श्रीलंका में बुर्के पर प्रतिबंध पर तिलमिलाया देवबंद
   दिनांक 01-मई-2019
श्रीलंका में हुए आतंकी हमले के बाद श्रीलंका सरकार ने मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने और चेहरा ढकने पर पाबंदी लगा दी है। उन्हें लोग नौकरी पर रखने को तैयार नहीं हैं। मुसलमानों के घर से बड़े जानवरों को हलाल करने के लिए रखा गया चाकू जमा कराया जा रहा है। मस्जिदों के लाउडस्पीकर को बंद कराया जा रहा है। मस्जिदों की जांच हो रही है.
भारतीय प्रगतिशील मुसलमानों के चेहरे पर पड़ा बुर्के धीरे—धीरे सरकता जा रहा है। हिन्दू समाज में मौजूद जाति के सवाल को लेकर सबसे अधिक मुखर मुसलमानों के बीच जो तबका नजर आता है, वही तीन तलाक, खतना, हलाला, बुर्के जैसी अमानवीय प्रथाओं पर चुप्पी साध लेते हैं। ऐसे मुद्दे जिन वामपंथी रूझान वाली स्त्रीवादियों के विशेषज्ञता का क्षेत्र माना जाता रहा है, वे भी जब ऐसे विषयों पर चुप्पी साध लेती हैं। उसके बाद देश के आम आदमी के बीच उनकी हिन्दू समाज को लेकर एक पक्षीय आलोचना को संदेह से देखा जाना स्वाभाविक है। ऐसे दर्जनों मुसलमान लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी मिल जाएंगे, जो हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था पर तंज करने का कोई मौका नहीं छोड़ते लेकिन इस्लाम के नाम पर मुसलमान स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव पर चुप्पी साध लेते हैं। वास्तव में मुसलमान और गैर मुसलमानों के बीच अंतर करने वाले ऐसे मुसलमान समाज में साम्प्रदायिक माहौल को हवा देते हैं।
पिछले दिनों इस्लाम और ईसाई कट्टरपंथ की मिसाल दुनिया ने देखी। 2019 में इस्लाम—क्रिश्चियन टकराव का जब कोई दस्तावेज तैयार करेगा तो उसमें 15 मार्च और 21 अप्रैल को जरूर शामिल करेगा। इसी वर्ष 15 मार्च को न्यूजीलैंड में क्राइस्टचर्च स्थित मस्जिद पर दिल दहला देने वाला हमला हुआ था। उस घटना की ताप पूरी दुनिया के मुसलमानों ने महसूस की। भारत में दर्जनों जगहों पर न्यूजीलैन्ड में हुई घटना के बाद मुसलमानों ने शोक सभाएं की। कैन्डल मार्च निकाली, क्योंकि मस्जिद में मरने वाले मुसलमान थे। अप्रैल को श्रीलंका के एक अतिथि गृह और तीन पांच सितारा होटलों में इस्लाम पर यकिन रखने वालों ने हमला किया। श्रीलंका की राजधानी कोलंबो के सेंट एंथोनी चर्च, पश्चिम तटीय कस्बे का सेंट सेबेस्टियन चर्च और पूर्वी कस्बे बट्टीकलोआ के सेंट माइकल चर्च को मुस्लिम आतंकियों ने निशाना बनाया। जिसमें 370 लोगों की जान गई। यह हमला क्रिश्चियनों के ईस्टर पर्व के दिन हुआ था। मुस्लिम आतंकियों का उद्देश्य अधिक से अधिक क्रिश्चियनों को निशाना बनाना रहा होगा। उल्लेखनीय है कि न्यूजीलैन्ड हमले के बाद जिस तरह शोक सभाओं का सिलसिला भारतीय मुसलमानों में दिखा था। वह कोलंबों हमले के बाद नहीं दिखा। यदि न्यूजीलैन्ड में मरने वालों से भारतीय मुसलमानों का रिश्ता इसलिए था कि मरने वाले मुसलमान थे फिर कोलंबों में उन मुसलमानों के लिए भारतीय मुसलमानों को शर्मिन्दा क्यों नहीं होना चाहिए जो हत्यारे थे। क्या मुसलमानों द्वारा फैलाए जा रहे आतंक और की जा रही हत्या पर मुसलमानों की खामोशी, कहीं आतंक और हत्या को मौन समर्थन तो नहीं है? इसका जवाब भारतीय मुसलमानों को ही तलाशना होगा!
दुनिया के किसी भी हिस्से में मुसलमानों के साथ होने वाली घटनाओं पर जिस तरह की संवेदना भारतीय मुसलमान दिखाता है, यदि उतनी नफरत वह उन हत्यारों के लिए प्रदर्शित कर पाए जो इस्लाम के नाम पर हत्याएं कर रहे हैं, यकिन मानिए यह भारत के गैर मुसलमानों के बीच मुसलमानों स्थिति को विश्वसनीय ही बनाएगा।
श्रीलंका में हुए आतंकी हमले के बाद श्रीलंका सरकार मुसलमानों पर सख्त हुई है। सरकार द्वारा मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने और चेहरा ढकने पर पाबंदी लगा दिया है। श्रीलंका से मिल रही जानकारी के अनुसार— किराए के घरों से उन्हें बाहर निकाला जा रहा है। उन्हें लोग नौकरी पर रखने को तैयार नहीं हैं। मुसलमानों के घर से बड़े जानवरों को हलाल करने के लिए रखा गया चाकू जमा कराया जा रहा है। मुसलमानों को समय पर अपना बिजली बिल जमा कराने को कहा जा रहा है। मस्जिदों के टंगे लाउडस्पीकर को बंद कराया जा रहा है। मस्जिदों की जांच हो रही है। मुसलमानों ने जिन हथियारों को आत्मरक्षा के लिए रखा है, उसे जमा कराने को कहा जा रहा है। बुर्के पर प्रतिबंध लग ही चुका है। घर में रखे सामानों का बिल देखा जा रहा है। जिन परिवारों में अधिक बच्चे हैं, बच्चों का डीएनए जांचा जा रहा है। लंबी दाढ़ी काटी जा रही है। मुसलमानों पर हो रही कार्यवाई के अन्तर्गत कई महत्वपूर्ण फैसले स्वयं राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने लिए हैं।
मिल रही जानकारी के अनुसार— श्रीलंका में जालीदार टोपी, छोटे पैजामा, लंबे कुर्ते का खूब मजाक उड़ाया जा रहा है। सड़क पर नमाज और कुरबानी पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। वरिष्ठ पेंटर स्वप्निल जैन का कहना है ''लगता है श्रीलंका ने आतंक का मजहब पहचान लिया है।'' । जैन व्यंग्य करते हुए कहते हैं— ''श्रीलंका में आतंकियों को वकील नहीं मिल रहे। प्रशांत भूषण और कपिल सिब्बल चाहें तो श्रीलंका का रूख कर सकते हैं।''
श्रीलंका ने जिस कड़ाई से आतंक के खिलाफ लड़ाई को लड़ा है, वह सच्चे अर्थों में उन 370 लोगों को श्रद्धांजलि है, जिन्होंने 21 अप्रैल को आतंकी हमले में अपनी जान दी। जबकि भारत का रिकॉर्ड आतंकी हमले के बाद कड़ी निन्दा करने तक सीमित रहा है। पुलवामा हमले के बाद मोदी सरकार ने जैसी जवाबी कार्रवाई की, उसके बाद देश के लोगों में विश्वास जगा है कि देश बदल रहा है।
बहरहाल देवबंद के उलेमाओं का कहना है कि श्रीलंका में चर्च पर हुआ हमला निंदनीय है। लेकिन उसके नतीजे में ऐसे कानून बनाना जो इस्लामिक दस्तूर से टकराते हों, यह सरासर गलत और संयुक्त राष्ट्र संघ के दिशा निर्देशों के खिलाफ है।
उलेमाओं ने कहा कि चर्च पर हुए हमले से बुर्के पर पाबंदी लगाना और चेहरा ढकने का कोई ताल्लुक नहीं है। घटना की जांच करना, अपराधियों को तलाश करके उन्हें सजा देना यह चीजें बेहद जरूरी हैं, न की उसके नतीजे में मुसलमानों को निशाना बनाकर इस तरह की कार्रवाई करना।
गौरतलब है कि एक तरफ देवबंद ने इस तरह का फतवा आतंकी कार्रवाई के खिलाफ चल रही श्रीलंका सरकार के आपरेशन पर जारी किया है, दूसरी तरफ उसी कार्यवाई से भारत की बहुसंख्यक आबादी संतुष्ट दिखती है। वह चाहती है कि भारत भी आतंकवाद के खिलाफ ऐसी ही कार्रवाई करे।
गौरतलब है कि फतवा जारी करने वाले देवबंद का रिश्ता उस जैश ए मोहम्मद से है, जिसने पुलवामा पर हमला किया था। वास्तव में जैश ए मोहम्मद देवबंदी विचारों से ही कथित तौर पर आतंक की प्रेरणा पाता है। जैश ए मोहम्मद के देवबंदी जिहादी भारत में कश्मीर को अलग करने के उद्देश्य से काम कर रहे हैं। देवबंद से कई बार आतंकियों की गिरफ्तारी भारतीय सुरक्षा एजेन्सियों ने की। यह अच्छी बात है कि भारतीय समाज के सामने अब इस सच का खुलासा हो चुका है। सोशल मीडिया की वजह से यदि फेक न्यूज का विस्तार हुआ, वहीं समाज को जागरूक करने में भी इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।