथ हुए इस सबसे बड़े अन्याय के लिए क्या कांग्रेस दोषी नहीं है. भारत में आजादी आंदोलन के दौरान दो महत्वाकांक्षी चेहरे थे. कांग्रेस से जवाहरलाल नेहरू और मुस्लिम लीग से मोहम्मद अली जिन्ना. दोनों का लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट था. किसी भी कीमत पर कुर्सी. नेहरू को प्रधानमंत्री बनने का आशीर्वाद महात्मा गांधी से पहले ही मिल चुका था और जिन्ना के सामने उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था. दोनों पार्टी के नेताओं ने देश बांट लिए और मानव जाति के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी के बीच आजादी का जश्न मनाया. जिस समय कांग्रेस के नेता 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में उत्सव मना रहे थे, लाखों हिंदू और सिख जान बचाने की गुहार लगा रहे थे. भारत माता के रूप के खंडित कर देने और बीस लाख से ज्यादा लोगों की मौत के अन्याय का जिम्मेदार कौन. क्या राहुल गांधी बताएंगे कि इसका न्याय कब होगा.
कश्मीर के हिस्से पर पाकिस्तानी कब्जे का अन्याय 
आजादी के पहले से ही नेहरू अपने खास दोस्त शेख अब्दुल्ला की जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री बनने की हसरत को पूरा करने के लिए काम कर रहे थे. कश्मीर के महाराजा हरि सिंह इसे अलग मुल्क बनाने के दिवास्वपन देख रहे थे. ऐसे असमंजस वाले माहौल में 21 अक्टूबर 1947 की रात को पाकिस्तानी सेना ने कबाइलियों के वेष में हमला किया. महाराजा हरि सिंह के पास इस हमले को रोकने की ताकत नहीं थी. दो दिन के अंदर पाकिस्तान सेना ने कश्मीर का एक हिस्सा कब्जा लिया. श्रीनगर खतरे में था. ऐसे समय में हरि सिंह ने इंस्ट्रूमेंट ऑफ एसेसन पर साइन कर दिए. भारतीय सेना कबाइलियों पर टूट पड़ी. बारामुला वापस छीन लिया गया. भारतीय सेना ने पूरे कश्मीर को पाकिस्तान के अनाधिकृत कब्जे से मुक्त कराने की योजना बनाई. लेकिन इस हमले को नेहरू ने रोक दिया. वह इंस्ट्रूमेंट ऑफ एसेसन लेकर संयुक्त राष्ट्र चले गए. कश्मीर का ये हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है. यहां आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर चलते हैं. क्या राहुल गांधी ये बताएंगे कि उनके पिता के नाना ने भारत माता के साथ विभाजन के तुरंत बाद ये दूसरा अन्याय क्यों किया. कश्मीर पर पाकिस्तान के कब्जे का न्याय कब होगा.
चीन से पराजय का अन्याय 
 
20 अक्टूबर, 1962 को जब चीन ने भारत पर हमला किया, तो नेहरू की स्थिति ठीक वैसी थी, जैसे कबूतर बिल्ली को देखकर आंख बंद कर ले. जब चीन ने तिब्बत को हड़पना शुरू किया था, नेहरू ने इस बिल्ली को लेकर तभी से आंख बंद कर ली थी. चीन जब हमारी छाती पर आ चढ़ा था, उस समय नेहरू दिल्ली में बैठकर माओ के साथ दोस्ती के सपने सजा रहे थे. नतीजा पता है आपको. इस जंग में चीन के अस्सी हजार सैनिकों और तोपखाने के मुकाबले भारत के दस हजार जवान थे. जिनके पास न तो रसद की सप्लाई थी, न गोला-बारूद की. एक महीने के बाद 21 नवंबर को चीन ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की. देश की सुरक्षा की हालत ऐसी थी कि चीन युद्धविराम की घोषणा न करता, तो आराम से दिल्ली को जीत सकता था. मां भारती का ऐसा अपमान इतिहास में कभी नहीं हुआ था. चीन आक्साई चीन पर कब्जा कर चुका था. भारत घुटने टेककर चीन के साथ बातचीत के लिए मजबूर था. युद्ध में भारत के 14 सौ जवानों ने बलिदान दिया. 16 सौ ज्यादा जवान लापता हो गए. क्या राहुल गांधी जवाब देंगे कि हमारे सैनिक बिना गोला-बारूद दुश्मन के बमों का निहत्थे मुकाबला कर रहे थे, तो क्या ये अन्याय नहीं था. आक्साईचीन चीन के कब्जे में है. सीमा विवाद आज तक सुलझा नहीं है. भारत के एक और हिस्से को खो देने का, भारत के स्वाभिमान को चोट पहुंचाने का, भारतीय सेना के साथ अन्याय का जिम्मेदार कौन है. राहुल गांधी बताएंगे कि इसका न्याय कब होगा.
सुभाष बाबू के साथ कब होगा न्याय 
 
सुभाषचंद्र बोस की पड़पोती राज्यश्री चौधरी का स्पष्ट आरोप है कि कांग्रेस और उस दौर के नेताओं ने सुभाष चंद्र बोस के साथ अन्याय किया. उन्होंने साफ कहा कि आजाद हिंद फौज के दबाव का ही नतीजा था कि ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस नेताओं में समझौता हुआ. देश को आजाद करने की घोषणा हुई. आजादी से पहले कांग्रेस का नेहरूकरण हो चुका था. सुभाष चंद्र बोस निर्वाचित अध्यक्ष होकर भी कांग्रेस के आला नेताओं की आंख में चुभ रहे थे. ऐसे समय में नेताजी ने देश की आजादी के सशस्त्र संघर्ष का बीड़ा उठाया. 1943 में दिल्ली चलो के नारे के साथ आजाद हिंद फौज ने ब्रिटिश फौज के दांत खट्टे कर दिए. 21 अक्टूबर 1943 को ही भारत की अस्थायी सरकार का गठन हो चुका था. जिसे आठ देशों ने मान्यता दे दी. 18 अगस्त 1945 को एक कथित प्लेन क्रैश में उनकी मौत की कहानी सामने आई. हालांकि आज तक इस संबंध में कुछ स्पष्ट नहीं हो पाया. कई जांच हुईं. तमाम अहम दस्तावेज आज भी सरकारी फाइलों में दफन हैं. सुभाष चंद्र बोस के साथ हुए अन्याय के लिए कौन जिम्मेदार है ?
सिखों के नरसंहार का अन्याय 
 
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भी कांग्रेसियों ने अपनी समझ के मुताबिक न्याय ही तो किया था. आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी राजनीतिक दल का प्रायोजित दंगा एक धर्म के खिलाफ भड़का. एक नवंबर 1984 को देश के हर कोने में कांग्रेसी नेता उन्मादी कार्यकर्ताओं की भीड़ के साथ मिलकर सिखों को ढूंढकर जिंदा जला रहे थे. कांग्रेस की सरकार, पुलिस और अन्य सरकारी एजेंसियां या तो तमाशबीन थीं या फिर मददगार. सरकार की शह का सुबूत-अपनी मां की मौत के बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने कहा था कि जब एक बड़ा पेड़ गिरता है, तो पृथ्वी भी हिलती है. यानी देश का प्रधानमंत्री नरसंहार को क्रिया की प्रतिक्रिया बताकर एक सामान्य घटना करार दे रहा था. और अब राजीव गांधी के बेटे न्याय की बात कर रहे हैं. सिखों के नरसंहार में कांग्रेस ने अपने नेताओं को बचाने के लिए पुलिस, अन्य जांच एजेंसियों और यहां तक कि अभियोजन का दुरुपयोग किया. आखिरकार ये भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार थी, जिसमें ये सुबूत कोर्ट को मिले. इन्हीं सुबूतों के आधार पर पटियाला हाउस कोर्ट ने 17 दिसंबर 2018 को मुख्य आरोपी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई. राहुल गांधी जी इसे कहते हैं न्याय.
लोकतंत्र की हत्या का अन्याय 
 
12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सुबूतों की रोशनी में पाया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने रायबरेली के चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया था. इसी आधार पर उनके निर्वाचन को खारिज कर दिया गया. सुबूतों की मांग करने वाले राहुल गांधी की दादी ने हाई कोर्ट के फैसले और इसके नतीजतन देश भर में फैले विरोध को देखते हुए 25 जून 1975 की आधीरात को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी. 21 मार्च 1977 तक देश में ऐसा राज रहा, जहां कोई सुबूत, अपील, दलील और वकील नहीं था. बस इंदिरा और उनके दुलारे बेटे दिवंगत संजय गांधी थे. आज अन्याय और न्याय की बात कर रहे राहुल एंड कंपनी को जरा बता दें कि अखबारों, मैगजीनों में कुछ भी लिखने, लोगों के बोलने और यहां तक कि सोचने-विचारने तक के अधिकार को छीन लिया गया था. विपक्ष के तमाम वरिष्ठ नेताओं समेत लाखों लोगों को देशभर में जेलों में ठूस दिया गया था. लोकतंत्र की हत्या के इस घिनौने कारनामे में न्याय कब होगा राहुल गांधी जी.
भगवान श्री राम के साथ अन्याय 
 
12 सितंबर 2007 को रामसेतु को तोड़ने के खिलाफ याचिका पर केंद्र की यूपीए सरकार ने हलफनामा दाखिल किया. जरा भाषा देखिए- निसंदेह वाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस भारत के प्राचीन साहित्य में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं (इन्हें हमारे आराध्य ग्रंथ प्राचीन साहित्य लगते हैं). लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि इसके पात्र (यानी भगवान श्री राम) और इनमें लिखी घटनाओं के घटित होने का कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है. ये हलफनामा सीधे-सीधे कहता था कि भगवान राम और उनके जीवन का कोई सुबूत नहीं है. अब जरा बताइये कि जो आपके राम को काल्पनिक बताकर आपके धर्म के साथ अन्याय करते हों, उनके साथ आप तो न्याय करेंगे न.
भोपाल गैस कांड का अन्याय 
 
तीन दिसंबर 1984 को भोपाल में यूनियन कार्बाइड के संयंत्र से गैस रिसाव से हजारों लोगों की मृत्यु हो गई. गैस त्रासदी के मुख्य आरोपी वॉरेन एंडरसन को तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने विशेष विमान से एंडरसन को दिल्ली पहुंचाया. वहां से राजीव गांधी सरकार के सौजन्य से एंडरसन अमेरिका भाग गया या भेज दिया गया. हजारों लोगों की मौत भी तो न्याय मांग रही है राहुल गांधी जी.
बोफोर्स दलाल क्वात्रोची 
 
ओटावियो क्वात्रोची का राजीव गांधी और सीधे कहें, तो सोनिया गांधी से क्या संपर्क था और उस समय की राजीव सरकार पर क्या प्रभाव था. ये कहीं ढकी-छिपी बात नहीं है. क्वात्रोची देश छोड़कर कैसे भागा. कैसे उसके विदेशी खातों पर लगी रोक को कांग्रेस की मेहरबानी से हटाया गया. हमें सुबूत चाहिए कि आपके परिवार की लूट में क्वात्रोची साझीदार नहीं था. किसने क्वात्रोची के खिलाफ सारे सुबूत मिटाए. इस अन्याय का भी हिसाब देना चाहेंगे कांग्रेस अध्यक्ष.
अब होगा एक परिवार की लूट का न्याय 
 
राहुल गांधी को जेल नजर आ रही है. आप तो न्याय की बात करते हैं. नेशनल हेराल्ड घोटाले में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी माता श्रीमती सोनिया गांधी जमानत पर हैं. सुबूत इतने पुख्ता हैं कि नेशनल हेराल्ड हाउस को खाली करने के निचली अदालत के आदेश को रोकने से उच्च न्यायालय ने भी इनकार कर दिया है. दिसंबर 2015 में भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने पुख्ता सुबूतों के साथ सोनिया गांधी परिवार की सुनियोजित लूट के खिलाफ मुकदमा कायम कराया. यंग इंडिया ने हेराल्ड की संपत्ति महज 50 लाख में हासिल की जिसकी कीमत करीब 1600 करोड़ के आस पास है. पचास लाख को 1600 करोड़ बना लेने की कारिगरी के पुख्ता सुबूत अदालत के सामने हैं. न्याय होगा. न्याय होगा जरूर होगा, प्रियंका गांधी वाड्रा की लूट का. न्याय होगा पी. चिदंबरम और उनके बेटे की लूट का. आकाश से पाताल तक किए घोटालों का न्याय होगा. न्याय होगा, देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ का. न्याय होगा हिंदुओं को बदनाम करने की भगवा आतंकवाद की साजिश का. न्याय होगा, राहुल गांधी जी और जरूर होगा.